नरक चतुर्दशी 2026: छोटी दिवाली पर क्यों जलाया जाता है यम का दीपक? जानें शुभ मुहूर्त, नियम और पौराणिक कथा
नरक चतुर्दशी 2026 पर यम का दीपक क्यों जलाया जाता है? जानें छोटी दिवाली की तारीख, शुभ मुहूर्त, यम दीपदान की विधि और पौराणिक कथा।

नरक चतुर्दशी 2026: दीपावाली बस आने ही वाली है। घरों में मां लक्ष्मी के आगमन से लेकर साफ सफाई शुरू हो गया है। दीपावली का त्योहार अलग-अलग पांच दिन मनाया जाता है। धनतेरस से इसकी शुरुआत होती है। दीपावली से पहले मनाया जाने वाला छोटी दिवाली का पर्व सिर्फ दीप जलाने और घर सजाने तक सीमित नहीं है। इस दिन यमराज के नाम से दीपक जलाने की विशेष धार्मिक परंपरा है।
मान्यता है कि विधि-विधान से यम का दीपक जलाने से अकाल मृत्यु का भय दूर होता है और परिवार पर यमराज की कृपा बनी रहती है। आखिर छोटी दिवाली पर यमराज के लिए दीपक क्यों जलाया जाता है? इसे जलाने का सही समय क्या है और पूजा में किन बातों का ध्यान रखना चाहिए? आइए जानते हैं नरक चतुर्दशी का महत्व, शुभ मुहूर्त और इससे जुड़ी पौराणिक कथा।
नरक चतुर्दशी 2026 कब है? जानें तिथि और शुभ मुहूर्त
नरक चतुर्दशी को छोटी दिवाली, रूप चौदस और काली चौदस के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन अभ्यंग स्नान और यमराज के नाम दीपदान का विशेष महत्व माना जाता है।
- चतुर्दशी तिथि प्रारंभ: 7 नवंबर 2026, सुबह 10:48 बजे
- चतुर्दशी तिथि समाप्त: 8 नवंबर 2026, सुबह 11:28 बजे
- अभ्यंग स्नान का मुहूर्त: 8 नवंबर 2026, सुबह 5:38 बजे से 6:40 बजे तक
- पर्व का दिन: रविवार, 8 नवंबर 2026
ध्यान दें कि धार्मिक पर्वों की तारीख निर्धारित करने में तिथि के साथ स्थानीय पंचांग और सूर्योदय की गणना भी महत्वपूर्ण होती है। पूजा से पहले अपने शहर के पंचांग के अनुसार मुहूर्त की पुष्टि कर लें।
छोटी दिवाली पर यम का दीपक क्यों जलाया जाता है?
नरक चतुर्दशी पर यमराज के नाम से दीपक जलाने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इसे यम दीपदान कहा जाता है। मान्यता है कि इस दिन श्रद्धापूर्वक दीपदान करने से परिवार के सदस्यों पर अकाल मृत्यु का भय कम होता है और घर में सुख-शांति बनी रहती है।
पौराणिक परंपरा में यमराज को मृत्यु और धर्म का अधिपति माना गया है। उनके नाम से दीपक जलाकर व्यक्ति दीर्घायु, परिवार की रक्षा और मंगलमय जीवन की कामना करता है।छोटी दिवाली की शाम जलने वाला यह दीपक मृत्यु के भय के सामने जीवन के प्रकाश, श्रद्धा और आस्था का प्रतीक माना जाता है। हालांकि, अकाल मृत्यु से सुरक्षा और अन्य फल धार्मिक मान्यताओं पर आधारित हैं।
यम का दीपक जलाने का सही समय और विधि
नरक चतुर्दशी पर यम दीपदान के लिए प्रदोष काल यानी सूर्यास्त के आसपास का समय परंपरागत रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है। अलग-अलग क्षेत्रों और पंचांगों में दीपदान का समय भिन्न हो सकता है।
यम का दीपक जलाने की विधि:
- शाम को घर की साफ-सफाई करने के बाद दीपक तैयार करें।
- मिट्टी के दीपक में सरसों का तेल या परंपरा के अनुसार उपयुक्त तेल डालें और रुई की बत्ती रखें।
- दीपक जलाकर यमराज का स्मरण करें और परिवार की सुख-समृद्धि व मंगल की प्रार्थना करें।
- परंपरा के अनुसार दीपक घर के बाहर दक्षिण दिशा की ओर रखकर यमराज के नाम दीपदान किया जाता है।
- दीपक ऐसी सुरक्षित जगह रखें, जहां हवा से वह बुझे नहीं और बच्चों या पालतू पशुओं को आग से खतरा न हो।
ध्यान रखें: दीपदान की दिशा और विधि में क्षेत्रीय परंपराओं के अनुसार अंतर हो सकता है। अपने परिवार की प्रचलित पूजा-विधि का पालन कर सकते हैं।
यम दीपदान से जुड़ी पौराणिक मान्यता
धार्मिक मान्यताओं में यम दीपदान के पीछे एक प्रचलित कथा सुनाई जाती है। कथा के अनुसार, एक राजा के पुत्र की मृत्यु विवाह के कुछ समय बाद ही होने की भविष्यवाणी की गई थी। जब उसकी पत्नी को इस बात का पता चला, तो उसने अपने पति की रक्षा के लिए घर के द्वार पर सोने-चांदी के आभूषण और अनेक दीपक सजाकर रख दिए।
कहा जाता है कि जब यमराज सर्प के रूप में उसके पति के प्राण लेने पहुंचे, तो दीपकों की चमक और आभूषणों की जगमगाहट से उनका मार्ग बाधित हो गया। पूरी रात पत्नी ने जागकर अपने पति की रक्षा की। अंततः यमराज को बिना उसके प्राण लिए लौटना पड़ा।इसी लोकप्रचलित कथा के आधार पर नरक चतुर्दशी पर यमराज के नाम दीपक जलाने की परंपरा को अकाल मृत्यु से रक्षा की कामना से जोड़ा जाता है। यह कथा धार्मिक लोकमान्यता के रूप में प्रचलित है।
भगवान श्रीकृष्ण और नरकासुर वध की कथा
नरक चतुर्दशी का संबंध भगवान श्रीकृष्ण द्वारा नरकासुर के वध से भी जोड़ा जाता है। पौराणिक कथा के अनुसार, नरकासुर नामक असुर ने देवताओं और अनेक लोगों को परेशान कर रखा था। उसने बड़ी संख्या में महिलाओं को बंदी बना लिया था।भगवान श्रीकृष्ण ने नरकासुर का वध करके बंदियों को मुक्त कराया और उसके अत्याचारों का अंत किया। इस विजय को बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना जाता है। इसी कारण नरक चतुर्दशी का पर्व अंधकार, भय और नकारात्मकता से मुक्ति का संदेश देता है।
छोटी दिवाली पर अभ्यंग स्नान का क्या है महत्व?
नरक चतुर्दशी पर सूर्योदय से पहले अभ्यंग स्नान करने की परंपरा है। इसमें शरीर पर तेल लगाकर स्नान किया जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, यह स्नान शारीरिक शुद्धि, सौंदर्य और सकारात्मकता का प्रतीक है।रूप चौदस के रूप में भी प्रसिद्ध इस पर्व पर लोग स्वयं को स्वच्छ रखते हैं, नए या साफ कपड़े पहनते हैं और घर में दीप जलाते हैं। इसे शरीर और मन की शुद्धि के साथ दीपावली के स्वागत की तैयारी के रूप में भी देखा जाता है।
नरक चतुर्दशी पर इन बातों का रखें ध्यान
- सुबह स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र पहनें और पूजा करें।
- घर के मुख्य द्वार और पूजा स्थल पर दीपक जलाएं।
- यमराज के नाम दीपदान करते समय श्रद्धा और पारिवारिक परंपरा का ध्यान रखें।
- दीपक को पर्दों, कागज, कपड़ों और अन्य ज्वलनशील वस्तुओं से दूर रखें।
- पूजा के साथ जरूरतमंदों की सहायता और सेवा का संकल्प लें।
नरक चतुर्दशी का संदेश
नरक चतुर्दशी हमें याद दिलाती है कि जीवन में प्रकाश, सदाचार और सकारात्मकता का महत्व सबसे अधिक है। यमराज के नाम जलाया जाने वाला दीपक मृत्यु के भय से मुक्ति की धार्मिक कामना का प्रतीक है, जबकि भगवान श्रीकृष्ण की नरकासुर पर विजय अन्याय और बुराई के अंत का संदेश देती है। छोटी दिवाली पर दीपदान करते हुए परिवार की मंगलकामना करें और अपने जीवन से क्रोध, ईर्ष्या तथा अहंकार जैसे अंधकार को दूर करने का संकल्प लें।












