संतान की लंबी उम्र के लिए सिर्फ जीतिया ही नहीं, अहोई अष्टमी का व्रत भी है खास! जानिए दोनों पर्वों में क्या है अंतर और क्यों करती हैं माताएं अहोई माता की पूजा, कौन व्रत माना जाता है श्रेष्ठ
अहोई अष्टमी 2026 का व्रत 1 नवंबर को रखा जाएगा। जानिए अहोई अष्टमी का महत्व, पूजा मुहूर्त, तारों को अर्घ्य देने की परंपरा और जीतिया व्रत से इसका अंतर।

Ahoi Ashtami And Jitiya Vrat 2026: मां और संतान का रिश्ता दुनिया के सबसे अनमोल रिश्तों में से एक है। अपनी संतान की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और खुशहाल भविष्य के लिए मांएं कई तरह के व्रत और पूजा करती हैं। बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश में जितिया यानी जीवित्पुत्रिका व्रत का विशेष महत्व है। इस व्रत में माताएं अपनी संतान की लंबी उम्र और सुरक्षा के लिए निर्जला उपवास रखती हैं। लेकिन क्या आप जानती हैं कि संतान की सलामती के लिए एक और महत्वपूर्ण व्रत रखा जाता है, जिसे अहोई अष्टमी कहा जाता है?
जी हां, अहोई अष्टमी भी संतान के सुख, समृद्धि, लंबी उम्र और अच्छे स्वास्थ्य की कामना से जुड़ा महत्वपूर्ण पर्व है। कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मनाए जाने वाले इस त्योहार में माताएं अहोई माता की पूजा करती हैं और शाम को तारों को अर्घ्य देकर अपनी संतान के मंगलमय जीवन की प्रार्थना करती हैं।
जीतिया की तरह अहोई अष्टमी भी संतान के लिए समर्पित
जीतिया और अहोई अष्टमी दोनों ही व्रतों का केंद्र मां और संतान का रिश्ता है। दोनों में माताएं अपनी संतान की लंबी उम्र और खुशहाली के लिए उपवास रखती हैं। हालांकि, दोनों पर्वों की पूजा पद्धति, धार्मिक मान्यताएं और परंपराएं अलग-अलग हैं।जीवित्पुत्रिका व्रत में माताएं भगवान जीमूतवाहन की पूजा करती हैं। वहीं अहोई अष्टमी में अहोई माता की आराधना की जाती है। अहोई अष्टमी पर व्रत कथा सुनने और तारों को अर्घ्य देने की विशेष परंपरा है।
आखिर क्या है अहोई अष्टमी का महत्व?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, अहोई अष्टमी का व्रत रखने से संतान पर अहोई माता की कृपा बनी रहती है। माताएं अपने बच्चों की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य, शिक्षा, सफलता और सुख-समृद्धि की कामना करती हैं। इस पर्व से जुड़ी पौराणिक कथा में एक साहूकार की पत्नी और स्याहु के बच्चों का प्रसंग आता है। मान्यता है कि अहोई माता की कृपा और पूजा से संतान संबंधी कष्ट दूर होते हैं। इसी कारण इस दिन अहोई माता की विशेष आराधना की जाती है।
अहोई अष्टमी पर तारों को अर्घ्य देने की परंपरा क्यों?
इस व्रत की सबसे खास बात यह है कि माताएं शाम को आकाश में तारों के दिखाई देने के बाद उन्हें जल अर्पित करती हैं। इसके बाद संतान की लंबी उम्र और सुखद भविष्य की कामना करती हैं।कई परिवारों में तारों को अर्घ्य देने के बाद ही व्रत का पारण किया जाता है। कुछ स्थानों पर चंद्रमा को देखकर व्रत खोलने की परंपरा भी प्रचलित है। हालांकि, अहोई अष्टमी में तारों के दर्शन का विशेष महत्व माना जाता है।
जीतिया व्रत अक्टूबर में मनाया गया
जितिया व्रत आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रखा जाता है। इस साल ये व्रत अष्टमी तिथि 3 अक्टूबर की सुबह 7 बजकर 59 मिनट पर शुरू हुई और 4 अक्टूबर की सुबह 5 बजकर 51 मिनट तक महिलाओं ने रखा। जितिया व्रत में राजा जीमूतवाहन की कथा सुनने की विशेष परंपरा है. धार्मिक कथा के अनुसार, जीमूतवाहन ने नागवंश की रक्षा के लिए अपने प्राणों का त्याग करने का संकल्प लिया था. उनके त्याग और करुणा से जुड़ी इस कथा को जितिया व्रत की धार्मिक परंपरा से जोड़ा जाता है. व्रत रखने वाली महिलाएं पूजा के दौरान जीमूतवाहन की कथा सुनती हैं और संतान की लंबी उम्र व सुखी जीवन की कामना करती हैं।
अहोई अष्टमी 2026 कब है?
इस साल अहोई अष्टमी का व्रत 1 नवंबर 2026, रविवार को रखा जाएगा। अष्टमी तिथि 1 नवंबर को दोपहर 2:51 बजे शुरू होकर 2 नवंबर को दोपहर 1:10 बजे समाप्त होगी।
• पूजा का शुभ मुहूर्त: शाम 5:36 से 6:54 बजे तक।
• तारों के दर्शन: शाम 5:22 बजे के बाद।
मां की ममता और संतान की खुशहाली का पर्व
जीतिया हो या अहोई अष्टमी, दोनों पर्वों के पीछे मां की एक ही भावना जुड़ी है—उसकी संतान हमेशा स्वस्थ, सुरक्षित और खुशहाल रहे। यही वजह है कि भारतीय परंपराओं में संतान की मंगलकामना के लिए अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग व्रत प्रचलित हैं।अहोई अष्टमी इसी मातृ प्रेम और आस्था का प्रतीक है, जिसमें मां पूरे दिन उपवास रखकर शाम को अहोई माता से अपनी संतान के उज्ज्वल भविष्य का आशीर्वाद मांगती है।












