Jharkhand High Court: गैंगरेप मामले में हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, मेडिकल जांच में शुक्राणु नहीं मिले, फिर भी गैंगरेप के चार दोषियों की 20 साल की सजा बरकरार
झारखंड हाईकोर्ट ने मेडिकल जांच में शुक्राणु नहीं मिलने के बावजूद सामूहिक दुष्कर्म के चार दोषियों की 20-20 साल की सजा बरकरार रखी। जमानत पर बाहर तीन दोषियों को दो महीने में सरेंडर करना होगा।

रांची। झारखंड हाईकोर्ट ने सामूहिक दुष्कर्म के एक मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए चार दोषियों की 20-20 साल की सश्रम कैद की सजा बरकरार रखी है। मेडिकल जांच में शुक्राणु नहीं मिलने की दलील के बावजूद अदालत ने दोषियों की अपील खारिज कर दी। अदालत ने कहा कि पीड़िता की विश्वसनीय गवाही और मेडिकल जांच में मिले चोट के निशान घटना से जुड़े महत्वपूर्ण साक्ष्य हैं। यह मामला पूर्वी सिंहभूम जिले के पटमदा थाना क्षेत्र का है।
न्यायमूर्ति आनंद सेन और न्यायमूर्ति प्रदीप कुमार श्रीवास्तव की खंडपीठ ने गुरुवार को फैसला सुनाते हुए निचली अदालत के निर्णय में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। अदालत के इस फैसले के बाद जमानत पर बाहर चल रहे तीन दोषियों को दो महीने के भीतर आत्मसमर्पण करना होगा।
जंगल के रास्ते मायके जा रही महिला के साथ हुई थी वारदात
मामले के अनुसार, 5 नवंबर 2013 को एक महिला अपने ससुराल से मायके जा रही थी। इसी दौरान लपिट छेंचा जंगल के पास चार लोगों ने उसे पकड़ लिया। आरोप था कि महिला को पास की नाली के पास ले जाकर चारों ने बारी-बारी से उसके साथ दुष्कर्म किया।
महिला के चिल्लाने पर आसपास लकड़ी काट रहे लोगों की गतिविधियों का आभास होने के बाद आरोपी मौके से भाग गए। घटना के बाद महिला अपने भाई के घर पहुंची। इसके बाद गांव में पंचायत बुलाकर मामला सुलझाने का प्रयास किया गया, लेकिन आरोपी पंचायत में शामिल नहीं हुए।इसके बाद 8 नवंबर 2013 को पटमदा थाने में प्राथमिकी दर्ज कराई गई और मामले की कानूनी प्रक्रिया शुरू हुई।
2018 में चारों को सुनाई गई थी 20 साल की सजा
इस मामले में निचली अदालत ने वर्ष 2018 में हेमंत सिंह उर्फ हाटो सिंह, रामनाथ सिंह उर्फ मुंडा सिंह, विभीषण सिंह उर्फ पंचू सिंह और फागु हांसदा उर्फ सुफल हांसदा को दोषी ठहराया था।अदालत ने चारों को 20-20 साल की सश्रम कैद के साथ 40-40 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी। इस फैसले को चुनौती देते हुए दोषियों ने हाईकोर्ट में अपील दायर की थी।
मेडिकल रिपोर्ट में शुक्राणु नहीं मिलने पर बचाव पक्ष ने उठाए सवाल
हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने दलील दी कि मेडिकल जांच में शुक्राणु नहीं मिले थे। इसके अलावा जांच प्रक्रिया में कथित कमियों और गवाहों के बयानों में अंतर का हवाला देते हुए दोषियों को राहत देने की मांग की गई।
मेडिकल रिपोर्ट में महिला की पीठ और दोनों स्तनों पर चोट के निशान दर्ज किए गए थे। डॉक्टर ने चोटों की उम्र लगभग तीन से चार दिन बताई थी। रिपोर्ट में निजी अंगों पर चोट नहीं मिलने और रासायनिक जांच में शुक्राणु नहीं पाए जाने का भी उल्लेख था।
72 घंटे की देरी को लेकर हाईकोर्ट ने क्या कहा?
अदालत ने मेडिकल रिपोर्ट और मामले से जुड़े साक्ष्यों पर विचार करते हुए पाया कि घटना और मेडिकल जांच के बीच लगभग 72 घंटे का अंतर था। ऐसे में केवल शुक्राणु नहीं मिलने के आधार पर पीड़िता की गवाही को अविश्वसनीय नहीं माना जा सकता।
खंडपीठ ने पीड़िता के बयान को भरोसेमंद माना और मेडिकल जांच में मिले चोट के निशानों को महत्वपूर्ण साक्ष्य के रूप में देखा। इसी आधार पर अदालत ने बचाव पक्ष की दलीलों को स्वीकार नहीं किया और चारों दोषियों की अपील खारिज कर दी।
जमानत पर बाहर तीन दोषियों को दो महीने में करना होगा सरेंडर
हाईकोर्ट के फैसले के समय हेमंत सिंह जेल में था, जबकि रामनाथ सिंह, विभीषण सिंह और फागु हांसदा जमानत पर बाहर थे।अदालत ने तीनों की जमानत रद्द करते हुए उन्हें फैसले की तारीख से दो महीने के भीतर संबंधित निचली अदालत में आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया है। निर्धारित समय में आत्मसमर्पण नहीं करने पर निचली अदालत को उन्हें हिरासत में लेकर शेष सजा भुगतने के लिए जेल भेजने की कार्रवाई करने को कहा गया है।
इस फैसले में हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी मामले में मेडिकल जांच के एक निष्कर्ष को अकेले निर्णायक मानने के बजाय पीड़िता की गवाही, चोट के निशान और उपलब्ध अन्य साक्ष्यों का समग्र मूल्यांकन किया जाना जरूरी है।












