झारखंड शिक्षक ट्रांसफर न्यूज : इन शिक्षकों के तबादले का रास्ता हुआ साफ, झारखंड हाईकोर्ट ने शिक्षकों को दी राहत, जानिये कोर्ट ने क्या कहा…

रांची: झारखंड में शिक्षकों के तबादले से जुड़ी एक बड़ी खबर है। शिक्षकों के ट्रांसफर पर दायर याचिका पर हाईकोर्ट ने शिक्षकों को राहत दी है। गंभीर और लाइलाज बीमारी से जूझ रहे शिक्षकों या उनके पति-पत्नी और बच्चों के इलाज के आधार पर अंतर जिला तबादले के मामले में झारखंड हाईकोर्ट ने अहम फैसला सुनाया है।
न्यायमूर्ति दीपक रोशन की अदालत ने पश्चिमी सिंहभूम जिला शिक्षा स्थापना समिति के 24 जुलाई 2025 के फैसले को रद्द कर दिया है। इस फैसले के तहत शिक्षकों के तबादले के दावे खारिज कर दिए गए थे। अब अदालत ने संबंधित अधिकारियों को सभी याचिकाकर्ताओं के रिकॉर्ड प्राथमिक शिक्षा निदेशक के पास भेजने और 10 सप्ताह के भीतर तबादले की प्रक्रिया पूरी करने का निर्देश दिया है।
दो याचिकाओं में 90 शिक्षकों ने उठाया था अपना मामला
यह मामला W.P.(S) No. 6511 of 2025 और W.P.(S) No. 6729 of 2025 से जुड़ा है। पश्चिमी सिंहभूम जिले के प्राथमिक विद्यालयों में कार्यरत कुल 90 शिक्षकों ने जिला शिक्षा स्थापना समिति के फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। उनकी ओर से अधिवक्ता मनोज टंडन ने पक्ष रखा।
याचिकाकर्ताओं का कहना था कि राज्य सरकार की तबादला नीति के तहत उनके मामलों की जांच की गई थी। मेडिकल बोर्ड ने भी संबंधित शिक्षकों या उनके परिजनों की गंभीर बीमारी की पुष्टि की थी। इसके बावजूद जिला स्तर पर तबादले के प्रस्तावों को मंजूरी नहीं दी गई।
मेडिकल जांच में बीमारी की पुष्टि, फिर भी आगे नहीं बढ़ी फाइल
शिक्षा विभाग ने 15 मई 2025 को पत्र जारी कर पात्र शिक्षकों से दूसरे जिलों में तबादले के विकल्प मांगे थे। इसके बाद संबंधित मामलों की जांच के लिए मेडिकल बोर्ड गठित किया गया। 23 जून, 4 जुलाई और 10 जुलाई 2025 को हुई जांच के बाद मेडिकल बोर्ड ने संबंधित मामलों में लाइलाज बीमारी की पुष्टि की।
सिविल सर्जन सह मुख्य चिकित्सा पदाधिकारी ने भी जिला शिक्षा अधीक्षक को रिपोर्ट भेजी थी। इसके बाद मामलों को सक्षम प्राधिकार की मंजूरी के लिए भेजा जाना था, लेकिन जिला शिक्षा स्थापना समिति ने तबादले के दावों को खारिज कर दिया।
शिक्षकों की कमी का हवाला देकर रोका गया था तबादला
जिला शिक्षा स्थापना समिति ने अपने फैसले में जिले का शिक्षक-छात्र अनुपात 51:1 होने का हवाला दिया था। प्रशासन की दलील थी कि शिक्षकों के तबादले से विद्यालयों में पढ़ाई प्रभावित हो सकती है। इसके अलावा 68 स्कूलों में शिक्षकों की कमी की आशंका और मैट्रिक परीक्षा के खराब परिणाम का भी उल्लेख किया गया था।राज्य सरकार की ओर से यह तर्क भी दिया गया कि तबादला सेवा का हिस्सा है और किसी कर्मचारी को अपनी पसंद के स्थान पर पदस्थ रहने का अधिकार नहीं है।
राज्य की तबादला नीति को बनाया फैसले का आधार
हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की 14 मई 2025 की अधिसूचना पर विचार किया। इस नीति में दिव्यांगता और गंभीर या दुर्लभ लाइलाज बीमारी जैसी विशेष परिस्थितियों में शिक्षक-छात्र अनुपात के आधार पर तबादले का दावा खारिज करने से छूट का प्रावधान बताया गया है।
अदालत ने पाया कि संबंधित शिक्षकों के मामलों की मेडिकल जांच के बाद भी उनके प्रस्तावों को जिला स्तर पर खारिज करना राज्य सरकार की नीति के अनुरूप नहीं था। अदालत के अनुसार, रिकॉर्ड को मंजूरी के लिए प्राथमिक शिक्षा निदेशक के पास भेजा जाना चाहिए था।
अब निदेशक के स्तर पर होगा तबादले के दावों का निपटारा
हाईकोर्ट ने पश्चिमी सिंहभूम के उपायुक्त और जिला शिक्षा अधीक्षक को दोनों याचिकाओं से संबंधित सभी शिक्षकों के रिकॉर्ड प्राथमिक शिक्षा निदेशक को भेजने का निर्देश दिया है। निदेशक को रिकॉर्ड की जांच कर लागू तबादला नीति के अनुसार मंजूरी देने और तबादला आदेश जारी करने की प्रक्रिया पूरी करनी होगी।
अदालत ने आदेश की प्रति प्राप्त होने के बाद पूरी प्रक्रिया के लिए 10 सप्ताह की समयसीमा तय की है। इसके साथ ही दोनों रिट याचिकाओं को स्वीकार कर लिया गया और लंबित अंतरिम आवेदनों का भी निपटारा कर दिया गया।
इस फैसले से गंभीर बीमारी से जुड़ी विशेष परिस्थितियों में अंतर जिला तबादले की मांग कर रहे 90 शिक्षकों के मामलों में आगे की कार्रवाई का रास्ता खुल गया है। हालांकि, संबंधित शिक्षकों का वास्तविक तबादला लागू नीति के तहत जांच और सक्षम प्राधिकार की मंजूरी के बाद ही होगा।










