झारखंड- अनुबंधकर्मियों का नियमितिकरण मामला : 10 साल से अधिक सेवा देने वाले संविदा कर्मियों का होगा नियमितीकरण! सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने तय की समय सीमा….
Jharkhand - Contract workers regularization case: Contract workers who have served for more than 10 years will be regularized! The High Court set a deadline during the hearing.

झारखंड हाईकोर्ट में 10 वर्षों से अधिक सेवा दे चुके संविदा कर्मियों के नियमितीकरण से जुड़े मामले में दायर अवमानना याचिका पर महत्वपूर्ण सुनवाई हुई। सरकार का पक्ष जानने के बाद अदालत ने याचिका समाप्त कर दी।
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रांची/15.2.26। राज्य में वर्षों से कार्यरत संविदा कर्मियों के नियमितीकरण से जुड़े महत्वपूर्ण मामले में झारखंड हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान अहम घटनाक्रम सामने आया। 10 वर्षों से अधिक सेवा दे चुके कर्मचारियों के नियमितीकरण संबंधी आदेश के अनुपालन में कथित देरी को लेकर दायर अवमानना याचिका पर सुनवाई करते हुए अदालत ने सरकार का पक्ष जानने के बाद याचिका को समाप्त (ड्रॉप) कर दिया।
अवमानना याचिका रंजीत कुमार द्वारा दायर की गई थी। सुनवाई के दौरान अदालत के पूर्व आदेश के आलोक में उच्च एवं तकनीकी शिक्षा विभाग के प्रधान सचिव स्वयं कोर्ट में उपस्थित हुए। न्यायमूर्ति आनंदा सेन की अदालत ने सरकार से विस्तृत स्थिति रिपोर्ट प्राप्त की और उसके बाद अवमानना याचिका को समाप्त करने का निर्णय लिया।
दरअसल, इससे पहले अदालत ने 15 जनवरी 2024 को पारित आदेश के अनुपालन में विलंब को गंभीरता से लेते हुए प्रधान सचिव को अवमानना नोटिस जारी किया था। नोटिस में पूछा गया था कि आदेश की अवहेलना के लिए उनके विरुद्ध आरोप तय क्यों न किए जाएं।
उल्लेखनीय है कि 15 जनवरी 2024 को हाईकोर्ट ने कई रिट याचिकाओं पर एक साथ निर्णय सुनाया था। यह मामला राज्य सरकार के विभिन्न विभागों, विश्वविद्यालयों और अन्य संस्थानों में लंबे समय से कार्यरत संविदा, अस्थायी और दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों के नियमितीकरण से संबंधित था। उस समय मामले की सुनवाई तत्कालीन न्यायमूर्ति डॉ. एस. एन. पाठक की अदालत में हुई थी।
अपने आदेश में अदालत ने स्पष्ट टिप्पणी करते हुए कहा था कि राज्य सरकार द्वारा वर्षों तक सेवाएं लेने के बावजूद नियमितीकरण से इनकार करना अनुचित और मनमाना प्रतीत होता है। कोर्ट ने कहा था कि जो कर्मचारी 10 वर्षों या उससे अधिक समय से बिना किसी शिकायत या अनुशासनात्मक कार्रवाई के लगातार सेवा दे रहे हैं, उनके मामलों पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए।
अदालत ने राज्य सरकार की उस नीति पर भी सवाल उठाया था, जिसमें नियमितीकरण के बजाय आउटसोर्सिंग के माध्यम से नियुक्तियों को जारी रखा जा रहा था। कोर्ट ने इसे कानून के उद्देश्य के विपरीत बताया था।
हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया था कि प्रत्येक कर्मचारी के मामले की व्यक्तिगत जांच की जाए। यदि किसी प्रकार की कानूनी बाधा न हो तो नियमितीकरण पर आदेश पारित किया जाए। इसके लिए सरकार को 16 सप्ताह की समयसीमा निर्धारित की गई थी।
कोर्ट ने यह भी कहा था कि याचिका लंबित रहने के दौरान यदि कोई कर्मचारी सेवानिवृत्त हो चुका है और उसने 10 वर्षों से अधिक सेवा दी है, तो उसे भी पूर्व प्रभाव से नियमितीकरण और परिणामी लाभ प्रदान किए जाएं।
इसके अतिरिक्त, अदालत ने सरकार को एक उच्च स्तरीय समिति (High Powered Committee) गठित करने का निर्देश दिया था, ताकि नियमितीकरण से जुड़े मामलों का व्यवस्थित निपटारा हो सके और बार-बार न्यायालय में मुकदमेबाजी की आवश्यकता न पड़े।









