Varanasi Startup: भाड़े पर चार कंधे’… अंतिम यात्रा के लिए शुरू हुआ अनोखा काम, अकेले परिवारों का बन रहा सहारा, वाराणसी में अंतिम यात्रा के लिए शुरू हुई अनोखी सेवा
Varanasi Startup: जब अपनों ने छोड़ा साथ, चार कंधे बने सहारा; अंतिम यात्रा के लिए अनोखी सेवा

Varanasi Startup: जिंदगी के आखिरी सफर में इंसान को चार कंधों की जरूरत होती है। यह कंधे कभी परिवार, रिश्तेदार, पड़ोसी और दोस्त सहज ही उपलब्ध करा देते थे। लेकिन शहरों की बदलती जिंदगी, छोटी होती फैमिली और बढ़ते अकेलेपन ने इस परंपरा को भी बदलना शुरू कर दिया है।वाराणसी की गलियों में इसी बदलाव से जुड़ी एक अनोखी सेवा सामने आई है।
यहां कुछ युवक उन परिवारों के लिए अंतिम यात्रा में कंधा देने का काम कर रहे हैं, जिनके पास उस वक्त साथ देने के लिए पर्याप्त लोग मौजूद नहीं होते। इसके बदले उन्हें तय मेहनताना मिलता है।पहली नजर में यह एक काम या छोटा कारोबार लग सकता है, लेकिन इसके पीछे की कहानी कहीं ज्यादा गहरी है।
पत्नी की अंतिम यात्रा में अकेले रह गए सिन्हा साहब
एक दिन रिटायर्ड अधिकारी सिन्हा साहब की पत्नी का निधन हो गया। करीब आठ घंटे बीत चुके थे। उन्होंने रिश्तेदारों और परिचितों को फोन किया, लेकिन किसी ने दूरी का हवाला दिया तो किसी ने अपनी मजबूरी बताई।
पत्नी के शव को लेकर जब वह वाराणसी के महाश्मशान की ओर निकले तो मैदागिन के पास बैरिकेडिंग के कारण वाहन रुक गया।अब उनके सामने एक और मुश्किल थी।घाट तक शव को ले जाने के लिए चार कंधे चाहिए थे। उस वक्त उनके साथ मौजूद लोगों की संख्या पर्याप्त नहीं थी।
तभी पहुंचे चार युवक
सिन्हा साहब की परेशानी देखकर चार युवक उनके पास पहुंचे। बातचीत हुई और उन्होंने अंतिम यात्रा में कंधा देने की जिम्मेदारी संभाल ली।कुछ देर पहले तक जो व्यक्ति पत्नी को अंतिम विदाई देने के लिए अपनों का इंतजार कर रहा था, अब उसके सामने चार कंधे मौजूद थे। पत्नी को कंधा देकर चारों युवक अंतिम यात्रा में शामिल हो गए और शव घाट की ओर बढ़ा।
इसी दौरान रास्ते से एक वीआईपी काफिला हूटर बजाते हुए गुजरा।एक तरफ किसी व्यक्ति के जीवन का सबसे भावुक और अकेला क्षण था, तो दूसरी तरफ उसी सड़क पर गुजरती व्यवस्था की अपनी रफ्तार। यह दृश्य बदलते शहर और बदलते सामाजिक रिश्तों की एक अलग तस्वीर पेश करता है।
पैसे के लिए शुरू किया था काम, फिर बदल गई सोच
इन युवकों के लिए शुरुआत में यह काम कमाई का जरिया था। लेकिन धीरे-धीरे इस काम से जुड़ा अनुभव उनकी सोच बदलने लगा।सुभाष सोनी बताते हैं कि उन्होंने शुरुआत पैसे कमाने के लिए की थी, लेकिन हर बार किसी परिवार के साथ खड़े होने पर महसूस हुआ कि उस वक्त उन्हें सिर्फ चार कंधों की नहीं, किसी अपने के साथ की जरूरत होती है।दीनदयाल गोंड के लिए भी यह शुरुआत में एक अस्थायी काम था। लेकिन धीरे-धीरे दूसरे परिवारों के अंतिम सफर में साथ देना उन्हें अपनी जिम्मेदारी जैसा लगने लगा।
मोबाइल के दौर में कम हो गया ‘अपना’ कौन?
रमेश बताते हैं कि शुरुआत में उनके परिवार को समझ नहीं आता था कि वह इस तरह का काम क्यों कर रहे हैं। बाद में परिवार ने भी उनकी भूमिका को समझा।
मनीष पाल के मुताबिक आज लोग अपने काम और मोबाइल की दुनिया में ज्यादा व्यस्त हैं। शहरों में पड़ोसियों और रिश्तेदारों के बीच पहले जैसा संपर्क भी हर जगह नहीं रहा। ऐसे में किसी परिवार के अंतिम संस्कार के वक्त अचानक पर्याप्त लोगों का जुट पाना मुश्किल हो जाता है।यहीं से चार कंधों की इस सेवा की जरूरत पैदा होती है।
क्या यह सिर्फ कारोबार है या बदलते समाज की तस्वीर?
इस मॉडल को “स्टार्टअप” कहना अपने आप में दिलचस्प है। क्योंकि यहां ग्राहक किसी उत्पाद की तलाश में नहीं आता। वह ऐसी मदद लेने आता है, जिसकी जरूरत उसे शायद जीवन में केवल एक बार पड़े।एक तरफ इसमें तय मेहनताना है, दूसरी तरफ भावनाएं हैं और तीसरी तरफ सामाजिक जरूरत।यानी यह सेवा उस जगह खड़ी है जहां कमाई और संवेदना एक-दूसरे से अलग नहीं दिखतीं।
पहले रिश्ते जुटते थे, अब सेवा उपलब्ध है
कुछ दशक पहले किसी मोहल्ले में अंतिम यात्रा निकलती थी तो आसपास के लोग अपने आप जुड़ जाते थे। रिश्तेदारों को खबर होती थी और पड़ोसी भी बिना बुलाए पहुंच जाते थे।लेकिन आज शहरों में हालात अलग हैं।लोग दूसरे शहरों में रहते हैं। परिवार छोटे हो गए हैं।
पड़ोस का रिश्ता पहले जैसा मजबूत नहीं रहा। और कई बुजुर्ग ऐसे भी हैं जिनके बच्चे नौकरी या दूसरी वजहों से उनसे दूर रहते हैं।ऐसे में वाराणसी की यह सेवा सिर्फ चार लोगों के कंधे उपलब्ध कराने की कहानी नहीं है।यह उस समाज की कहानी भी है, जहां जीवन की आखिरी यात्रा में साथ देने के लिए अब रिश्तों के साथ-साथ एक सेवा की जरूरत महसूस होने लगी है।
चार कंधे… लेकिन सवाल बहुत बड़ा
अंतिम यात्रा के लिए चार कंधे मिल जाना शायद किसी परिवार की तत्काल परेशानी दूर कर दे। लेकिन इसके पीछे छिपा सवाल ज्यादा बड़ा है—
क्या शहरों की भागती जिंदगी में इंसान इतना अकेला हो गया है कि अब अंतिम सफर में साथ देने के लिए भी सेवा लेनी पड़ रही है?
वाराणसी में शुरू हुई यह व्यवस्था इसी सवाल को हमारे सामने छोड़ जाती है।











