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“मेरा पति शारीरिक संबंध नहीं बनाता है” जज साहब! एक बार भी नहीं बनाया संबंध, शादी औपचारिकता बन गयी है, फिर, कोर्ट ने रद्द कर दी शादी

"My husband doesn't have sex" Judge Sir! He hasn't had sex even once, marriage has become a formality, and the court annulled the marriage.

Court News/28.2.26 : वैवाहिक जीवन से जुड़ा एक संवेदनशील मामला फैमिली कोर्ट में सामने आया, जहां पति-पत्नी के बीच शारीरिक संबंध स्थापित न होने के आधार पर अदालत ने शादी को कानूनी रूप से निरस्त कर दिया। यह फैसला इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इसमें बिना लंबी सुनवाई, गवाही और विवाद के न्यायालय ने तथ्यों के आधार पर निर्णय सुनाया।

पत्नी ने अदालत में याचिका दायर करते हुए गंभीर आरोप लगाए। पत्नी ने कहा कि शादी के बाद उसके पति ने कभी भी शारीरिक संबंध बनाने की पहल नहीं की। उनकी शादी केवल औपचारिकता बनकर रह गई थी। महिला ने कोर्ट को बताया कि शुरुआत में उसे लगा कि संभवतः पति झिझक या संकोच के कारण दूरी बना रहा है और समय के साथ सब सामान्य हो जाएगा। लेकिन महीनों बीतने के बाद भी स्थिति जस की तस बनी रही।

पत्नी के अनुसार, उसने कई बार अपने पति से बातचीत कर वैवाहिक जीवन को सामान्य बनाने की कोशिश की, लेकिन पति लगातार शारीरिक संबंध बनाने से मना करता रहा। इससे उनके रिश्ते में भावनात्मक दूरी बढ़ती चली गई। अंततः हालात से निराश होकर महिला अपने मायके लौट आई।

फैमिली कोर्ट में याचिका

महिला ने पुणे फैमिली कोर्ट में विवाह निरस्तीकरण (Annulment) के लिए याचिका दायर की। उसने अदालत को बताया कि पति का व्यवहार वैवाहिक जिम्मेदारियों के विपरीत रहा है और शादी का मूल उद्देश्य ही पूरा नहीं हो सका।इस मामले में एक अहम मोड़ तब आया जब पति ने अदालत में अपने लिखित बयान में पत्नी के आरोपों को स्वीकार कर लिया। पति ने स्पष्ट रूप से माना कि शादी के बाद दोनों के बीच कभी भी शारीरिक संबंध स्थापित नहीं हो पाए।

बिना विवाद के आया फैसला

दोनों पक्षों के बयानों में तथ्य स्पष्ट होने और किसी प्रकार का विवाद न रहने के कारण अदालत ने लंबी सुनवाई आवश्यक नहीं समझी। मामले की सुनवाई कर रहे जज बी. डी. कदम ने सभी तथ्यों पर विचार करते हुए शादी को कानूनी रूप से निरस्त कर दिया।अदालत ने अपने फैसले में कहा कि विवाह केवल सामाजिक अनुबंध नहीं, बल्कि आपसी जिम्मेदारियों और दांपत्य जीवन की मूलभूत अपेक्षाओं पर आधारित संस्था है। यदि पति-पत्नी के बीच वैवाहिक संबंध ही स्थापित नहीं हो पाते, तो विवाह का उद्देश्य प्रभावित होता है।

हिंदू मैरिज एक्ट का हवाला

अदालत ने हिंदू मैरिज एक्ट के प्रावधानों का हवाला देते हुए कहा कि यदि मामले के तथ्य निर्विवाद हों और संबंधित पक्ष स्वयं परिस्थितियों को स्वीकार कर ले, तो न्यायालय बिना अनावश्यक देरी के निर्णय दे सकता है।कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि ऐसे मामलों में लंबी न्यायिक प्रक्रिया दोनों पक्षों की मानसिक स्थिति पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकती है। इसलिए न्यायालय का दायित्व है कि स्पष्ट तथ्यों के आधार पर समयबद्ध निर्णय दिया जाए।

सामाजिक और कानूनी दृष्टिकोण

यह मामला न केवल कानूनी दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि सामाजिक स्तर पर भी चर्चा का विषय बन गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला वैवाहिक अधिकारों, व्यक्तिगत गरिमा और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े पहलुओं को रेखांकित करता है।फिलहाल, अदालत के इस निर्णय को वैवाहिक कानूनों के व्यावहारिक और संवेदनशील अनुप्रयोग के उदाहरण के रूप में देखा जा रहा है।

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