हाईकोर्ट का बड़ा फैसला : महिला सुपरवाइजर नियुक्ति प्रक्रिया पर लगी रोक हटी, हाईकोर्ट ने एकल पीठ को वापस भेजी याचिका, 100% आरक्षण पर कही ये बात…
Major High Court Verdict: Stay on Women Supervisor Recruitment Process Lifted; High Court Remands Petition Back to Single Bench; Makes Key Observations Regarding 100% Reservation...

रांची हाईकोर्ट ने महिला सुपरवाइजर नियुक्ति मामले में अहम फैसला सुनाते हुए नियुक्ति प्रक्रिया पर लगी रोक हटा दी है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह मामला 100% आरक्षण का नहीं है और अंतिम निर्णय के लिए इसे एकल पीठ को वापस भेज दिया गया है।
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रांची/25.3.26। झारखंड में महिला सुपरवाइजर नियुक्ति को लेकर चल रहे विवाद पर झारखंड हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए बड़ा फैसला सुनाया है। खंडपीठ ने नियुक्ति प्रक्रिया पर लगी रोक हटा दी है और पूरे मामले को आगे की सुनवाई के लिए एकल पीठ को वापस भेज दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यह मामला 100 प्रतिशत सीटों को महिलाओं के लिए आरक्षित करने का नहीं है। चीफ जस्टिस एमएस सोनक और न्यायमूर्ति राजेश शंकर की खंडपीठ ने याचिका पर सुनवाई करते हुए यह फैसला दिया। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि इस रिट याचिका पर अंतिम निर्णय के आधार पर ही नियुक्ति प्रक्रिया की वैधता तय होगी।
नियुक्ति पर लगी रोक हटी, प्रक्रिया को मिली राहत
खंडपीठ ने अपने आदेश में कहा कि महिला सुपरवाइजर की नियुक्ति पर फिलहाल लगी रोक को हटाया जाता है। हालांकि, यह भी स्पष्ट किया गया कि अंतिम निर्णय आने के बाद यदि जरूरत पड़ी, तो नियुक्ति प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। इस फैसले से जहां एक ओर भर्ती प्रक्रिया को राहत मिली है, वहीं दूसरी ओर अभ्यर्थियों की उम्मीदें भी बनी हुई हैं।कोर्ट ने यह भी कहा कि इस मामले को स्वतः संज्ञान के रूप में नहीं देखा जा सकता, बल्कि यह एक विधिवत दायर याचिका का मामला है, जिस पर कानूनी प्रक्रिया के तहत ही निर्णय लिया जाएगा।
100% आरक्षण के मुद्दे पर कानूनी बहस
इस मामले का सबसे अहम पहलू यह रहा कि क्या किसी पद पर 100 प्रतिशत आरक्षण दिया जा सकता है या नहीं। इसी मुद्दे को लेकर पहले एकल पीठ ने इसे खंडपीठ के समक्ष भेजा था।सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से दलील दी गई कि किसी भी वर्ग को शत-प्रतिशत आरक्षण देना संवैधानिक व्यवस्था के खिलाफ है। उनका कहना था कि नियुक्ति प्रक्रिया में केवल महिलाओं से आवेदन मांगना समान अवसर के सिद्धांत का उल्लंघन हो सकता है। दूसरी ओर राज्य सरकार और आयोग की ओर से इस व्यवस्था को सही ठहराने का प्रयास किया गया। इस पर खंडपीठ ने फिलहाल कोई अंतिम निर्णय नहीं दिया, बल्कि इसे एकल पीठ के समक्ष विचार के लिए छोड़ दिया है।
क्या है पूरा मामला
कर्मचारी चयन आयोग ने बाल कल्याण विभाग में महिला सुपरवाइजर के 421 पदों पर नियुक्ति के लिए विज्ञापन जारी किया था। इस भर्ती प्रक्रिया में केवल महिलाओं से आवेदन आमंत्रित किए गए थे, जिसे लेकर विवाद खड़ा हो गया।कई अभ्यर्थियों ने आरोप लगाया कि आयोग ने उन्हें चयन प्रक्रिया से बाहर कर दिया, जबकि उनकी शैक्षणिक योग्यता मान्य थी। उनका कहना था कि आयोग ने मुख्य विषय की डिग्री को अनिवार्य बताया, जबकि नियमावली में सहायक विषय की डिग्री भी स्वीकार्य थी।इस आधार पर अभ्यर्थियों ने हाईकोर्ट का रुख किया और नियुक्ति प्रक्रिया को चुनौती दी। याचिकाकर्ताओं में आकांक्षा कुमारी सहित अन्य शामिल थे।
अदालत में पक्ष और दलीलें
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से महाधिवक्ता राजीव रंजन ने पक्ष रखा। वहीं आयोग की ओर से अधिवक्ता संजय पिपरवाल उपस्थित हुए।याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता अमृतांश वत्स, चंचल जैन सहित अन्य वकीलों ने दलीलें पेश कीं। वहीं हस्तक्षेपकर्ताओं की ओर से इंद्रजीत सिन्हा और अर्पण मिश्रा ने पक्ष रखा।सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद खंडपीठ ने अपना आदेश सुरक्षित रख लिया था, जिसे अब जारी कर दिया गया है।
पहले एकल पीठ से खंडपीठ तक पहुंचा मामला
मामले की शुरुआत हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति आनंदा सेन की एकल पीठ से हुई थी। उन्होंने यह महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्न उठाया था कि क्या किसी भी पद को पूरी तरह एक ही वर्ग के लिए आरक्षित किया जा सकता है।इसी सवाल के समाधान के लिए उन्होंने मामले को खंडपीठ के पास भेज दिया था। इसके बाद चीफ जस्टिस की खंडपीठ ने इस पर सुनवाई की और अब इसे पुनः एकल पीठ के पास भेज दिया गया है।अब यह मामला फिर से एकल पीठ में जाएगा, जहां सभी कानूनी पहलुओं पर विस्तृत सुनवाई होगी।









