Jharkhand Politics: हेमंत सोरेन पर बयानबाजी पड़ेगी भारी? तीन साल का निष्कासन तीन महीने में हुआ था रद्द, अब फिर दोबारा विवादित बयानों से घिरे योगेंद्र साव
हेमंत सोरेन के खिलाफ बयानबाजी को लेकर कांग्रेस नेता योगेंद्र साव फिर मुश्किल में हैं। JMM के दबाव और अनुशासन समिति की कार्रवाई के बीच जानें पूरा सियासी मामला।

Jharkhand Politics: झारखंड की सियासत में एक बार फिर कांग्रेस नेता और पूर्व मंत्री योगेंद्र साव की मुश्किलें बढ़ने वाली है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के खिलाफ लगातार बयानबाजी करने वाले योगेंद्र साव की मुश्किलें बढ़ने वाली है। योगेंद्र साव पर कांग्रेस ने पहले भी अनुशासनात्मक कार्रवाई की थी। अब एक बार फिर मामला पार्टी की अनुशासन समिति तक पहुंच चुका है और इस पूरे घटनाक्रम में झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) के रुख ने कांग्रेस की मुश्किल बढ़ा दी है।सियासी गलियारों में चर्चा इसलिए भी तेज है क्योंकि सवाल सिर्फ एक नेता के बयान का नहीं, बल्कि JMM-कांग्रेस गठबंधन के भीतर बढ़ते दबाव का भी है।
जिस निष्कासन को तीन साल का बताया गया, वह तीन महीने में ही पलट गया
योगेंद्र साव पर मार्च 2026 में कांग्रेस ने कार्रवाई करते हुए उन्हें तीन साल के लिए पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से निष्कासित किया था। कार्रवाई की वजह मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और गठबंधन सरकार के खिलाफ उनकी सार्वजनिक बयानबाजी बताई गई थी। उस समय कांग्रेस की अनुशासन समिति के अध्यक्ष डॉ. रामेश्वर उरांव थे।
हालांकि बाद में उनका निष्कासन वापस ले लिया गया। इसके बाद एक बार फिर साव के बयानों ने पार्टी नेतृत्व और गठबंधन के सामने असहज स्थिति पैदा कर दी।यही वजह है कि अब कांग्रेस के भीतर भी यह सवाल उठ रहा है कि पहले की कार्रवाई वापस लेने के बाद अगर वही विवाद फिर खड़ा हो गया तो आगे क्या रास्ता अपनाया जाए?
JMM ने कांग्रेस से पूछा—सीट किसके लिए छोड़ेंगे?
इस पूरे मामले में हजारीबाग के झामुमो नेताओं का रुख खास तौर पर सख्त बताया जा रहा है। उनका सवाल है कि अगर कोई नेता लगातार मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और सरकार के खिलाफ बयान देता है, तो गठबंधन में उसके लिए राजनीतिक जगह क्यों बनाई जाए? JMM नेताओं की नाराजगी का असर अब कांग्रेस पर दबाव के रूप में दिखाई दे रहा है। मामला सिर्फ योगेंद्र साव के बयानों तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि आने वाले राजनीतिक समीकरण और सीट बंटवारे से भी जोड़कर देखा जा रहा है।
कांग्रेस ने भी दिखाया सख्त रुख
सितंबर में योगेंद्र साव को कांग्रेस की अनुशासन समिति ने कारण बताओ नोटिस जारी कर तीन दिनों के भीतर लिखित जवाब देने और व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर स्पष्टीकरण देने को कहा था। नोटिस में उनके सार्वजनिक बयानों को पार्टी अनुशासन के विपरीत बताया गया था।
मामले की गंभीरता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि साव को इससे पहले भी अनुशासनात्मक कार्रवाई का सामना करना पड़ा था।बाद में अनुशासन समिति की बैठक में उनके जवाब और पूरे मामले पर चर्चा की गई।
इस बार क्या होगा? यही सबसे बड़ा सवाल
अब निगाहें कांग्रेस के अगले कदम पर हैं। पार्टी के भीतर से सामने आ रही चर्चाओं के मुताबिक इस बार योगेंद्र साव के खिलाफ सख्त कार्रवाई की संभावना को गंभीरता से देखा जा रहा है।हालांकि अंतिम फैसला कांग्रेस की अनुशासन समिति और पार्टी नेतृत्व को ही करना है।
इसलिए फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि साव को दोबारा निष्कासित किया जाएगा या कोई दूसरी कार्रवाई होगी।लेकिन इतना साफ है कि हेमंत सोरेन पर बयानबाजी ने योगेंद्र साव की मुश्किलें एक बार फिर बढ़ा दी हैं।
गठबंधन की राजनीति में मामला सिर्फ बयान तक नहीं
योगेंद्र साव प्रकरण का असर सिर्फ कांग्रेस के अंदरूनी अनुशासन तक सीमित नहीं है। झारखंड में कांग्रेस और JMM गठबंधन सरकार के साझेदार हैं। ऐसे में गठबंधन के मुख्यमंत्री के खिलाफ किसी सहयोगी दल के नेता की लगातार बयानबाजी स्वाभाविक रूप से राजनीतिक असहजता पैदा करती है।
अब देखना यह है कि कांग्रेस इस बार योगेंद्र साव के मामले में कितना सख्त रुख अपनाती है और क्या JMM के दबाव का असर पार्टी के फैसले में दिखाई देता है।फिलहाल झारखंड की राजनीति में सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या योगेंद्र साव फिर कांग्रेस से बाहर होंगे, या पार्टी एक बार फिर उन्हें राहत देगी?आने वाला फैसला न सिर्फ साव के राजनीतिक भविष्य के लिए अहम होगा, बल्कि JMM-कांग्रेस के रिश्तों और हजारीबाग के सियासी समीकरण पर भी इसका असर पड़ सकता है।












