झारखंड हाईकोर्ट का कर्मचारियों पर बड़ा फैसला: पेंशन कटौती का आदेश रद्द, कहा– बिना जांच आरोपों के आधार पर कार्रवाई नहीं, कोर्ट ने की ये कड़ी टिप्पणी
Jharkhand High Court's major decision on employees: Pension deduction order cancelled, said- no action based on allegations without investigation, court made these strong remarks

झारखंड हाईकोर्ट ने कर्मचारियों की पेंशन में कटौती के राज्य सरकार के फैसले को खारिज कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि बिना विधिसम्मत जांच के केवल आरोपों के आधार पर पेंशन में कटौती नहीं की जा सकती।
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रांची। झारखंड हाईकोर्ट ने रिटायर कर्मचारी की पेंशन में कटौती को लेकर राज्य सरकार को बड़ा झटका दिया है। अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा है कि केवल आरोपों के आधार पर किसी कर्मचारी की पूरी सेवा को “असंतोषजनक” नहीं माना जा सकता और बिना विधिसम्मत जांच के पेंशन में कटौती करना कानून के खिलाफ है।
खंडपीठ ने सरकार की अपील खारिज की
झारखंड हाईकोर्ट की खंडपीठ, जिसमें मुख्य न्यायाधीश एमएस सोनक और न्यायमूर्ति राजेश शंकर शामिल थे, ने इस मामले में राज्य सरकार की दो अलग-अलग अपीलों को खारिज कर दिया। कोर्ट ने एकल पीठ के पहले के फैसले को बरकरार रखते हुए उसमें हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।खंडपीठ ने अपने फैसले में कहा कि “सिर्फ आरोप लगाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन्हंर विधिसम्मत जांच में साबित करना आवश्यक है।” अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि कानून में निर्धारित प्रक्रिया का पालन किए बिना इस तरह की कार्रवाई नहीं की जा सकती।
क्या था पूरा मामला
मामला दो सेवानिवृत्त इंजीनियरों—नबीन नारायण और रामचंद्र रजक—से जुड़ा है। राज्य सरकार ने इन दोनों अधिकारियों की पेंशन में 5 प्रतिशत की कटौती दो वर्षों के लिए कर दी थी।
सरकार का आरोप था कि वर्ष 2014-15 में नहर सफाई और पुनर्स्थापन कार्यों के दौरान अनियमितताएं हुई थीं। इसी आधार पर सेवानिवृत्ति के बाद इन अधिकारियों को नोटिस जारी कर उनकी पेंशन में कटौती का निर्णय लिया गया था।
कोर्ट की सख्त टिप्पणी
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि संबंधित अधिकारियों के सेवा काल के दौरान उनके खिलाफ कोई विभागीय कार्रवाई नहीं की गई थी। ऐसे में सेवानिवृत्ति के बाद केवल नोटिस जारी कर पेंशन में कटौती करना उचित नहीं है।अदालत ने यह भी कहा कि किसी कर्मचारी की पूरी सेवा रिकॉर्ड को देखे बिना उसे “असंतोषजनक” नहीं माना जा सकता। यदि गंभीर कदाचार (grave misconduct) का आरोप है, तो उसे साबित करने के लिए विधिवत विभागीय जांच या आपराधिक कार्यवाही आवश्यक है।
विधिसम्मत प्रक्रिया का पालन जरूरी
खंडपीठ ने जोर देकर कहा कि किसी भी कर्मचारी के खिलाफ कार्रवाई करते समय कानून द्वारा निर्धारित प्रक्रिया का पालन करना अनिवार्य है। यदि जांच प्रक्रिया पूरी नहीं की गई है, तो केवल आरोपों के आधार पर दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जा सकती।
कर्मचारियों के अधिकारों पर महत्वपूर्ण फैसला
यह फैसला सरकारी कर्मचारियों और अधिकारियों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इससे यह स्पष्ट संदेश गया है कि सेवानिवृत्ति के बाद भी कर्मचारियों के अधिकार सुरक्षित हैं और बिना ठोस जांच के उनकी पेंशन या अन्य लाभों में कटौती नहीं की जा सकती।
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, यह निर्णय भविष्य में ऐसे मामलों में मार्गदर्शक साबित होगा और प्रशासनिक निर्णयों में पारदर्शिता और विधिसम्मत प्रक्रिया के पालन को सुनिश्चित करेगा।









