Navratri 2026: 9 या 10 दिन? इस बार नवरात्र को लेकर क्यों है बड़ा कन्फ्यूजन, अष्टमी की तारीख भी बढ़ाएगी सस्पेंस
Navratri 2026: इस बार शारदीय नवरात्रि कितने दिन की होगी? अष्टमी को लेकर क्यों है कन्फ्यूजन और कलश स्थापना का शुभ मुहूर्त क्या है? जानिए पूरी जानकारी।

Dharm Desk। शारदीय नवरात्रि शुरू होने वाली है। नवरात्र में मां दुर्गा की अराधना को लेकर हर बार तिथि पर कंफ्यूजन रहता था। इस बार भी तिथि को लेकर भक्तों के मन में कई तरह के कंफ्यूजन है। महालया के ठीक पहले इस बार भक्तों के बीच एक सवाल सबसे ज्यादा चर्चा में है—नवरात्रि आखिर 9 दिन की होगी या 10 दिन की? वजह है तिथियों का ऐसा संयोग, जिसमें नवरात्रि के दौरान कुछ तिथियों का प्रभाव एक से अधिक दिनों तक दिखाई देगा।
इसी के चलते अष्टमी और नवमी की तारीख को लेकर भी अलग-अलग जानकारी सामने आ रही है।हालांकि, पंचांग की गणना के अनुसार शारदीय नवरात्रि का शुभारंभ 11 अक्टूबर 2026 से होगा। प्रतिपदा तिथि 10 अक्टूबर की रात से शुरू होकर 11 अक्टूबर की रात तक रहेगी।
उदया तिथि के आधार पर नवरात्रि की शुरुआत 11 अक्टूबर से मानी जाएगी।यानी इस बार नवरात्रि की शुरुआत को लेकर भी 10 और 11 अक्टूबर के बीच भ्रम की स्थिति बन सकती है, लेकिन धार्मिक अनुष्ठानों के लिए उदया तिथि को आधार माना जाएगा।
सबसे बड़ा सवाल—9 दिन या 10 दिन?
नवरात्रि के दौरान तिथियों के घटने-बढ़ने के कारण इस बार पर्व की अवधि को लेकर अलग-अलग गणनाएं सामने आ रही हैं। उपलब्ध पंचांग गणना के अनुसार नवरात्रि के नौ दिनों में देवी के अलग-अलग स्वरूपों की पूजा होगी, जबकि कुछ तिथियों के प्रभाव के कारण कैलेंडर में पर्व की अवधि लंबी नजर आ सकती है।इसी वजह से भक्तों के बीच यह सवाल है कि आखिर व्रत और पूजा की गणना किस तरह की जाए। स्थानीय पंचांग और परंपरा के अनुसार पूजा-व्रत की तिथियों का पालन करना उचित रहेगा।
अष्टमी पर भी रहेगा दो दिन का असर
इस बार अष्टमी तिथि के प्रभाव को लेकर भी खास चर्चा है। तिथि के समय के कारण अष्टमी से जुड़े धार्मिक अनुष्ठानों की तारीख को लेकर अलग-अलग पंचांगों में अंतर दिखाई दे सकता है।कन्या पूजन, अष्टमी पूजा और नवमी से जुड़े अनुष्ठानों के लिए स्थानीय पंचांग में दिए गए समय को देखना जरूरी होगा। यही वजह है कि इस बार नवरात्रि में अष्टमी को लेकर भक्तों की उत्सुकता बनी हुई है।
कलश स्थापना का मुहूर्त सबसे अहम
नवरात्रि के पहले दिन होने वाली घट स्थापना यानी कलश स्थापना को बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। पंचांग के अनुसार 11 अक्टूबर 2026 को कलश स्थापना के लिए सुबह 6:19 बजे से 10:12 बजे तक का समय बताया गया है।
वहीं अभिजीत मुहूर्त सुबह 11:44 बजे से दोपहर 12:31 बजे तक रहेगा।नवरात्रि के पहले दिन पूरे समय चित्रा नक्षत्र और वैधृति योग की स्थिति का भी उल्लेख किया गया है। धार्मिक मान्यताओं में ऐसे योगों में कलश स्थापना को लेकर विशेष सावधानी बताई जाती है। ऐसे में अभिजीत मुहूर्त में देवी स्थापना को महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
इस बार हाथी पर सवार होकर आएंगी मां दुर्गा?
नवरात्रि के आगमन से जुड़ी धार्मिक मान्यताओं में वाहन का भी विशेष उल्लेख मिलता है। इस वर्ष नवरात्रि का आरंभ रविवार से होने के कारण देवी के आगमन का वाहन हाथी माना जा रहा है।धार्मिक मान्यताओं में हाथी को वर्षा, समृद्धि और प्राकृतिक संपन्नता से जोड़कर देखा जाता है। हालांकि, देवी के आगमन और प्रस्थान के वाहन को लेकर अलग-अलग परंपराओं और पंचांगों में व्याख्याएं मिल सकती हैं।
दुर्गा पूजा और नवरात्रि में क्या अंतर?
शारदीय नवरात्रि और बंगाली परंपरा की दुर्गा पूजा एक ही पर्व अवधि से जुड़ी हैं, लेकिन दोनों की पूजा पद्धति और प्रमुख तिथियों में अंतर हो सकता है।बंगाल और पूर्वी भारत में दुर्गा पूजा के दौरान पंडाल, प्रतिमा स्थापना, धुनुची नृत्य, ढाक और सिंदूर खेला जैसे आयोजन प्रमुख आकर्षण होते हैं।
धार्मिक मान्यता में मां दुर्गा को उनके मायके आई बेटी के रूप में भी देखा जाता है।वहीं नवरात्रि में नौ दिनों तक मां दुर्गा के अलग-अलग स्वरूपों की आराधना, व्रत और कन्या पूजन की परंपरा प्रमुख रहती है।
दशहरा 20 अक्टूबर को
नवरात्रि के समापन के साथ 20 अक्टूबर 2026 को विजयादशमी और दशहरा मनाया जाएगा। इस दिन शस्त्र पूजा, आयुध पूजा और रावण दहन जैसे आयोजन होंगे।यानी इस बार नवरात्रि से लेकर दशहरा तक धार्मिक आयोजनों का सिलसिला अक्टूबर में लगातार देखने को मिलेगा।
Navratri 2026 की अहम तारीखें
• 10 अक्टूबर: प्रतिपदा तिथि प्रारंभ, रात 9:19 बजे
• 11 अक्टूबर: उदया तिथि के अनुसार शारदीय नवरात्रि का शुभारंभ
• 11 अक्टूबर: कलश स्थापना
• कलश स्थापना मुहूर्त: सुबह 6:19 से 10:12 बजे तक
• अभिजीत मुहूर्त: सुबह 11:44 से दोपहर 12:31 बजे तक
• 20 अक्टूबर: विजयादशमी और दशहरा
इस बार नवरात्रि की तारीखों का सबसे बड़ा सस्पेंस तिथियों के समय और उनके प्रभाव को लेकर है। इसलिए व्रत, अष्टमी पूजन, कन्या पूजन और कलश स्थापना के लिए अपने शहर के स्थानीय पंचांग में दिए गए मुहूर्त को प्राथमिकता देना बेहतर रहेगा।
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