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31 साल पुराने फायरिंग केस में बड़ी राहत, झारखंड हाईकोर्ट ने दो दोषियों को किया बरी, निचली अदालत ने 3-3 साल और जुर्माने की दी थी सजा

Major relief in a 31-year-old firing case: The Jharkhand High Court has acquitted two convicts; the lower court had previously sentenced them to three years in prison and a fine.

Ranchi: लगभग 31 साल पुराने फायरिंग और घर में घुसकर हमला करने के मामले में Jharkhand High Court ने अहम फैसला सुनाते हुए निचली अदालत द्वारा दोषी ठहराए गए दो आरोपियों उमा शंकर सिंह  एवं अन्य को बरी कर दिया। न्यायाधीश प्रदीप कुमार श्रीवास्तव की अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित करने में विफल रहा और ट्रायल कोर्ट ने साक्ष्यों का सही मूल्यांकन नहीं किया।

मामला वर्ष 1995 का है। शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया था कि जमीन खरीद-बिक्री के विवाद के बाद आरोपियों ने पहले उससे जबरन एक कथित ऋण पत्र पर हस्ताक्षर करवाए और बाद में 25 जुलाई 1995 को उसके घर पहुंचकर जान से मारने की नीयत से फायरिंग की। इस मामले में देवघर थाना कांड संख्या 157/1995 दर्ज किया गया था।

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बाद में ट्रायल कोर्ट ने दोनों आरोपियों को भारतीय दंड संहिता की धारा 452 तथा मुख्य आरोपी को शस्त्र अधिनियम की धारा 27 के तहत दोषी ठहराते हुए तीन-तीन वर्ष के कठोर कारावास और जुर्माने की सजा सुनाई थी।

हालांकि, हाईकोर्ट ने अपील की सुनवाई के दौरान पाया कि घटना के स्वतंत्र प्रत्यक्षदर्शी उपलब्ध नहीं थे। अधिकांश गवाहों ने केवल फायरिंग की आवाज सुनने या शिकायतकर्ता से घटना की जानकारी मिलने की बात कही। घटनास्थल से कोई खाली कारतूस बरामद नहीं हुआ, कथित ऋण पत्र भी अदालत में पेश नहीं किया गया और जांच अधिकारी की गवाही भी नहीं हुई। ऐसे में अभियोजन पक्ष आरोपों को पर्याप्त रूप से सिद्ध नहीं कर सका। हाईकोर्ट में आरोपियों का पक्ष अधिकवक्ता संतोष कुमार ने रखा।

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अदालत ने यह भी कहा कि घटना घर के बाहर हुई थी, इसलिए भारतीय दंड संहिता की धारा 452 (घर में घुसकर अपराध करना) भी इस मामले में लागू नहीं होती। इन परिस्थितियों में ट्रायल कोर्ट का निर्णय कानून की दृष्टि से त्रुटिपूर्ण पाया गया।

न्यायालय ने 12 अप्रैल 2005 को सुनाए गए दोषसिद्धि और सजा के आदेश को निरस्त करते हुए दोनों अपीलकर्ताओं को सभी आरोपों से बरी कर दिया। साथ ही उनके जमानत बांड और जमानतदारों को भी मुक्त करने का आदेश दिया। यह निर्णय 24 जून 2026 को सुनाया गया।

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अमिताभ सिन्हा

अमिताभ सिन्हा hpbltop.com के वरिष्ठ राजनीतिक संपादक हैं। पत्रकारिता में 12 वर्षों से अधिक के अनुभव के साथ, उन्हें भारतीय राजनीति, चुनावी रणनीतियों और संसद की कार्यवाही की गहरी समझ है। अमिताभ की रिपोर्टिंग तथ्यों पर आधारित और निष्पक्ष होती है। वे जटिल सरकारी नीतियों को सरल भाषा में पाठकों तक पहुँचाने में माहिर हैं। खाली समय में वे राजनीतिक इतिहास पढ़ना पसंद करते हैं। ईमेल: amitabh@hpbltop.com

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