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Misir Besra Biography: 2.20 करोड़ के इनामी मिसिर बेसरा की पूरी कहानी, होनहार छात्र कैसे बना सबसे खूंखार नक्सली, 17 साल पहले पुलिस पर हमला कर छुड़ा ले भागे थे नक्सली

Misir Besra Biography: The full story of Misir Besra, who carries a bounty of ₹2.20 crore—tracing his journey from a promising student to one of the most dreaded Naxalites; he had escaped 17 years ago after Naxalites attacked the police and freed him.

Maoist Leader Misir Besra Arrest। । लगभग चार दशक तक नक्सली आंदोलन का चेहरा रहे भाकपा (माओवादी) के शीर्ष नेता मिसिर बेसरा उर्फ भास्कर, सुनिर्मल और सागर आखिरकार सुरक्षा एजेंसियों के हत्थे चढ़ गए। जितने अलग-अलग नाम, जुर्म की कहानी भी उतनी ही अलग-अलग। 28 जुलाई 2026 की देर रात धनबाद-गिरिडीह सीमा के मनियाडीह-टुंडी क्षेत्र में केंद्रीय और राज्य सुरक्षा बलों के संयुक्त अभियान में उनकी गिरफ्तारी हुई। सुरक्षा एजेंसियां इसे देश के नक्सल विरोधी अभियान की सबसे बड़ी सफलताओं में से एक मान रही हैं। मिसिर बेसरा देश का इकलौता बचा सबसे खूंखार नक्सली था।

 

मिसिर बेसरा पर झारखंड सरकार ने ₹1 करोड़ और ओडिशा सरकार ने ₹1.20 करोड़ का इनाम घोषित कर रखा था। झारखंड, बिहार, ओडिशा और छत्तीसगढ़ में उनके खिलाफ 150 से अधिक गंभीर मामले दर्ज थे। लेकिन सवाल यह है कि आखिर मिसिर बेसरा कौन था और कैसे वह देश के सबसे प्रभावशाली माओवादी नेताओं में शामिल हो गया? आइए जानते हैं उसकी पूरी कहानी।

 

गिरिडीह का छात्र कैसे बना माओवादी?

 

नक्सली मिसिर बेसरा झारखंड के गिरिडीह जिले के पीरटांड़ क्षेत्र का रहने वाला था। कॉलेज में पढ़ाई के दौरान ही वह वामपंथी विचारधारा से प्रभावित हुआ। उस दौर में गिरिडीह और आसपास के इलाकों में जमींदारों और महाजनी प्रथा के खिलाफ आंदोलन चल रहे थे।

इन्हीं आंदोलनों के दौरान उसकी मुलाकात वरिष्ठ माओवादी नेता प्रशांत बोस से हुई। पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार, 1980 के शुरुआती वर्षों में बेसरा ने प्रशांत बोस के साथ गांव-गांव घूमकर माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर ऑफ इंडिया (MCCI) की विचारधारा का प्रचार किया और संगठन के विस्तार में अहम भूमिका निभाई।

 

MCCI से CPI (माओवादी) तक का सफर

 

उस समय बिहार और झारखंड में MCCI सबसे सक्रिय नक्सली संगठनों में से एक था। सितंबर 2004 में MCCI और आंध्र प्रदेश के पीपुल्स वार ग्रुप (PWG) का विलय हुआ, जिसके बाद भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) का गठन हुआ।इस विलय के बाद मिसिर बेसरा संगठन के शीर्ष नेतृत्व में पहुंच गया और धीरे-धीरे पोलित ब्यूरो तथा केंद्रीय समिति का प्रभावशाली सदस्य बन गया।

 

2007 में गिरफ्तारी, 2009 में फिल्मी अंदाज में फरारी

 

मिसिर बेसरा पहली बार सितंबर 2007 में झारखंड के खूंटी जिले से गिरफ्तार किया गया था।लेकिन 2009 में बिहार के लखीसराय कोर्ट में पेशी के दौरान माओवादियों ने पुलिस दल पर हमला कर दिया और बेसरा को छुड़ा ले गए। यह घटना उस समय देश की सबसे चर्चित नक्सली घटनाओं में गिनी गई थी।इसके बाद वह वर्षों तक सुरक्षा एजेंसियों की पकड़ से बाहर रहा।

 

जंगलों से चलाता रहा संगठन

 

फरारी के बाद मिसिर बेसरा ने झारखंड के सारंडा, कोल्हान, बूढ़ा पहाड़, पारसनाथ और आसपास के घने जंगलों को अपना ठिकाना बनाया।सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार, वह यहीं से संगठन की रणनीति बनाता, नए कैडरों की भर्ती कराता और विभिन्न राज्यों में माओवादी गतिविधियों का संचालन करता था।

 

150 से ज्यादा मामले और 2.20 करोड़ का इनाम

 

मिसिर बेसरा के खिलाफ झारखंड, बिहार, ओडिशा और छत्तीसगढ़ में हत्या, विस्फोट, पुलिस पर हमले, रंगदारी, हथियारबंद गतिविधियों सहित 150 से अधिक आपराधिक मामले दर्ज थे। राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) भी दो मामलों में उसकी तलाश कर रही थी।

 

उस पर घोषित इनाम:

 

• झारखंड सरकार: ₹1 करोड़

• ओडिशा सरकार: ₹1.20 करोड़

कुल इनामी राशि ₹2.20 करोड़ थी।

 

कैसे मिली सबसे बड़ी सफलता?

 

सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार, गिरफ्तारी से कुछ घंटे पहले मिसिर बेसरा के मुख्य अंगरक्षक देवन मुर्मू उर्फ शनिश्चरवा समेत कई नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया था।पूछताछ में मिली अहम जानकारियों और पहले से चल रही तकनीकी व मानव खुफिया निगरानी के आधार पर सुरक्षा एजेंसियों ने उसकी लोकेशन की पुष्टि की।

इसके बाद आईबी, सीआरपीएफ, कोबरा बटालियन, झारखंड जगुआर और झारखंड पुलिस ने संयुक्त ऑपरेशन चलाकर धनबाद-गिरिडीह सीमा पर उसे गिरफ्तार कर लिया।बताया गया कि वह अपने साथियों के साथ एक टाटा मैजिक वाहन से स्थान बदलने की कोशिश कर रहा था।

 

दो और इनामी नक्सली भी गिरफ्तार

 

ऑपरेशन के दौरान मिसिर बेसरा के साथ दो अन्य इनामी माओवादी भी पकड़े गए—

• मेहनत उर्फ मोछू उर्फ विभीषण मुर्मू (₹15 लाख इनामी)

• गौरव उर्फ सौरभ (₹15 लाख इनामी)

इसके अलावा दो अन्य संदिग्ध सहयोगियों को भी हिरासत में लेकर पूछताछ की जा रही है।

 

क्यों मानी जा रही है ऐतिहासिक गिरफ्तारी?

 

सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि मई 2025 में शीर्ष माओवादी नेता बसवा राजू के मारे जाने और फरवरी 2026 में पोलित ब्यूरो सदस्य देवा के आत्मसमर्पण के बाद मिसिर बेसरा संगठन के सबसे प्रभावशाली नेताओं में शामिल था।

 

ऐसे में उसकी गिरफ्तारी को माओवादी संगठन के रणनीतिक ढांचे के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है। इससे झारखंड, बिहार, ओडिशा, छत्तीसगढ़ और पूर्वी भारत के अन्य प्रभावित क्षेत्रों में संगठन की गतिविधियों पर व्यापक असर पड़ सकता है।

 

परिवार की अपील भी नहीं बदली फैसला

 

जानकारी के अनुसार, सुरक्षा एजेंसियों और परिजनों ने कई बार मिसिर बेसरा से आत्मसमर्पण कर मुख्यधारा में लौटने की अपील की थी। उसके भाई, बेटे और दामाद ने भी उसे हथियार छोड़ने के लिए मनाने की कोशिश की, लेकिन उसने संगठन नहीं छोड़ा।बताया जाता है कि वह लंबे समय तक सारंडा और कोल्हान के जंगलों में सक्रिय रहा और कई अभियानों में सुरक्षा बलों को चकमा देने में सफल रहा।

 

नक्सल आंदोलन के एक दौर का अंत

 

मिसिर बेसरा की गिरफ्तारी को केवल एक बड़े इनामी नक्सली की गिरफ्तारी नहीं, बल्कि भारतीय नक्सल आंदोलन के एक लंबे और हिंसक दौर के कमजोर पड़ने का संकेत माना जा रहा है। पिछले कुछ वर्षों में लगातार मुठभेड़ों, आत्मसमर्पण और शीर्ष नेताओं के मारे जाने या गिरफ्तार होने के बाद माओवादी संगठन की क्षमता पहले की तुलना में काफी घट चुकी है।

 

हालांकि सुरक्षा एजेंसियां यह भी मानती हैं कि किसी एक नेता की गिरफ्तारी से उग्रवाद पूरी तरह समाप्त नहीं माना जा सकता। संगठन के शेष कैडर और स्थानीय नेटवर्क पर कार्रवाई जारी रखना उतना ही महत्वपूर्ण रहेगा।

अमिताभ सिन्हा

अमिताभ सिन्हा hpbltop.com के वरिष्ठ राजनीतिक संपादक हैं। पत्रकारिता में 12 वर्षों से अधिक के अनुभव के साथ, उन्हें भारतीय राजनीति, चुनावी रणनीतियों और संसद की कार्यवाही की गहरी समझ है। अमिताभ की रिपोर्टिंग तथ्यों पर आधारित और निष्पक्ष होती है। वे जटिल सरकारी नीतियों को सरल भाषा में पाठकों तक पहुँचाने में माहिर हैं। खाली समय में वे राजनीतिक इतिहास पढ़ना पसंद करते हैं। ईमेल: amitabh@hpbltop.com

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