“झारखंड में कुछ मनबढू अधिकारियों का रवैया तानाशाह जैसा” तस्वीर शेयर कर बाबूलाल मरांडी क्यों भड़क गये अफसरशाही पर, मुख्यमंत्री से कहा, इन्हें औकात याद दिलाईये…

झारखंड में एक वायरल तस्वीर को लेकर सियासी घमासान शुरू हो गया है। नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने इसे लोकतंत्र और जनप्रतिनिधियों के सम्मान से जुड़ा मुद्दा बताते हुए अफसरशाही पर तीखा हमला बोला है।
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रांची। झारखंड के नेता प्रतिपक्ष Babulal Marandi ने सोशल मीडिया पर एक तस्वीर साझा करते हुए राज्य की अफसरशाही पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने इस तस्वीर को “सत्ता पोषित घमंड और व्यवस्था की सड़ांध का जीता-जागता प्रमाण” बताया है।मरांडी ने अपने पोस्ट में कहा कि यह तस्वीर केवल एक दृश्य नहीं, बल्कि उस मानसिकता को दर्शाती है, जिसमें जनप्रतिनिधियों को सम्मान देने के बजाय उन्हें एक सामान्य फरियादी की तरह व्यवहार किया जा रहा है।
उन्होंने सवाल उठाया कि एक ओर जनता द्वारा चुनी गई महिला विधायक हैं और दूसरी ओर एक विवादों में घिरे अधिकारी, लेकिन व्यवहार ऐसा है मानो सत्ता का संतुलन पूरी तरह उलट गया हो।उन्होंने इसे लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों के खिलाफ बताते हुए कहा कि जब देश के प्रधानमंत्री तक आम नागरिकों को सम्मान देते हैं, तो राज्य स्तर के अधिकारी किस आधार पर इस तरह का व्यवहार कर रहे हैं।
उनका कहना था कि जो अधिकारी एक विधायक की गरिमा को नहीं समझ सकता, वह आम जनता के साथ कैसा व्यवहार करेगा, इसका सहज अंदाजा लगाया जा सकता है।मरांडी ने पथ निर्माण विभाग का भी जिक्र करते हुए कहा कि यह विभाग पहले ही भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरा रहा है और अब उसके अधिकारियों का यह रवैया स्थिति को और गंभीर बना रहा है।
उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ अधिकारी खुद को “दरबारी संस्कृति” का हिस्सा मानने लगे हैं और जनप्रतिनिधियों को भी उसी नजर से देखने लगे हैं।इस मामले को उन्होंने महिला सम्मान से भी जोड़ा और कहा कि एक महिला विधायक के साथ इस तरह का व्यवहार और भी चिंताजनक है। यह केवल व्यक्तिगत अपमान नहीं, बल्कि पूरे लोकतांत्रिक ढांचे पर सवाल खड़े करता है।
मरांडी ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को संबोधित करते हुए कड़ी कार्रवाई की मांग की है। उन्होंने कहा कि ऐसे “बेलगाम और मनमाने” अधिकारियों को उनकी सीमाएं समझाना जरूरी है और यह स्पष्ट करना चाहिए कि वे जनता के सेवक हैं, शासक नहीं।
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उन्होंने चेतावनी दी कि यदि इस मामले में कार्रवाई नहीं होती है, तो यह संदेश जाएगा कि राज्य में वास्तविक सत्ता अधिकारियों के हाथ में है और जनप्रतिनिधि केवल औपचारिक भूमिका में हैं। उन्होंने यह भी कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था की गरिमा बनाए रखने के लिए अनुशासन और जवाबदेही अनिवार्य है।









