झारखंड : कोर्ट जाने पर नौकरी से नहीं निकाल सकते, 9 कर्मचारियों की बर्खास्तगी रद्द; हाईकोर्ट ने बहाली का दिया आदेश
झारखंड हाईकोर्ट ने कहा कि संवैधानिक अधिकारों के लिए कोर्ट जाने वाले कर्मचारी को प्रतिशोध में सेवा से नहीं हटाया जा सकता। 9 संविदाकर्मियों की बहाली और नियमितीकरण का आदेश।

रांची। कोर्ट जाने पर किसी कर्मचारी को नौकरी से बर्खास्त नहीं किया जा सकता है। हाईकोर्ट ने कर्मचारियों के हक में बड़ा फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट ने कहा है कि अधिकारों के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाना किसी कर्मचारी के खिलाफ कार्रवाई की वजह नहीं बन सकता। झारखंड हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए न्यायालय की शरण लेने वाले कर्मचारी को इसके प्रतिशोध में सेवा से हटाना कानून के खिलाफ है।
जस्टिस दीपक रोशन की पीठ ने धरो उरांव और अन्य की याचिका पर सुनवाई करते हुए सरकार के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें लंबे समय से काम कर रहे कर्मचारियों के नियमितीकरण के दावे को खारिज कर दिया गया था।
अदालत ने राज्य सरकार को याचिकाकर्ताओं को सेवा में वापस लेने, नियमितीकरण की प्रक्रिया पूरी करने और उसके आधार पर मिलने वाले सभी परिणामी लाभ देने का निर्देश दिया है। इसके लिए सरकार को आदेश की प्रति मिलने के छह सप्ताह के भीतर कार्रवाई करने को कहा गया है।
2004-05 से विभाग में दे रहे थे सेवा
मामला स्वास्थ्य, चिकित्सा शिक्षा एवं परिवार कल्याण विभाग की अभियंत्रण कोषांग में काम करने वाले कर्मचारियों से जुड़ा है। याचिकाकर्ताओं को वर्ष 2004-05 के आसपास अलग-अलग पदों पर संविदा के आधार पर नियुक्त किया गया था। इनमें लिपिक, टाइपिस्ट, चालक और पंप ऑपरेटर जैसे पद शामिल थे।
विभाग के विलय के बाद भी इन कर्मचारियों ने जनवरी 2017 तक काम किया। इसके बाद उन्हें बिना किसी औपचारिक आदेश और कारण बताओ नोटिस के काम से अलग कर दिया गया। इसी के खिलाफ कर्मचारियों ने हाईकोर्ट का रुख किया।
पहले भी नियमितीकरण के पक्ष में आया था आदेश
मामला पहली बार अदालत में पहुंचने के बाद भी कर्मचारियों को राहत मिली थी। एकल पीठ ने 4 फरवरी 2017 को उनकी सेवा नियमित करने का आदेश दिया था। राज्य सरकार ने इस आदेश को अपील में चुनौती दी, लेकिन उसे भी खारिज कर दिया गया और सरकार पर 25 हजार रुपये का हर्जाना लगाया गया।इसके बावजूद कर्मचारियों के नियमितीकरण का विवाद पूरी तरह खत्म नहीं हुआ। विभाग ने 14 अगस्त 2024 को फिर उनके दावे को खारिज कर दिया। यही आदेश इस बार हाईकोर्ट के सामने चुनौती का विषय बना।
10 साल से ज्यादा की सेवा को कोर्ट ने माना अहम
सुनवाई के दौरान अदालत के सामने यह तथ्य आया कि याचिकाकर्ताओं ने लंबे समय तक लगातार काम किया था। वे संबंधित विभाग के काम का हिस्सा बने रहे और उनके मामले में सक्षम स्तर से नियुक्ति की स्वीकृति भी मौजूद थी।राज्य की ओर से यह तर्क रखा गया कि कर्मचारियों की नियुक्ति को नियमित नियुक्ति नहीं माना जा सकता। हालांकि, अदालत ने उपलब्ध रिकॉर्ड और कर्मचारियों की लंबी सेवा की स्थिति को देखते हुए सरकार के रुख को स्वीकार नहीं किया।
कोर्ट ने कहा कि यदि किसी कर्मचारी ने वर्षों तक लगातार संस्थान की जरूरत का काम किया है, तो केवल उसे ‘संविदा’ या ‘अस्थायी’ कर्मचारी कह देने से उसके मामले की वास्तविक स्थिति खत्म नहीं हो जाती। न्यायिक रिकॉर्ड में भी ऐसे लंबे समय से काम कर रहे कर्मचारियों के नियमितीकरण के सिद्धांतों पर विस्तार से विचार किया गया है।
कोर्ट जाने को कार्रवाई का आधार बनाना गलत
इस मामले का सबसे अहम पहलू कर्मचारियों के अदालत जाने के बाद उनके साथ हुए व्यवहार से जुड़ा है। हाईकोर्ट ने साफ किया कि किसी नागरिक को अपने कानूनी और संवैधानिक अधिकारों की सुरक्षा के लिए अदालत जाने के कारण प्रतिकूल परिणाम भुगतने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।
पीठ ने इस तरह की कार्रवाई को कानून के शासन की मूल भावना के विपरीत माना। अदालत ने राज्य और उसकी एजेंसियों को यह संदेश भी दिया कि कर्मचारियों के न्यायिक उपचार के अधिकार को उनके खिलाफ इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।
सरकार का आदेश रद्द, छह सप्ताह में कार्रवाई का निर्देश
हाईकोर्ट ने 14 अगस्त 2024 के विभागीय आदेशों को रद्द कर दिया। इसके साथ ही राज्य सरकार को याचिकाकर्ताओं को सेवा में बहाल करने और उनके नियमितीकरण की प्रक्रिया पूरी करने का निर्देश दिया गया।अदालत ने कहा कि नियमितीकरण के साथ कर्मचारियों को उससे जुड़े सभी परिणामी लाभ भी दिए जाएं। सरकार को यह पूरी कार्रवाई छह सप्ताह के भीतर पूरी करनी होगी।












