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भारतीय सेना में 5 साल बाद सोशल मीडिया की वापसी, लेकिन ‘सिर्फ देखने’ की शर्त पर

नई दिल्ली / 25 Dec 20025 – पिछले पांच सालों से भारतीय सेना के जवानों की डिजिटल दुनिया एक तरह से थमी हुई थी। 2020 में जासूसी और सुरक्षा के खतरों के बीच 89 ऐप्स पर लगे सख्त प्रतिबंध ने बैरकों में सन्नाटा खींच दिया था। लेकिन अब यह सन्नाटा टूटने वाला है। बदलते वक्त की नब्ज को पहचानते हुए, सेना ने एक बड़ा नीतिगत बदलाव किया है और अपने जवानों को सोशल मीडिया की दुनिया में लौटने की इजाजत दे दी है लेकिन अनुशासन की ‘हथकड़ी’ के साथ।

यह फैसला पूर्ण प्रतिबंध (total ban) से नियंत्रित जुड़ाव (controlled engagement) की ओर एक बड़ा कदम है। सूत्रों के मुताबिक, नई गाइडलाइन का मूल मंत्र ‘पैसिव कंजम्पशन’ है यानी आप सिर्फ देख सकते हैं। अब जवान इंस्टाग्राम पर रील्स, फोटो और वीडियो देख तो सकेंगे, लेकिन ‘लाइक’ या ‘कमेंट’ करने की सख्त मनाही है। यह बारीक लकीर इसलिए खींची गई है ताकि जवान सामाजिक रूप से दुनिया से जुड़े रहें, लेकिन अपना कोई ऐसा डिजिटल निशान (digital footprint) न छोड़ें जिसे दुश्मन ट्रैक कर सकें।

राहत का दायरा सिर्फ मनोरंजन तक सीमित नहीं है। वॉट्सएप और टेलीग्राम जैसे ऐप्स का इस्तेमाल अब गैर-गोपनीय जानकारी साझा करने के लिए किया जा सकेगा। वहीं, यूट्यूब और X (पूर्व में ट्विटर) का उपयोग दुनिया भर की जानकारी और अपडेट्स रखने के लिए मान्य होगा। संदेश ऊपर से बिल्कुल साफ है: इन टूल्स का इस्तेमाल सीखने और अपडेट रहने के लिए करें, प्रसारण या राय देने के लिए नहीं।

इस दरवाजे के खुलने के महत्व को समझने के लिए हमें यह देखना होगा कि इसे बंद क्यों किया गया था। 2020 का प्रतिबंध कोई मनमाना फैसला नहीं था, बल्कि यह ‘हनीट्रैप’ के बढ़ते मामलों के खिलाफ एक जरूरी रक्षा कवच था। उस दौर में विदेशी खुफिया एजेंसियां—खासकर पाकिस्तान की ISI—फर्जी प्रोफाइल के जरिए जवानों को लुभाकर उनसे संवेदनशील जानकारी निकाल रही थीं।

फेसबुक, टिकटॉक, जूम और पबजी जैसे ऐप्स पर लगा वह बैन सूचनाओं के लीकेज को रोकने के लिए था। सेना का मानना था कि इन ऐप्स से जुटाए गए डेटा का इस्तेमाल सीमा पर तनाव पैदा करने के लिए किया जा रहा था। हालांकि, पूरी तरह से ‘ब्लैकआउट’ ने एक विरोधाभास भी पैदा किया। आज के दौर में, जहां सूचना ही शक्ति है, जवानों को खबरों और वैश्विक रुझानों के मुख्य स्रोतों से काट देना उन्हें अलग-थलग कर रहा था। सेना के शीर्ष अधिकारियों ने महसूस किया कि जवानों को अनिश्चित काल तक ‘डिजिटल बंकर’ में नहीं रखा जा सकता।

“समय के साथ इंफॉर्मेशन की दुनिया बदल रही है, और सेना खुद को इससे दूर नहीं रख सकती।” – सेना सूत्र

सूत्रों का यह बयान सेना मुख्यालय के भीतर आई व्यावहारिक सोच को दर्शाता है। यह बदलाव सिर्फ मनोरंजन के लिए नहीं है, बल्कि ‘सिचुएशनल अवेयरनेस’ (situational awareness) के लिए है। सोशल मीडिया के जरिए जवान अब खुद को देश और विदेश में होने वाली घटनाओं से अपडेट रख सकेंगे, जो एक आधुनिक सैनिक के लिए बेहद जरूरी है।

यह नई नीति जवानों के मनोबल (morale) और राष्ट्रीय सुरक्षा (security) के बीच एक बेहद सधा हुआ संतुलन है। एक्सेस देकर सेना ने अपने जवानों की मानवीय जरूरतों को स्वीकार किया है; वहीं सख्त शर्तें लगाकर वर्दी के अनुशासन को भी कायम रखा है। डिजिटल वनवास अब खत्म हो चुका है, लेकिन सेना की निगाहें अब भी खुली रहेंगी यह सुनिश्चित करने के लिए कि जब जवान अपनी स्क्रीन देख रहे हों, तो कोई दुश्मन उन पर नजर न रख रहा हो।

Source
aajtak

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