रांची: पत्नी अलग खाना बनाती थी, बात भी नहीं करती थी… पति ने मांगा तलाक, हाईकोर्ट ने सुनाया चौंकाने वाला फैसला
झारखंड हाईकोर्ट ने तलाक के मामले में कहा कि सामान्य वैवाहिक खटास, अलग रहना या बातचीत न करना मात्र मानसिक क्रूरता नहीं है। पति की अपील खारिज कर फैमिली कोर्ट का फैसला बरकरार रखा।

रांची। पति-पत्नी संबंध पर हाईकोर्ट ने बेहद अहम फैसला सुनाया है। पत्नी अलग खाना बनाती थी, बातचीत नहीं करती थी और पति का दावा था कि 2012 के बाद दोनों के बीच वैवाहिक संबंध भी नहीं रहे। पति ने इन परिस्थितियों को मानसिक क्रूरता बताते हुए तलाक की मांग की। मामला फैमिली कोर्ट से होते हुए झारखंड हाईकोर्ट पहुंचा, लेकिन वहां कहानी का रुख बदल गया।
झारखंड हाईकोर्ट ने कहा कि पति-पत्नी के बीच सामान्य खटास, स्वभाव में अंतर, वैवाहिक दूरी या अलग रहना मात्र मानसिक क्रूरता साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है। क्रूरता के आरोपों को गंभीर, विशिष्ट और विश्वसनीय साक्ष्य से साबित करना जरूरी है।इसी आधार पर हाईकोर्ट ने पति की तलाक संबंधी अपील खारिज कर दी और रांची फैमिली कोर्ट के 20 मार्च 2023 के उस फैसले को बरकरार रखा, जिसमें तलाक की याचिका खारिज की गई थी।
शादी हुई, लेकिन कुछ ही समय बाद रिश्ते में आई दूरी
पति एक मेडिकल कॉलेज में सहायक प्रोफेसर की शादी 28 जुलाई 2011 को विशेष विवाह अधिनियम के तहत मैरिज ऑफिसर के समक्ष हुआ था। इसके बाद हिंदू रीति-रिवाज से भी विवाह संपन्न हुआ।विवाह के समय पति रूस में एमडी (फिजिशियन) की पढ़ाई कर रहे थे, जबकि पत्नी लोहरदगा में सहायक प्रोफेसर के पद पर कार्यरत थीं।लेकिन बाद में दोनों के रिश्ते में दूरी बढ़ने लगी और मामला अदालत तक पहुंच गया।
पति ने कहा- पत्नी के व्यवहार से मानसिक रूप से परेशान हुआ
पति ने विशेष विवाह अधिनियम के तहत क्रूरता को आधार बनाकर फैमिली कोर्ट में तलाक की याचिका दायर की। उसका आरोप था कि पत्नी उसके वृद्ध और बीमार माता-पिता के साथ दुर्व्यवहार करती थी और उनके साथ गाली-गलौज कर मानसिक रूप से प्रताड़ित करती थी।
पति ने यह भी आरोप लगाया कि 2012 के बाद दोनों के बीच कोई शारीरिक या वैवाहिक संबंध नहीं रहा। उसके अनुसार पत्नी एक ही छत के नीचे रहते हुए भी अलग खाना बनाती थी और उससे बातचीत नहीं करती थी।पति का कहना था कि इन परिस्थितियों से उसे मानसिक परेशानी हुई और उसकी पढ़ाई तथा करियर भी प्रभावित हुआ।
पत्नी ने कहा- असली प्रताड़ना तो उसे झेलनी पड़ी
पत्नी ने पति के आरोपों को गलत बताया। उसने अदालत में दावा किया कि शादी के समय उसके पिता ने 10 लाख रुपये नकद दिए थे। इसके बावजूद पति और ससुराल पक्ष की ओर से उसकी पढ़ाई के नाम पर पैसे की मांग की जाती रही।पत्नी के अनुसार, उसे मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना भी झेलनी पड़ी।
उसने बताया कि उसने पति की पढ़ाई के लिए खुद लोन लिया और ससुराल पक्ष की देखभाल भी की।प्रताड़ना के आरोपों को लेकर उसने बरियातू थाने में धारा 498ए के तहत मामला भी दर्ज कराया था।पत्नी ने अदालत के सामने यह भी कहा कि वह अब भी पति के साथ रहना चाहती है और विवाह विच्छेद नहीं चाहती।
हाईकोर्ट ने पूछा- क्या हर वैवाहिक दूरी क्रूरता है?
मामले में हाईकोर्ट के सामने अहम सवाल यह था कि क्या पति-पत्नी के बीच बातचीत कम होना, अलग रहना, स्वभाव में असहमति या वैवाहिक संबंधों में दूरी अपने आप मानसिक क्रूरता मानी जा सकती है?अदालत ने इस मामले में इसका जवाब परिस्थितियों और उपलब्ध साक्ष्य के आधार पर दिया। हाईकोर्ट ने कहा कि वैवाहिक जीवन में सामान्य परेशानियां, छोटी-मोटी खटास, स्वभावगत मतभेद या असंगति मात्र से मानसिक क्रूरता साबित नहीं होती।
तलाक मांगने वाले को ही साबित करने होंगे आरोप
अदालत ने कहा कि तलाक के जिस आधार पर राहत मांगी जा रही है, उसे साबित करने का दायित्व उस पक्ष पर होता है जो तलाक की मांग कर रहा है।क्रूरता इतनी गंभीर प्रकृति की होनी चाहिए कि पूरे मामले की परिस्थितियों को देखते हुए पति-पत्नी का साथ रहना उचित रूप से असंभव हो जाए।इस मामले में हाईकोर्ट ने पाया कि पति अपने लगाए गए क्रूरता के आरोपों को आवश्यक साक्ष्य से साबित करने में सफल नहीं रहा।
फैमिली कोर्ट का फैसला बरकरार, पति की अपील खारिज
हाईकोर्ट ने रांची फैमिली कोर्ट के 20 मार्च 2023 के फैसले को सही माना और पति की तलाक संबंधी अपील खारिज कर दी।यानी पति की ओर से बताए गए अलग रहना, बातचीत न करना और वैवाहिक दूरी जैसे तथ्यों को इस मामले में अकेले ऐसा पर्याप्त आधार नहीं माना गया, जिससे मानसिक क्रूरता साबित हो सके।फिलहाल इस मामले में हाईकोर्ट के आदेश का नतीजा यही है कि फैमिली कोर्ट द्वारा तलाक देने से इनकार का फैसला बरकरार रहा।












