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झारखंड हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: FIR के आधार पर बर्खास्तगी नहीं चलेगी, JAP सिपाही की नौकरी बहाल करने का आदेश, महिला ने रेप व प्रताड़ना के लगाये थे आरोप

झारखंड हाईकोर्ट ने JAP के बर्खास्त कांस्टेबल भारत पाठक को बड़ी राहत देते हुए बर्खास्तगी रद्द कर दी। कोर्ट ने सभी बकाया वेतन और सेवा लाभों के साथ नौकरी में बहाल करने का आदेश दिया।

कोर्ट ने कहा- चार्जशीट से बाहर के आरोपों पर नहीं दी जा सकती सजा, सभी बकाया वेतन और सेवा लाभ भी देने के निर्देश

रांची। बर्खास्त सिपाही को बहाल करने का आदेश हाईकोर्ट ने दिया है। झारखंड हाईकोर्ट ने याचिका पर सुनवाई करते हुए झारखंड आर्म्ड पुलिस (JAP) के एक बर्खास्त कांस्टेबल को बड़ी राहत देते हुए उसकी बर्खास्तगी को अवैध करार दिया है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट कहा कि किसी सरकारी कर्मचारी को केवल एफआईआर दर्ज होने या चार्जशीट से बाहर के आरोपों के आधार पर नौकरी से नहीं निकाला जा सकता।

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हाईकोर्ट में जस्टिस दीपक रौशन की अदालत ने भारत पाठक उर्फ भारत कुमार पाठक की याचिका स्वीकार करते हुए विभाग द्वारा जारी बर्खास्तगी आदेश, उसके बाद के परिणामी आदेश तथा अपील खारिज करने के आदेश को निरस्त कर दिया। कोर्ट ने राज्य सरकार को कांस्टेबल को सभी बकाया वेतन (Back Wages) और अन्य सेवा लाभों के साथ पुनः सेवा में बहाल करने का निर्देश दिया।

क्या था मामला?

दरअसल भारत पाठक वर्ष 2007 से झारखंड आर्म्ड पुलिस में कांस्टेबल के पद पर कार्यरत थे। वर्ष 2023 में एक महिला ने आरोप लगाया कि भारत पाठक ने उससे विवाह का वादा कर पति-पत्नी की तरह संबंध बनाए, लेकिन बाद में उसे अपनाने से इनकार कर दिया। शिकायत के बाद विभागीय जांच शुरू हुई। इसी दौरान चुटिया थाना में भारत पाठक के खिलाफ धारा 417 और 376(2)(n) के तहत एफआईआर भी दर्ज हुई। इसके बाद उन्हें निलंबित कर विभागीय कार्रवाई के बाद सेवा से बर्खास्त कर दिया गया।

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जांच में नहीं मिले ठोस सबूत

हाईकोर्ट ने विभागीय जांच का रिकॉर्ड देखने के बाद पाया कि आरोपों के समर्थन में कोई स्वतंत्र साक्ष्य मौजूद नहीं था। भारत पाठक और शिकायतकर्ता महिला दोनों पहले से शादीशुदा थे तथा दोनों के बच्चे भी थे. विभागीय जांच के अनुसार, दोनों की मुलाकात ऑनलाइन हुई थी और बाद में वे कथित रूप से आपसी सहमति से विभिन्न होटलों और किराए के मकानों में पति-पत्नी की तरह साथ रहे। बाद में दोनों के बीच विवाद होने पर महिला ने शिकायत दर्ज कराई, जिसके आधार पर चुटिया थाना में IPC की धारा 417 और 376(2)(n) के तहत प्राथमिकी भी दर्ज की गई. इसके बाद विभागीय कार्रवाई शुरू कर उन्हें निलंबित कर दिया गया।

अदालत ने कहा कि जांच में—

• कथित विवाह का कोई दस्तावेज पेश नहीं किया गया।
• होटल में ठहरने का कोई रिकॉर्ड या CCTV उपलब्ध नहीं था।
• किराए के मकान का कोई प्रमाण नहीं था।
• किसी स्वतंत्र गवाह का बयान भी नहीं था।
कोर्ट के अनुसार पूरी विभागीय कार्रवाई केवल शिकायतकर्ता के बयान पर आधारित थी।

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चार्जशीट कुछ और, सजा किसी और आधार पर

फैसले में हाईकोर्ट ने सबसे गंभीर टिप्पणी इस बात पर की कि विभागीय चार्जशीट में जिन आरोपों की जांच हुई, अंतिम बर्खास्तगी आदेश उन आरोपों पर नहीं बल्कि एफआईआर दर्ज होने को आधार बनाकर पारित कर दिया गया।अदालत ने कहा कि किसी कर्मचारी को केवल उन्हीं आरोपों पर दंडित किया जा सकता है, जो विभागीय आरोपपत्र का हिस्सा हों। चार्जशीट से बाहर के आरोपों के आधार पर सजा देना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन है।

सिर्फ FIR नौकरी छीनने का आधार नहीं

कोर्ट ने अनुशासनात्मक और अपीलीय प्राधिकारियों की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए। अदालत ने कहा कि दोनों आदेश “नॉन-स्पीकिंग ऑर्डर” थे, क्योंकि इनमें यह नहीं बताया गया कि किन साक्ष्यों के आधार पर आरोप सिद्ध माने गए। केवल एफआईआर दर्ज होने को आधार बनाकर बर्खास्तगी कर दी गई, जो कानून की कसौटी पर टिक नहीं सकती।

व्यभिचार अब अपराध नहीं

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के Joseph Shine बनाम Union of India फैसले का हवाला देते हुए कहा कि व्यभिचार (Adultery) अब आपराधिक अपराध नहीं है। इसलिए केवल ऐसे आरोपों के आधार पर किसी कर्मचारी के खिलाफ कठोर विभागीय कार्रवाई उचित नहीं मानी जा सकती।

सरकार को क्या करना होगा?

हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि भारत पाठक को:
• सेवा में पुनः बहाल किया जाए।
• बर्खास्तगी अवधि का पूरा बकाया वेतन दिया जाए।
• सभी सेवा संबंधी लाभ बहाल किए जाएं।
यह फैसला सरकारी कर्मचारियों के विभागीय अनुशासनात्मक मामलों में प्राकृतिक न्याय, निष्पक्ष जांच और साक्ष्यों के महत्व को लेकर एक महत्वपूर्ण नजीर माना जा रहा है।

अमिताभ सिन्हा

अमिताभ सिन्हा hpbltop.com के वरिष्ठ राजनीतिक संपादक हैं। पत्रकारिता में 12 वर्षों से अधिक के अनुभव के साथ, उन्हें भारतीय राजनीति, चुनावी रणनीतियों और संसद की कार्यवाही की गहरी समझ है। अमिताभ की रिपोर्टिंग तथ्यों पर आधारित और निष्पक्ष होती है। वे जटिल सरकारी नीतियों को सरल भाषा में पाठकों तक पहुँचाने में माहिर हैं। खाली समय में वे राजनीतिक इतिहास पढ़ना पसंद करते हैं। ईमेल: amitabh@hpbltop.com

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