पत्नी की मानसिक बीमारी और क्रूरता साबित नहीं कर सका पति, झारखंड हाईकोर्ट ने खारिज की तलाक की अपील, कोर्ट ने कहा, मुश्किल वक्त में साथ निभाना भी शादी का हिस्सा
झारखंड हाईकोर्ट ने पत्नी पर क्रूरता और मानसिक बीमारी का आरोप लगाने वाले पति की तलाक अपील खारिज की। जानें अदालत ने अपने फैसले में क्या कहा।

रांची। शादी का रिश्ता सिर्फ अच्छे दिनों में साथ रहने का नाम नहीं, बल्कि मुश्किल परिस्थितियों में एक-दूसरे का सहारा बनने की भी जिम्मेदारी है। केवल पत्नी के असामान्य व्यवहार या मानसिक बीमारी का आरोप लगाकर पति तलाक नहीं मांग सकता। झारखंड हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में यह टिप्पणी करते हुए पत्नी पर क्रूरता और मानसिक बीमारी का आरोप लगाने वाले पति की अपील खारिज कर दी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि तलाक के लिए लगाए गए आरोपों को ठोस सबूतों से साबित करना जरूरी है। इसके साथ ही अदालत ने चतरा फैमिली कोर्ट के उस फैसले को बरकरार रखा, जिसमें पति की तलाक याचिका खारिज कर दी गई थी।
क्या है पूरा मामला?
मामला एक ऐसे दंपती से जुड़ा है, जिनकी शादी 31 जनवरी 2016 को हुई थी। दोनों का एक बेटा भी है। पति केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (CISF) में कार्यरत था और उसकी पोस्टिंग राजस्थान के कोटा में थी। पति ने अदालत में आरोप लगाया था कि शादी के शुरुआती दिनों से ही पत्नी का व्यवहार असामान्य और आक्रामक था।
उसका दावा था कि पत्नी बिना वजह हंसती थी, खुद से बातें करती थी और रिश्तेदारों के सामने भी उचित कपड़ों के बिना आ जाती थी। पति ने यह भी आरोप लगाया कि पत्नी की मानसिक बीमारी की जानकारी शादी से पहले उससे छिपाई गई थी।वहीं, पत्नी ने इन आरोपों को गलत बताते हुए पति पर दहेज के लिए पांच लाख रुपये मांगने और प्रताड़ित करने का आरोप लगाया था।
फैमिली कोर्ट के फैसले को हाईकोर्ट में दी थी चुनौती
पति ने हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13(1)(ia) और 13(1)(iii) के तहत क्रूरता और मानसिक बीमारी को आधार बनाकर तलाक की मांग की थी। हालांकि, फैमिली कोर्ट, चतरा ने 7 सितंबर 2024 को उसकी याचिका खारिज कर दी थी।इसके बाद पति ने फैमिली कोर्ट के फैसले को झारखंड हाईकोर्ट में चुनौती दी। जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और जस्टिस प्रदीप कुमार श्रीवास्तव की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई की।
क्रूरता के आरोपों पर कोर्ट ने क्या कहा?
हाईकोर्ट ने पाया कि पति और उसके गवाह पत्नी की ओर से की गई किसी खास शारीरिक हिंसा, गाली-गलौज या प्रताड़ना की घटना का स्पष्ट विवरण नहीं दे सके। लगाए गए आरोप सामान्य प्रकृति के थे और उनके समर्थन में पर्याप्त सबूत भी पेश नहीं किए गए थे।अदालत ने यह भी गौर किया कि पति के परिवार के लोग शादी से पहले ही पत्नी को जानते थे। ऐसे में मानसिक बीमारी की जानकारी छिपाए जाने का दावा भी भरोसेमंद नहीं पाया गया।
मानसिक बीमारी साबित करने के लिए जरूरी है विशेषज्ञ रिपोर्ट
पति ने पत्नी की मनोवैज्ञानिक जांच रिपोर्ट का हवाला देते हुए स्किजोफ्रेनिया जैसी बीमारी होने का दावा किया था। लेकिन हाईकोर्ट ने पाया कि रिपोर्ट में बीमारी की स्पष्ट पुष्टि नहीं की गई थी।मामले में रांची स्थित रिनपास में मेडिकल बोर्ड ने भी पत्नी की जांच की थी। दोनों पक्षों की मौजूदगी में हुई जांच के बाद बोर्ड ने पत्नी में किसी मानसिक बीमारी के लक्षण नहीं पाए थे।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13(1)(iii) के तहत मानसिक बीमारी को तलाक का आधार बनाने के लिए उसकी गंभीरता और प्रकृति साबित करनी होगी। इसके लिए विशेषज्ञ साक्ष्य जरूरी हैं। केवल असामान्य व्यवहार या कुछ घटनाओं के आधार पर किसी को मानसिक रूप से बीमार नहीं माना जा सकता।
बेटे की देखभाल कर रही थी पत्नी, साथ रहने की भी जताई इच्छा
सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी पाया कि पत्नी न्यायालय में पूछे गए सवालों का सामान्य और उचित तरीके से जवाब दे रही थी। वह अपने बेटे की देखभाल कर रही थी और उसने पति के साथ दोबारा वैवाहिक जीवन शुरू करने की इच्छा भी जताई थी।वहीं, पति ने स्वीकार किया कि उसने पत्नी और बच्चे के भरण-पोषण के लिए कोई आर्थिक सहायता नहीं दी थी।
शादी सिर्फ सुख के दिनों का रिश्ता नहीं : हाईकोर्ट
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का हवाला देते हुए कहा कि भारतीय समाज में विवाह को विशेष महत्व दिया जाता है। वैवाहिक जीवन में अच्छे और बुरे दोनों तरह के दिन आते हैं। कई बार बीमारी और दूसरी कठिन परिस्थितियां भी सामने आती हैं, लेकिन पति-पत्नी को मिलकर उनका सामना करना चाहिए।अदालत ने माना कि पति अपनी पत्नी के खिलाफ लगाए गए क्रूरता और मानसिक बीमारी के आरोपों को पर्याप्त साक्ष्यों से साबित नहीं कर सका। ऐसे में तलाक देने का कोई कानूनी आधार नहीं बनता।
पति की अपील खारिज, फैमिली कोर्ट का फैसला बरकरार
सभी तथ्यों, मेडिकल रिपोर्ट और उपलब्ध साक्ष्यों पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने पति की अपील खारिज कर दी। अदालत ने चतरा फैमिली कोर्ट के 7 सितंबर 2024 के फैसले को बरकरार रखा।इस फैसले में हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि वैवाहिक विवादों में केवल आरोप लगाना पर्याप्त नहीं है। तलाक के लिए कानून में निर्धारित आधारों को विश्वसनीय साक्ष्यों के साथ साबित करना जरूरी है।












