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महंगाई भत्ता पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, कहा, कर्मचारियों को मिलेगा पूरा हक, भुगतान के लिए समिति का किया गठन

Supreme Court delivers major verdict on dearness allowance, says employees are entitled to their full rights, and forms a committee for payment.

सुप्रीम कोर्ट ने महंगाई भत्ते (DA) को कर्मचारियों का कानूनी अधिकार बताते हुए 2008 से 2019 तक का बकाया डीए देने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि डीए कोई बोनस नहीं, बल्कि बढ़ती महंगाई में न्यूनतम जीवन स्तर बनाए रखने का साधन है।
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Employee News : देश की सर्वोच्च अदालत ने सरकारी कर्मचारियों को मिलने वाले महंगाई भत्ते (डीए) को लेकर एक बेहद अहम और दूरगामी फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि महंगाई भत्ता कोई अतिरिक्त फायदा या अनुग्रह नहीं है, बल्कि यह कर्मचारियों के लिए बढ़ती महंगाई के बीच जीने का न्यूनतम स्तर बनाए रखने का एक आवश्यक जरिया है। अदालत ने इस फैसले के जरिए कर्मचारियों के कल्याण से जुड़े संवैधानिक और कानूनी पहलुओं को मजबूती से रेखांकित किया है।

पश्चिम बंगाल के कर्मचारियों को बड़ी राहत

न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा की पीठ ने पश्चिम बंगाल सरकार की याचिका को खारिज करते हुए राज्य के लाखों सरकारी कर्मचारियों के पक्ष में फैसला सुनाया। कोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वह वर्ष 2008 से 2019 तक की अवधि का महंगाई भत्ता अपने कर्मचारियों को प्रदान करे। अदालत ने कहा कि डीए कर्मचारियों का “कानूनी रूप से लागू करने योग्य अधिकार” है और इससे राज्य सरकार पीछे नहीं हट सकती।

डीए की गणना का तरीका नहीं बदल सकता राज्य

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी साफ किया कि जब एक बार महंगाई भत्ते को वैधानिक नियमों के तहत ऑल इंडिया कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (AICPI) से जोड़कर परिभाषित कर दिया जाता है, तो राज्य सरकार बाद में किसी ऑफिस मेमोरेंडम के जरिए इसकी गणना की पद्धति को मनमाने ढंग से नहीं बदल सकती। यह टिप्पणी उन राज्यों के लिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है, जहां डीए को लेकर विवाद चल रहे हैं।

6 मार्च तक 25 प्रतिशत डीए भुगतान का आदेश

शीर्ष अदालत ने पश्चिम बंगाल सरकार को निर्देश दिया है कि वह अपने कर्मचारियों को छह मार्च तक डीए का 25 प्रतिशत भुगतान करे। कोर्ट ने यह भी कहा कि कर्मचारी साल में दो बार डीए पाने के हकदार नहीं होंगे, लेकिन तय अवधि का बकाया उन्हें अनिवार्य रूप से दिया जाना चाहिए।

डीए क्यों है जरूरी? कोर्ट की अहम टिप्पणी

फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने डीए के सामाजिक और व्यावहारिक महत्व पर भी विस्तार से चर्चा की। कोर्ट ने कहा कि एक वेलफेयर स्टेट के तौर पर सरकार का दायित्व है कि वह अपने कर्मचारियों को बढ़ती कीमतों के दुष्प्रभाव से बचाए। महंगाई भत्ता इसी उद्देश्य की पूर्ति करता है। यह कोई अतिरिक्त लाभ नहीं, बल्कि कर्मचारियों की जीवन-यापन क्षमता को बनाए रखने का साधन है।

वित्तीय असर को देखते हुए कमेटी का गठन
डीए भुगतान के वित्तीय असर को ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने एक उच्चस्तरीय कमेटी का गठन किया है। इस कमेटी में सुप्रीम कोर्ट की सेवानिवृत्त न्यायाधीश इंदु मल्होत्रा, हाई कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश तरलोक सिंह चौहान और गौतम भादुड़ी, साथ ही भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) या उनके द्वारा नामित वरिष्ठ अधिकारी शामिल होंगे।यह कमेटी राज्य सरकार के अधिकारियों से परामर्श कर कर्मचारियों को देय कुल राशि और भुगतान का शेड्यूल तय करेगी, जिसका पालन राज्य सरकार को करना अनिवार्य होगा।

भुगतान का शेड्यूल और अगली सुनवाई

कोर्ट ने निर्देश दिया है कि भुगतान राशि और शेड्यूल छह मार्च 2026 से पहले तय कर लिया जाए। कमेटी के फैसले के आधार पर पहली किस्त का भुगतान 31 मार्च तक किया जाएगा। इसके बाद राज्य सरकार को सुप्रीम कोर्ट में अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करनी होगी। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि इस अवधि में सेवानिवृत्त हो चुके कर्मचारी भी डीए के इस लाभ के हकदार होंगे। मामले में अगली सुनवाई 15 अप्रैल को होगी।

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