जानिए कौन हैं झारखंड के ब्रजमोहन राम, जो बने ओडिशा के राज्यपाल; कभी दोस्तों ने चंदा जुटाकर डलवाया था जीप में डीजल, अब बने राज्यपाल, ऐसी सरलता जो जीत लेगी दिल
Meet Brajmohan Ram from Jharkhand, the new Governor of Odisha; once, friends pooled money to put diesel in his jeep—now he is a Governor—a man of such simplicity that he wins hearts.

लातेहार/चंदवा। बड़े मुकाम तक पहुंचने के लिए हमेशा बड़ी गाड़ी और मोटा बैंक बैलेंस जरूरी नहीं होता। कभी-कभी दोस्तों का भरोसा, जेब से निकले चंद रुपये और एक पुरानी जीप भी इतिहास लिखने की शुरुआत बन जाती है। झारखंड के चंदवा से निकलकर ओडिशा के राज्यपाल की संवैधानिक जिम्मेदारी तक पहुंचने वाले ब्रजमोहन राम की कहानी कुछ ऐसी ही है।आज उनके नाम के साथ राज्यपाल का पद जुड़ गया है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने फोन कर उनका हालचाल जाना, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने बधाई दी और भाजपा के दिग्गज नेता उनके आवास पर शुभकामनाएं देने पहुंचने लगे। लेकिन इस राजनीतिक सफर की सबसे दिलचस्प कहानी उस दौर में छिपी है, जब उनके दोस्तों का सपना था कि उनका अपना मित्र विधायक बने। उस समय चुनाव प्रचार की गाड़ी में डीजल भरवाने के लिए भी मित्रों को अपनी जेब ढीली करनी पड़ती थी।
कभी दोस्तों ने कहा- तुम चुनाव लड़ो, बाकी हम संभाल लेंगे!
आजकल चुनाव लड़ने की बात आते ही गाड़ियों का काफिला, बड़े-बड़े पोस्टर, चुनावी प्रबंधन और भारी-भरकम खर्च की चर्चा होने लगती है। लेकिन ब्रजमोहन राम के पहले विधानसभा चुनाव की कहानी एक अलग ही दौर की याद दिलाती है।
चंदवा में उनके मित्रों ने एक दिन तय किया कि उनका साथी विधायक बन सकता है। फिर क्या था, मित्रों की टोली जुट गई अपने दोस्त को चुनाव लड़ाने के मिशन में।राजेश चंद्र पाण्डेय, नरेश प्रसाद गुप्ता, नवल किशोर लाल, रामवृक्ष चौधरी, गणेश चौरसिया, स्वर्गीय सेवक मिस्त्री, स्वर्गीय रामजी राम वर्मा, चंद्रमोहन साहू और अशोक कुमार जैसे मित्रों ने उन्हें चुनाव लड़ने के लिए प्रेरित किया।
यह कोई ऐसा चुनावी अभियान नहीं था, जहां हर काम के लिए अलग-अलग पेशेवर टीम मौजूद हो। यहां दोस्तों की दोस्ती ही चुनाव कार्यालय थी और उनकी मेहनत ही चुनावी मशीनरी।किसी ने भाषण लिखने की जिम्मेदारी उठाई, ताकि सभाओं में नेता जी की बात दमदार अंदाज में रखी जा सके। किसी ने प्रचार में इस्तेमाल होने वाली जीप के लिए डीजल जुटाने का बीड़ा उठाया।
कोई खुद जीप चलाता था, तो कोई गांव-गांव जाकर लोगों से संपर्क करता और बूथ स्तर पर रणनीति बनाता था।यानी किसी के हाथ में भाषण के कागज थे, किसी के पास चुनावी रणनीति और किसी की जेब में जीप के डीजल के पैसे! संसाधन भले सीमित थे, लेकिन दोस्तों का भरोसा किसी बड़े चुनावी बजट से कम नहीं था।
जीप से शुरू हुआ सफर, बिहार विधानसभा से संसद तक पहुंचा
दोस्तों के इसी भरोसे के सहारे ब्रजमोहन राम ने पहली बार विधानसभा चुनाव लड़ने का फैसला किया। उस समय शायद किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी कि मित्रों की मेहनत से शुरू हुआ यह राजनीतिक सफर एक दिन उन्हें देश के संवैधानिक पद तक पहुंचा देगा।
समय बदला और ब्रजमोहन राम बिहार विधानसभा पहुंचे। इसके बाद उन्होंने लोकसभा की राजनीति में भी अपनी पहचान बनाई और तीन बार सांसद बने।अब राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा ओडिशा के राज्यपाल के रूप में उनकी नियुक्ति को मंजूरी दिए जाने के बाद उनके राजनीतिक सफर में एक नया अध्याय जुड़ गया है।
जिस नेता के चुनाव प्रचार की जीप के लिए कभी दोस्तों को डीजल का इंतजाम करना पड़ता था, आज उनकी नियुक्ति की खबर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गई है।राजनीति में कई लोग अपनी सफलता का श्रेय बड़े नेताओं, संगठन या चुनावी समीकरणों को देते हैं। ब्रजमोहन राम की शुरुआती चुनावी कहानी में हालांकि दोस्तों की भूमिका खास तौर पर सामने आती है। उनके मित्रों ने सिर्फ उन्हें चुनाव लड़ने की सलाह नहीं दी, बल्कि प्रचार अभियान में अपनी जिम्मेदारियां भी बांट ली थीं।
राज्यपाल बनने की खबर आई तो घर में शुरू हुई पूजा-अर्चना
राज्यपाल नियुक्त किए जाने की सूचना के बाद ब्रजमोहन राम के परिवार में खुशी का माहौल है। उनके घर में स्थित मंदिर में सपरिवार पूजा-अर्चना की गई। उन्होंने भगवान के सामने दंडवत प्रणाम कर आशीर्वाद लिया।परिवार के सदस्यों की आंखों में खुशी के आंसू थे।
यह सिर्फ एक नए पद की खुशी नहीं, बल्कि उस लंबे सफर का भावुक पड़ाव भी था, जिसमें संघर्ष, मेहनत, राजनीतिक उतार-चढ़ाव और अपनों का साथ शामिल रहा।इस खुशी को उस समय और भी खास पल मिला, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने फोन पर ब्रजमोहन राम के स्वास्थ्य का हालचाल जाना और उन्हें मिलने वाली नई जिम्मेदारी पर चर्चा की। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने भी फोन कर उन्हें बधाई दी।
भाजपा के तीन पूर्व प्रदेश अध्यक्ष भी पहुंचे बधाई देने
ब्रजमोहन राम की नियुक्ति की खबर के बाद उनके आवास पर शुभकामनाएं देने वालों का तांता लग गया। भाजपा झारखंड के तीन पूर्व प्रदेश अध्यक्ष दीपक प्रकाश, रविंद्र राय और दिनेशानंद गोस्वामी उनसे मिलने पहुंचे।तीनों नेताओं ने उन्हें बधाई देते हुए कहा कि ब्रजमोहन राम का राज्यपाल बनना झारखंड के लिए गौरव की बात है।
कभी चुनाव प्रचार में साथ देने वाले दोस्तों की यादों से जुड़ा यह सफर अब राष्ट्रीय राजनीति के बड़े चेहरों की शुभकामनाओं तक पहुंच गया है। चंदवा के उनके आवास पर जुट रही भीड़ इस उपलब्धि को लेकर स्थानीय लोगों के उत्साह को भी दर्शाती है।
राजभवन पहुंचकर भी नहीं भूले चंदवा की मिट्टी
किसी व्यक्ति की सफलता का एक पहलू उसका पद होता है, लेकिन दूसरा पहलू यह होता है कि ऊंचाई पर पहुंचने के बाद भी वह अपनी जड़ों से कितना जुड़ा रहता है।ब्रजमोहन राम की कहानी में चंदवा का स्थान इसी कारण खास है। उनके सार्वजनिक जीवन का जुड़ाव स्थानीय समाज और सामाजिक गतिविधियों से भी रहा है।
छठ व्रतियों की सेवा, करीब 55 वर्ष पुराने विवेकानंद किशोर संस्थान से जुड़ी जिम्मेदारियां और शवदाह गृह निर्माण में योगदान जैसे प्रसंग उनके स्थानीय सामाजिक संबंधों को रेखांकित करते हैं।इन गतिविधियों का महत्व इसलिए भी है, क्योंकि राजनीति में लंबे समय तक सक्रिय रहने वाले किसी व्यक्ति की पहचान सिर्फ चुनाव जीतने से नहीं बनती। उसके सामाजिक संबंध, स्थानीय लोगों के साथ जुड़ाव और सार्वजनिक जीवन में निभाई गई जिम्मेदारियां भी उसकी छवि का हिस्सा बनती हैं।
चुनावी मैदान से विधानसभा और फिर संसद तक का सफर तय होता है। वर्षों बाद उसी यात्रा में एक नया मोड़ आता है, जब ब्रजमोहन राम ओडिशा के राज्यपाल नियुक्त होते हैं।लेकिन इस कहानी का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि शुरुआत में किसी के पास भविष्य की गारंटी नहीं थी। दोस्तों ने यह सोचकर साथ नहीं दिया था कि एक दिन उनका साथी राज्यपाल बनेगा। उनका सपना तो बस इतना था कि उनका मित्र विधायक बने।
दोस्ती ने उन्हें चुनाव लड़ने का हौसला दिया, मेहनत ने राजनीतिक सफर को आगे बढ़ाया और वक्त ने उस सफर को राजभवन तक पहुंचा दिया।आज जब ब्रजमोहन राम की राज्यपाल के रूप में नियुक्ति की चर्चा हो रही है, तब उस पुरानी जीप और उसके डीजल का इंतजाम करने वाले दोस्तों की कहानी याद दिलाती है कि बड़ी उपलब्धियों की नींव अक्सर छोटे-छोटे सहयोग से रखी जाती है।












