गुरु प्रदोष व्रत 2026: आज शिवलिंग पर चढ़ाएं ये 5 चीजें, क्या है प्रदोष व्रत, जानें पूजा मुहूर्त, विधि और प्रदोष व्रत कथा
प्रदोष व्रत की कथा, पूजा विधि और महत्व जानें। भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए प्रदोष काल में पूजा, व्रत, मंत्र जाप और शिव आराधना की संपूर्ण जानकारी पढ़ें।

Guru Pradosh Vrat 2026: आज 8 अक्टूबर 2026, गुरुवार है। आपके दिए पंचांग के अनुसार आश्विन कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी देर रात 11:16 बजे शुरू हुई है और 8 अक्टूबर रात 10:15 बजे तक रहेगी। इसलिए 8 अक्टूबर 2026, गुरुवार को पड़ने वाला प्रदोष गुरु प्रदोष व्रत कहलाएगा। गुरुवार को पड़ने के कारण इसे गुरु प्रदोष या बृहस्पति प्रदोष कहा जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन भगवान शिव के साथ बृहस्पति देव की कृपा प्राप्त करने के लिए व्रत और पूजा की जाती है। इसे ज्ञान, शिक्षा, धन, धर्म, सुख-समृद्धि और वैवाहिक जीवन से जुड़े मामलों के लिए विशेष माना जाता है।
गुरु प्रदोष 2026 का पूजा मुहूर्त
• त्रयोदशी प्रारंभ: 7 अक्टूबर, रात 11:16 बजे
• त्रयोदशी समाप्त: 8 अक्टूबर, रात 10:15 बजे
• प्रदोष पूजा का समय: 8 अक्टूबर, शाम 5:59 बजे से रात 8:27 बजे तक
• प्रदोष पूजा सूर्यास्त के आसपास की जाती है।
शिवलिंग पर चढ़ाएं ये 5 चीजें
• बेलपत्र: भगवान शिव को अत्यंत प्रिय माना जाता है।
• पीला चंदन: धार्मिक मान्यता में इसे शिव कृपा और शुभता से जोड़ा जाता है।
• शहद: मान्यता है कि इससे भाग्य और सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है।
• कच्चा दूध: इससे शिवलिंग का अभिषेक किया जाता है।
• पंचामृत: दूध, दही, घी, शहद और गंगाजल से बनाकर अभिषेक किया जाता है।
प्रदोष व्रत की पूजा सामग्री
शुद्ध जल, गंगाजल, दूध, दही, घी, शहद, शक्कर/मिश्री, बेलपत्र, आंकड़े के फूल, धतूरा, सफेद फूल, फूलों की माला, फल, चंदन, अक्षत, रोली, कलावा, धूपबत्ती, कपूर, दीपक और आरती की थाली पहले से तैयार रखें।
प्रदोष व्रत की सरल पूजा विधि
1. सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें और व्रत का संकल्प लें।
2. भगवान शिव का ध्यान करते हुए “ॐ नमः शिवाय” का जाप करें।
3. प्रदोष काल में शिवलिंग पर जल और गंगाजल चढ़ाएं।
4. पंचामृत से अभिषेक करके पुनः स्वच्छ जल अर्पित करें।
5. चंदन, अक्षत, बेलपत्र, धतूरा और फूल चढ़ाएं।
6. धूप-दीप जलाकर फल और मिठाई का भोग लगाएं।
7. शिव चालीसा और प्रदोष व्रत कथा का पाठ करें।
8. अंत में भगवान शिव की आरती करके प्रसाद वितरित करें।
प्रदोष व्रत की मान्यता
प्रचलित कथा के अनुसार चंद्रमा को श्राप के कारण क्षय रोग हो गया था और उनका प्रकाश कम होने लगा। चंद्रदेव ने भगवान शिव की आराधना की। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर शिवजी ने उन्हें श्राप से मुक्ति दी और उनका प्रकाश पुनः लौटा दिया। मान्यता है कि यह घटना त्रयोदशी के प्रदोष काल से जुड़ी है, इसलिए इस समय शिव पूजा का विशेष महत्व माना जाता है।
हर महीने दो प्रदोष व्रत होते हैं—एक शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी और दूसरा कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी। जिस वार को प्रदोष पड़ता है, उसके अनुसार उसका नाम और धार्मिक महत्व भी बताया जाता है, जैसे सोमवार को सोम प्रदोष, मंगलवार को भौम प्रदोष और शनिवार को शनि प्रदोष।
प्रदोष व्रत कथा
प्रदोष व्रत के नाम से अनेक कथाएं प्रचलित हैं, जिसमें से एक कथा अनुसार चंद्रमा को जब श्रापवश क्षय रोग होता है तब इसके कारण चंद्रमा की रोशनी(प्रकाश) का नाश होने लगता है। ऎसे में चंद्र देव भगवान शिव की भक्ति करते हैं और इनसे अपने कष्ट को दूर करने की प्रार्थना करते हैं। भगवान शिव, चंद्रमा की भक्ति से प्रसन्न होकर उनके कष्ट का निवारण करके उन्हें श्राप से मुक्ति प्रदान करते हैं, और जिस दिन चंद्रमा को इस कष्ट से मुक्ति प्राप्त होती है।
वह त्रयोदशी तिथि का समय होता है। भगवान शिव नेण त्रयोदशी के दिन चंद्रमा को पुन: जीवन अर्थात उनका प्रकाश प्रदान किया अत: इसीलिए इस दिन को प्रदोष कहा जाने लगा।प्रत्येक माह में प्रदोष व्रत दो होते हैं एक शुक्ल पक्ष में आने वाला और दूसरा कृष्ण पक्ष में आने वाला। त्रयोदशी जिसे “तेरस” भी कहा जाता है। इस तिथि को प्रदोष व्रत संपन्न होता है. प्रदोष काल में उपवास करना रात्रि जागरण करना चाहिए. यह सभी दोषों का नाश करता है।
प्रदोष व्रत पूजा विधि
प्रदोष व्रत को करने वालों को द्वादशी की रात्रि से ही शुद्धता, सात्विकता एवं ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए. अगले दिन त्रयोदशी तिथि को प्रात:काल स्नान आदि से निवृत होकर भगवान शिव का ध्यान करना चाहिए. शिवलिंग पर जलाभिषेक करना चाहिए, “ऊं नम: शिवाय” मंत्र का जाप जितना संभव हो सके करना चाहिए. यदि उपवास कर सकें तो उपवास का संकल्प करके पूरा दिन निराहार रहना चाहिए. उसके पश्चात सूर्यास्त के बाद स्नान करके और शुभ मुहूर्त में भगवान शिव का विधि विधान के साथ पूजन करना चाहिए.
प्रदोष पूजा को घर या मन्दिर जहां चाहे कर सकते हैं. पूजा करते समय उत्तर या पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठना चाहिए और भगवान शिव का पुष्प, बेलपत्र, पंचामृत, अक्षत, भांग, धतूरा, सफेद चंदन, दूध, धूप आदि से पूजन करना चाहिए. जलाभिषेक करना चाहिए व शिव मंत्रों एवं शिव चालिसा का पाठ करना चाहिए. भजन आरती पश्चात भगवान को भोग लगाना चाहिए और प्रसाद को सभी लोगों में बांटना चाहिए. इस प्रकार विधि विधान के साथ पूजा करने के उपरांत ब्राह्मणों को भोजन खिलाना चाहिए और उन्हें दान दक्षिणा देकर उनसे आशिर्वाद प्राप्त करना चाहिए.
ध्यान दें: आपके दिए विवरण में “गुरु प्रदोष आज” कहा गया है, लेकिन 7 अक्टूबर 2026 बुधवार है; गुरु प्रदोष 8 अक्टूबर 2026, गुरुवार को है।












