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Jharkhand High Court का बड़ा फैसला: नियुक्ति में देरी का खामियाजा कर्मचारियों को नहीं भुगतना होगा, कोर्ट ने रद्द किया प्रशासन का आदेश…

Jharkhand High Court's big decision: Employees will not have to suffer the consequences of delay in appointment, court cancels administration's order...

रांची/26.5.26। झारखंड हाईकोर्ट ने राज्य के सरकारी कर्मचारियों के हित में एक बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा है कि किसी भी कर्मचारी का वेतनमान और सेवा शर्तें उसके नियुक्ति पत्र जारी होने की तारीख से तय नहीं की जा सकतीं। बल्कि यह उस विज्ञापन और चयन प्रक्रिया के आधार पर निर्धारित होंगी, जिसके तहत भर्ती प्रक्रिया शुरू हुई थी।

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि प्रशासनिक देरी या सरकारी प्रक्रियाओं में लापरवाही का नुकसान कर्मचारियों को नहीं उठाना पड़ेगा। अदालत ने इसे समानता के अधिकार से जुड़ा मामला बताते हुए कहा कि एक ही विज्ञापन और एक ही मेधा सूची से चयनित उम्मीदवारों के साथ अलग-अलग व्यवहार करना संविधान के खिलाफ है।

यह फैसला जस्टिस दीपक रोशन की अदालत ने दुमका और जामताड़ा जिले के जनसेवकों (ग्राम सेवकों) से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान दिया। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि यदि किसी उम्मीदवार को प्रशासनिक कारणों से नियुक्ति पत्र देर से मिलता है, तो उसे नए भर्ती नियमों के आधार पर कम वेतनमान देना न्यायसंगत नहीं माना जा सकता।

कोर्ट ने रद्द किया प्रशासन का आदेश

हाईकोर्ट ने जिला प्रशासन द्वारा जारी उस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसके तहत कर्मचारियों का ग्रेड पे और वेतनमान घटाया गया था। कोर्ट ने सरकार को निर्देश दिया कि याचिकाकर्ताओं को उनके समकक्ष कर्मचारियों की तरह 4000-6000 रुपये का प्रतिस्थापन वेतनमान दिया जाए।

साथ ही अदालत ने एरियर, वरिष्ठता और एमएसीपी (Modified Assured Career Progression) से जुड़े सभी परिणामी लाभ भी देने का आदेश दिया है। कोर्ट ने साफ कहा कि समान चयन प्रक्रिया से नियुक्त कर्मचारियों को केवल नियुक्ति पत्र मिलने की तारीख के आधार पर अलग-अलग वेतनमान देना अनुचित और असंवैधानिक है।

क्या था पूरा मामला?

यह पूरा मामला वर्ष 1987 में जारी विज्ञापन संख्या 26/87 से जुड़ा हुआ है। इस विज्ञापन के तहत दुमका सहित अन्य जिलों में जनसेवकों की नियुक्ति प्रक्रिया शुरू की गई थी। वर्ष 1988 में इसके लिए मेधा सूची तैयार की गई।भर्ती प्रक्रिया के पहले दो चरणों में चयनित उम्मीदवारों को क्रमशः 1990 और 1996 में नियुक्ति पत्र जारी कर दिए गए।

लेकिन प्रशासनिक कारणों से कुछ उम्मीदवारों, जिनमें विश्वनाथ सिंघा रॉय और संजीत गोराई शामिल थे, को नवंबर 1999 में नियुक्ति पत्र मिला।इसी बीच 8 फरवरी 1999 को वित्त विभाग ने नया वेतनमान लागू कर दिया था। जिला प्रशासन ने 1999 में नियुक्ति पाने वाले उम्मीदवारों को “न्यू रिक्रूट” मानते हुए उनका वेतनमान 4000-6000 रुपये से घटाकर 3200-4900 रुपये कर दिया।

इतना ही नहीं, बाद में इसी आधार पर उनके ग्रेड पे और एमएसीपी लाभों में भी कटौती कर दी गई। जबकि उनके साथ चयन प्रक्रिया में शामिल अन्य कर्मचारी पुराने उच्च वेतनमान का लाभ ले रहे थे।हाईकोर्ट के इस फैसले को राज्य के हजारों कर्मचारियों के लिए बड़ी राहत माना जा रहा है। कर्मचारी संगठनों का कहना है कि यह फैसला भविष्य में ऐसे मामलों के लिए महत्वपूर्ण मिसाल बनेगा, जहां प्रशासनिक देरी का खामियाजा कर्मचारियों को भुगतना पड़ता है।

अमिताभ सिन्हा

अमिताभ सिन्हा hpbltop.com के वरिष्ठ राजनीतिक संपादक हैं। पत्रकारिता में 12 वर्षों से अधिक के अनुभव के साथ, उन्हें भारतीय राजनीति, चुनावी रणनीतियों और संसद की कार्यवाही की गहरी समझ है। अमिताभ की रिपोर्टिंग तथ्यों पर आधारित और निष्पक्ष होती है। वे जटिल सरकारी नीतियों को सरल भाषा में पाठकों तक पहुँचाने में माहिर हैं। खाली समय में वे राजनीतिक इतिहास पढ़ना पसंद करते हैं।
  • ईमेल: amitabh@hpbltop.com

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