मां के कमरे के बाहर बैचेन कदमों से घूमते रहे सीएम हेमंत सोरेन… कभी डॉक्टरों से बात, कभी कल्पना सोरेन से चर्चा; रूपी सोरेन के निधन से थम गया सोरेन परिवार
CM Hemant Soren paced restlessly outside his mother's room—alternating between speaking to doctors and consulting Kalpana Soren; the Soren family came to a standstill following the passing of Rupi Soren.

रांची: बुधवार की रात करीब साढ़े आठ बजे सोरेन परिवार के लिए वह खबर आई, जिसका डर पूरे दिन हिल व्यू अस्पताल के गलियारों में महसूस किया जा रहा था। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की मां और दिशोम गुरु स्वर्गीय शिबू सोरेन की पत्नी रूपी सोरेन का निधन हो गया। लंबे समय से बीमार रूपी सोरेन रांची के बरियातू स्थित हिल व्यू अस्पताल में भर्ती थीं।
उनके निधन की खबर के साथ ही झारखंड के राजनीतिक और सामाजिक जगत में शोक की लहर दौड़ गई।लेकिन इस दुखद खबर से पहले का पूरा दिन भी अपने भीतर एक ऐसी कहानी समेटे था, जिसे शायद हेमंत सोरेन कभी भूल नहीं पाएंगे।एक तरफ अस्पताल के भीतर डॉक्टर रूपी सोरेन को बचाने की हर संभव कोशिश में जुटे थे, तो दूसरी तरफ बाहर उनका बेटा बेचैनी में हर पल मां का हाल जानने की कोशिश कर रहा था।
सुबह से ही बढ़ती जा रही थी बेचैनी
बुधवार की सुबह रूपी सोरेन की हालत अचानक बिगड़ गई थी। उनका हार्ट रेट अनियंत्रित होने लगा और स्थिति लगातार नाजुक होती गई। डॉक्टरों ने आपात बैठक की। विशेषज्ञ चिकित्सकों को बुलाया गया। न्यूरो मेडिसिन विशेषज्ञ डॉ. उज्ज्वल राय अस्पताल पहुंचे तो कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. दीपक गुप्ता भी शाम करीब छह बजे अस्पताल पहुंचे।
स्थिति को देखते हुए डॉक्टरों ने हार्ट रेट नियंत्रित करने के लिए टेंपरेरी पेसमेकर लगाने का निर्णय लिया था।अस्पताल के भीतर इलाज की जद्दोजहद चल रही थी और बाहर परिवार की उम्मीदें टिकी थीं।
मुख्यमंत्री ने रद्द कर दिए सारे कार्यक्रम
मां की गंभीर हालत की जानकारी मिलते ही हेमंत सोरेन ने अपने दिन के कार्यक्रम रद्द कर दिए। कैबिनेट की बैठक तक स्थगित कर दी गई।मुख्यमंत्री अस्पताल पहुंचे और फिर दिनभर वहीं डटे रहे।यहां उस दिन मुख्यमंत्री की भूमिका जैसे पीछे छूट गई थी।
सामने सिर्फ एक बेटा था, जिसकी मां जिंदगी के सबसे कठिन मोड़ पर थी।वह कभी डॉक्टरों से इलाज की जानकारी लेते, कभी परिवार के सदस्यों से बात करते। पत्नी कल्पना सोरेन भी अस्पताल में मौजूद थीं। दोनों के बीच लगातार बातचीत होती रही।हर बार डॉक्टरों की ओर से आती सूचना के साथ उम्मीद और चिंता दोनों बदलती रहीं।
अस्पताल के बाहर एक बेटे की बेचैनी
अस्पताल के कैबिन के आसपास हेमंत सोरेन लगातार आते-जाते रहे। कभी कुछ देर चुपचाप खड़े रहते, कभी डॉक्टरों से बात करते और फिर कल्पना सोरेन के पास पहुंच जाते।राज्य के मुख्यमंत्री के सामने जहां रोजाना सैकड़ों फैसले होते हैं, उस दिन उन तमाम फैसलों से ज्यादा बड़ा एक ही सवाल था—मां कैसी हैं?
सियासत, सरकार और कैबिनेट सब कुछ पीछे छूट गया था।अस्पताल की दीवारों के भीतर मां जिंदगी से जूझ रही थीं और बाहर बेटा हर पल किसी अच्छी खबर का इंतजार कर रहा था।
डॉक्टरों की पूरी टीम लगी रही
रूपी सोरेन की हालत बिगड़ने के बाद चिकित्सकों की टीम ने उन्हें बचाने के लिए हर संभव प्रयास किया। विशेषज्ञ डॉक्टरों को अस्पताल बुलाया गया। हार्ट रेट नियंत्रित करने के लिए पेसमेकर लगाने की तैयारी की गई।लेकिन दिन गुजरने के साथ हालात और गंभीर होते गए।शाम होते-होते अस्पताल के बाहर चिंता और गहरी हो चुकी थी। परिवार के लोग, करीबी नेता और समर्थक लगातार अस्पताल पहुंच रहे थे।
फिर आई वह खबर…
रात करीब साढ़े आठ बजे वह खबर आई, जिसने पूरे सोरेन परिवार को तोड़ दिया।
रूपी सोरेन नहीं रहीं।
जिस मां की जिंदगी बचाने के लिए पूरा दिन डॉक्टरों की टीम जुटी रही, जिसके लिए मुख्यमंत्री बेटे ने अपने सारे कार्यक्रम रद्द कर दिए, जिसके कमरे के बाहर वह घंटों बेचैन रहे—आखिरकार उस मां ने दुनिया को अलविदा कह दिया।अस्पताल में मौजूद लोगों के बीच सन्नाटा पसर गया।
रूपी सोरेन सिर्फ शिबू सोरेन की पत्नी नहीं थीं
रूपी सोरेन की पहचान सिर्फ झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और दिशोम गुरु शिबू सोरेन की पत्नी के रूप में नहीं थी। वह उस दौर की साक्षी और सहभागी थीं, जब शिबू सोरेन का संघर्ष घर से जंगलों और आंदोलन तक फैला हुआ था।जब शिबू सोरेन आंदोलन और फरारी के दौर में घर से दूर रहते थे, तब परिवार और जमीन की जिम्मेदारी रूपी सोरेन ने संभाली।उनसे जुड़े कई किस्से बताते हैं कि वह बेहद मजबूत और बेबाक महिला थीं।जमीन पर कब्जे की कोशिश हो या पुलिस की पूछताछ, उन्होंने कई मौकों पर पीछे हटने के बजाय सामने खड़े होकर जवाब दिया।
आज बेटे के सामने मां की यादें हैं
बुधवार को अस्पताल के बाहर हेमंत सोरेन जिस बेचैनी के साथ अपनी मां के स्वास्थ्य की खबर ले रहे थे, वही दिन रात तक एक बेहद निजी दुख में बदल गया।मां के कमरे के बाहर खड़े उस बेटे के पास अब डॉक्टरों से पूछने के लिए कोई अगली मेडिकल रिपोर्ट नहीं थी।
अब वहां सिर्फ यादें थीं।
रूपी सोरेन की आवाज, उनका संघर्ष, परिवार के लिए उनकी भूमिका और वह लंबा सफर, जिसमें उन्होंने शिबू सोरेन के संघर्ष के दिनों में घर को संभाला।जिस मां के लिए एक मुख्यमंत्री ने पूरे दिन अपनी सरकार को किनारे कर दिया, रात होते-होते वही मां हमेशा के लिए उनसे दूर चली गई।
सोरेन परिवार के लिए यह सिर्फ एक सदस्य को खोने का दुख नहीं है। यह उस स्तंभ के चले जाने का दर्द है, जो परिवार के राजनीतिक संघर्ष से पहले उसके भीतर की ताकत बना रहा।रूपी सोरेन की जिंदगी भले अब थम गई हो, लेकिन उनके संघर्ष और साहस की कहानियां झारखंड की राजनीतिक स्मृतियों में लंबे समय तक जीवित रहेंगी।












