झारखंड: 31 साल पहले 100 रुपये की घूस, 22 साल बाद आया फैसला, 75 की उम्र में रेलकर्मी को जेल; हाईकोर्ट ने बरकरार रखी सजा
झारखंड हाईकोर्ट ने 1995 के 100 रुपये रिश्वत मामले में पूर्व रेलवे पार्सल क्लर्क काली शंकर धोबी की दोषसिद्धि बरकरार रखी। 75 साल की उम्र में जेल जाना होगा।

रांची। 100 रुपये की रिश्वत… रकम छोटी थी, लेकिन इसका कानूनी हिसाब चुकता होने में 31 साल लग गए। वर्ष 1995 में हटिया रेलवे स्टेशन पर मोटरसाइकिल बुक कराने के एवज में 100 रुपये लेने के मामले में तत्कालीन पार्सल क्लर्क काली शंकर धोबी की दोषसिद्धि झारखंड हाईकोर्ट ने बरकरार रखी है। अब 75 वर्ष की उम्र में उन्हें जेल जाना होगा।हालांकि, इतने लंबे समय तक चले मुकदमे और उनकी उम्र को देखते हुए हाईकोर्ट ने सजा की अवधि कम कर दी है। अदालत ने 10 सितंबर 2026 को फैसला सुनाते हुए ट्रायल कोर्ट की दोषसिद्धि में हस्तक्षेप करने से इनकार किया, लेकिन कारावास को न्यूनतम निर्धारित सजा तक घटा दिया।
मोटरसाइकिल बुक कराने पहुंचे थे, 100 रुपये अतिरिक्त मांगे गए
मामला 26-27 अप्रैल 1995 का है। शिकायतकर्ता निर्मल कुमार बेंगानी अपनी मोटरसाइकिल को हटिया रेलवे स्टेशन से समस्तीपुर भेजना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने वहां तैनात पार्सल क्लर्क काली शंकर धोबी से संपर्क किया। अदालत के रिकॉर्ड के मुताबिक मोटरसाइकिल की बुकिंग के लिए 203 रुपये शुल्क बताया गया था। आरोप था कि इसके अलावा क्लर्क ने 100 रुपये अतिरिक्त मांगे। शिकायतकर्ता ने इसे देने से इनकार किया और 27 अप्रैल 1995 को सीबीआई के एसपी के पास शिकायत कर दी।
CBI ने बिछाया जाल, नोट पहले ही कर लिए थे दर्ज
शिकायत मिलने के बाद सीबीआई ने ट्रैप की तैयारी की। रिश्वत की रकम के नोटों की पहचान दर्ज की गई और फिर शिकायतकर्ता को रकम लेकर क्लर्क के पास भेजा गया।अभियोजन के अनुसार, काली शंकर ने 100 रुपये स्वीकार किए। इसके बाद पहले से तैयार सीबीआई टीम ने कार्रवाई की। तलाशी के दौरान वही नोट बरामद हुआ, जिसका नंबर ट्रैप से पहले दर्ज किया गया था। ट्रैप की वैज्ञानिक जांच भी अभियोजन के पक्ष में गई। रिकॉर्ड के मुताबिक हाथ धोने के लिए इस्तेमाल किए गए सोडियम कार्बोनेट के घोल का रंग गुलाबी हो गया था और बाद की जांच में फिनॉल्फ्थेलिन के संबंध में भी साक्ष्य सामने आया।
11 गवाहों की गवाही के बाद 2004 में हुई थी सजा
जांच पूरी होने के बाद सीबीआई ने आरोप पत्र दाखिल किया। मुकदमे में अभियोजन की ओर से 11 गवाह पेश किए गए। इसके बाद स्पेशल जज, सीबीआई, रांची ने 28 मई 2004 को काली शंकर धोबी को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की संबंधित धाराओं के तहत दोषी ठहराया।उन्हें धारा 7 के तहत एक साल की कठोर कैद और 4 हजार रुपये जुर्माना तथा धारा 13(2) सहपठित धारा 13(1)(d) के तहत डेढ़ साल की कठोर कैद और 6 हजार रुपये जुर्माना सुनाया गया था। दोनों सजाएं साथ-साथ चलनी थीं।
2004 में हाईकोर्ट पहुंचे, फैसला आने में लग गए 22 साल
ट्रायल कोर्ट की सजा के खिलाफ काली शंकर धोबी ने वर्ष 2004 में झारखंड हाईकोर्ट में आपराधिक अपील दाखिल की। इसके बाद यह मामला लंबे समय तक लंबित रहा।हाईकोर्ट ने अपने फैसले में इस बात को ध्यान में रखा कि घटना से अंतिम अपीलीय फैसले तक करीब 31 साल बीत चुके हैं और अपील दो दशक से अधिक समय तक लंबित रही।
हाईकोर्ट ने कहा- रिश्वत की मांग और लेना साबित
बचाव पक्ष की ओर से ट्रैप के गवाहों के बयानों में कथित विरोधाभास और अन्य साक्ष्यों पर सवाल उठाए गए। यह दलील भी दी गई कि 100 रुपये को अतिरिक्त शुल्क के तौर पर लिया गया था।लेकिन हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड पर मौजूद मौखिक, दस्तावेजी और वैज्ञानिक साक्ष्यों को देखते हुए इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने माना कि अभियोजन ने रिश्वत की मांग, उसके स्वीकार किए जाने और रकम की बरामदगी को पर्याप्त साक्ष्यों से साबित किया है।
75 साल की उम्र में मिली सजा में राहत
दोषसिद्धि बरकरार रखने के बाद अदालत ने सजा के पहलू पर विचार किया। इस दौरान आरोपी की उम्र 75 वर्ष से अधिक होने, मामले के 31 साल तक चलने, उनके पहले अपराध होने और रेलवे सेवा से बर्खास्त किए जाने जैसे तथ्यों को ध्यान में रखा गया।इन्हीं परिस्थितियों में हाईकोर्ट ने सजा घटाकर धारा 7 में छह महीने की साधारण कैद और धारा 13(2) सहपठित धारा 13(1)(d) में एक साल की साधारण कैद कर दी। दोनों सजाएं साथ-साथ चलेंगी। जुर्माने की रकम में बदलाव नहीं किया गया।
दो महीने के भीतर करना होगा सरेंडर
काली शंकर धोबी फिलहाल जमानत पर थे। हाईकोर्ट ने उनका बेल बॉन्ड रद्द करते हुए उन्हें फैसले की तारीख से दो महीने के भीतर ट्रायल कोर्ट के समक्ष आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया है। ऐसा नहीं करने पर ट्रायल कोर्ट को उन्हें हिरासत में लेकर जेल भेजने की कार्रवाई करने को कहा गया है।












