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21 साल सेवा के बाद भी खाली हाथ लौट रहे बीआरपी-सीआरपी, सेवानिवृत्ति पर छलका दर्द आपको भी झकझोर देगा; ग्रेच्युटी और पेंशन की उठी मांग

21 साल सेवा के बाद भी खाली हाथ लौट रहे बीआरपी-सीआरपी, ग्रेच्युटी और पेंशन की मांग तेज

रांची: “खाली हाथ आए थे, खाली हाथ जाएंगे”—यह कहावत आज झारखंड के सर्व शिक्षा अभियान (वर्तमान समग्र शिक्षा) में वर्षों से कार्यरत बीआरपी (ब्लॉक रिसोर्स पर्सन) और सीआरपी (क्लस्टर रिसोर्स पर्सन) के लिए एक कड़वी सच्चाई बनती जा रही है। करीब 21 वर्षों तक लगातार सेवा देने के बावजूद सेवानिवृत्त हो रहे बीआरपी-सीआरपी बिना किसी सामाजिक सुरक्षा, ग्रेच्युटी या पेंशन के घर लौटने को मजबूर हैं।

बीआरपी-सीआरपी एसएस संघ, झारखंड का कहना है कि इन कर्मियों ने केवल समग्र शिक्षा की योजनाओं के क्रियान्वयन में ही नहीं, बल्कि जनगणना, चुनाव और अन्य सरकारी कार्यों के सफल संचालन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इसके बावजूद विभाग इन्हें स्थायी कर्मचारियों के समान सुविधाएं देने से लगातार परहेज करता रहा है।

संघ ने लगाया भेदभाव का आरोप

संघ का आरोप है कि परियोजना में कार्यरत बीपीओ, लेखापाल और अन्य प्रबंधन कर्मियों को परियोजना भत्ता, चिकित्सा भत्ता, महंगाई भत्ता तथा सेवानिवृत्ति पर ग्रेच्युटी जैसी सुविधाएं मिलती हैं, लेकिन बीआरपी-सीआरपी इन सभी लाभों से वंचित हैं। यही नहीं, वर्षों तक सेवा देने के बाद भी उन्हें सेवानिवृत्ति पर कोई आर्थिक सुरक्षा नहीं मिलती, जिससे उनका भविष्य चिंता और असमंजस में घिर जाता है।

संघ ने की ये मांग

संघ ने सरकार से मांग की है कि 21 वर्षों की लंबी सेवा अवधि को देखते हुए बीआरपी-सीआरपी को भी अन्य परियोजना कर्मियों की तरह ग्रेच्युटी, पेंशन और सामाजिक सुरक्षा का लाभ दिया जाए। साथ ही पारा शिक्षकों की तर्ज पर विभाग के रिक्त पदों में 50 प्रतिशत आरक्षण देकर समायोजन की व्यवस्था की जाए।

संघ से सरकार पर उठाया सवाल

संघ ने यह भी सवाल उठाया है कि बीआरपी-सीआरपी, पारा शिक्षक और केजीबीवी शिक्षिकाओं के लिए बनाए गए कल्याण कोष में सरकार द्वारा करोड़ों रुपये उपलब्ध कराने के बावजूद वर्षों से उसका प्रभावी उपयोग नहीं हो सका। संघ का सुझाव है कि इस कोष से कर्मचारियों के बच्चों की उच्च शिक्षा, विवाह तथा अन्य आवश्यक जरूरतों के लिए कम ब्याज पर ऋण उपलब्ध कराया जाए और सेवानिवृत्त कर्मियों को 5 से 10 लाख रुपये तक की सहायता राशि सेवा अवधि के आधार पर दी जाए।

संघ का कहना है कि जब अन्य परियोजना कर्मियों को सेवानिवृत्ति पर आर्थिक सुरक्षा मिल सकती है, तो 21 वर्षों से शिक्षा व्यवस्था की रीढ़ बने बीआरपी-सीआरपी को इससे वंचित रखना दोहरी नीति का उदाहरण है।
अब सवाल यह है कि राज्य की शिक्षा व्यवस्था को दो दशक से अधिक समय तक मजबूती देने वाले इन कर्मियों को आखिर सम्मानजनक विदाई और सामाजिक सुरक्षा कब मिलेगी? यही प्रश्न आज हजारों बीआरपी-सीआरपी और उनके परिवारों के सामने खड़ा है।

अमिताभ सिन्हा

अमिताभ सिन्हा hpbltop.com के वरिष्ठ राजनीतिक संपादक हैं। पत्रकारिता में 12 वर्षों से अधिक के अनुभव के साथ, उन्हें भारतीय राजनीति, चुनावी रणनीतियों और संसद की कार्यवाही की गहरी समझ है। अमिताभ की रिपोर्टिंग तथ्यों पर आधारित और निष्पक्ष होती है। वे जटिल सरकारी नीतियों को सरल भाषा में पाठकों तक पहुँचाने में माहिर हैं। खाली समय में वे राजनीतिक इतिहास पढ़ना पसंद करते हैं। ईमेल: amitabh@hpbltop.com

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