झारखंड: …जब कोर्ट में बेटी दौड़कर मां से लिपटी… फिर आया ऐसा फैसला जिसने सबकी आंखें नम कर दीं, कोर्ट में छलके जज़्बात
झारखंड हाईकोर्ट ने भावुक फैसले में 4 साल की बच्ची की कस्टडी उसकी जैविक मां को सौंप दी। कोर्ट ने कहा कि बच्चा कोई गेंद नहीं है और उसके सर्वोत्तम हित को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

Jharkhand High Court Child Custody। चार साल की एक मासूम बच्ची… मां से बिछड़ने का दर्द… और हर दो महीने में सिर्फ दो घंटे की मुलाकात। यह कहानी किसी फिल्म की पटकथा नहीं, बल्कि झारखंड हाईकोर्ट में सुनाए गए एक ऐसे फैसले की है, जिसने एक मां की चार साल लंबी तड़प को आखिरकार खत्म कर दिया।
जैसे ही हाईकोर्ट ने बच्ची की कस्टडी उसकी जैविक मां मेघा सिंह को सौंपने का आदेश सुनाया, कोर्ट रूम में मौजूद हर शख्स की नजर मां-बेटी पर टिक गई। फैसला सुनते ही मेघा की आंखों से आंसू बह निकले। उन्होंने अपनी बेटी को सीने से लगाया, उसका माथा चूमा और बरसों की जुदाई जैसे एक पल में खत्म हो गई।
कोर्ट में हुआ सबसे भावुक पल
सुनवाई के दौरान बच्ची को अदालत में पेश किया गया। वह अपने पिता की गोद में कोर्ट पहुंची थी, लेकिन जैसे ही उसने अपनी मां को देखा, वह बिना किसी हिचकिचाहट के पिता की गोद से उतरकर सीधे मां के पास चली गई और पूरी सुनवाई के दौरान उनसे लिपटी रही।इस दृश्य का जिक्र करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि यह मां और बेटी के बीच गहरे भावनात्मक रिश्ते का स्पष्ट प्रमाण है।
‘बच्चा कोई गेंद नहीं है’
जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और संजय प्रसाद की खंडपीठ ने फैमिली कोर्ट के उस आदेश को भी रद्द कर दिया, जिसमें मां को केवल हर दो महीने में 2-3 घंटे तक बेटी से मिलने की अनुमति दी गई थी।हाईकोर्ट ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा—
“बच्चा कोई बेजान वस्तु या गेंद नहीं है, जिसे माता-पिता अपनी सुविधा के अनुसार एक-दूसरे के पास भेजते रहें।”
अदालत ने स्पष्ट कहा कि कस्टडी के मामलों में माता-पिता के अधिकार नहीं, बल्कि बच्चे का सर्वोत्तम हित सबसे महत्वपूर्ण होता है।
500 किलोमीटर का दर्दभरा सफर
फैमिली कोर्ट के आदेश के कारण मेघा सिंह को अपनी बेटी से मिलने के लिए बिहार के सारण से रांची तक लगभग 500 किलोमीटर का सफर तय करना पड़ता था। वह भी सिर्फ दो-तीन घंटे की मुलाकात के लिए।हाईकोर्ट ने इसे अव्यावहारिक, असंवेदनशील और विवेकहीन व्यवस्था बताते हुए कहा कि इतनी छोटी बच्ची को मां के स्नेह और देखभाल से दूर रखना उसके हित में नहीं है।
क्या था पूरा मामला?
मेघा सिंह का विवाह वर्ष 2017 में अंकित कुमार सिंह से हुआ था। दोनों की एक बेटी है। वैवाहिक विवाद के बाद मेघा अपने मायके सारण (बिहार) में रहने लगीं। उनका आरोप था कि पति ने धोखे से बच्ची को अपने पास रख लिया और उन्हें बेटी से मिलने से भी वंचित कर दिया।
इसके बाद उन्होंने रांची फैमिली कोर्ट में कस्टडी की याचिका दायर की। हालांकि वहां से उन्हें सिर्फ सीमित मुलाकात और सप्ताह में एक बार वीडियो कॉल की अनुमति मिली थी। इस आदेश को उन्होंने झारखंड हाईकोर्ट में चुनौती दी।
हाईकोर्ट ने दिया मानवीय संदेश
अपने फैसले में अदालत ने कहा कि इतनी कम उम्र की बच्ची को सबसे अधिक जरूरत अपनी मां के प्यार, ममता और संस्कार की होती है। अदालत ने यह भी माना कि फैमिली कोर्ट के आदेश में बच्चे के सर्वोत्तम हित का पर्याप्त ध्यान नहीं रखा गया था।इस फैसले के साथ एक मां की लंबी कानूनी लड़ाई खत्म हुई और एक चार साल की बच्ची को उसकी मां की गोद वापस मिल गई।









