पति को बार-बार जेल नहीं भेज सकते : गुजारा भत्ता नहीं देने पर पत्नी-बेटी ने दायर की थी याचिका, कोर्ट ने कहा, पति को बार-बार जेल में नहीं रख सकते
झारखंड हाईकोर्ट ने गुजारा भत्ता के एक ही बकाये पर बार-बार जेल भेजने को अनुचित माना। दुमका के दशरथ सिंह को तत्काल रिहा करने का आदेश दिया।

रांची। पति-पत्नी के रिश्ते को लेकर हाईकोर्ट ने बड़ा अहम फैसला सुनाया है। झारखंड हाईकोर्ट ने पत्नी और नाबालिग बेटी को गुजारा भत्ता नहीं देने के मामले में स्पष्ट किया कि बकाया गुजारा भत्ता की वसूली के लिए पति को एक ही चूक के आधार पर बार-बार जेल में नहीं रखा जा सकता। दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125(3) के तहत प्रत्येक अलग चूक पर अधिकतम एक महीने की कैद दी जा सकती है।
इसी आधार पर हाईकोर्ट ने दुमका के प्रधान परिवार न्यायालय के आदेश को रद्द करते हुए दशरथ सिंह को तत्काल रिहा करने का निर्देश दिया।न्यायमूर्ति संजय कुमार द्विवेदी की अदालत ने 15 अक्टूबर 2026 को यह फैसला सुनाया। मामले में पति को लगातार 30-30 दिनों की हिरासत में रखने के 23 आदेश जारी किए गए थे। हाईकोर्ट ने इस कार्रवाई की वैधानिकता पर सवाल उठाते हुए आपराधिक पुनरीक्षण याचिका स्वीकार कर ली।
पत्नी और बेटी के लिए मांगा था गुजारा भत्ता
मामले के अनुसार, दुमका जिले के निवासी दशरथ सिंह की शादी 30 मई 2017 को शंपू कुमारी से हुई थी। दंपती की एक बेटी शक्ति कुमारी है। पत्नी ने पति पर शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना का आरोप लगाते हुए अपने और बेटी के भरण-पोषण के लिए गुजारा भत्ता की मांग की थी।
पत्नी ने अपने लिए 8,000 रुपये और बेटी के लिए 3,000 रुपये प्रतिमाह देने की मांग की थी। इसके बाद दुमका के प्रधान परिवार न्यायालय ने 31 मार्च 2023 को आदेश दिया कि दशरथ सिंह पत्नी को हर महीने 5,000 रुपये और बेटी को 3,000 रुपये गुजारा भत्ता दें। यह भुगतान 31 अगस्त 2021 से किया जाना था।आरोप है कि पति ने निर्धारित राशि का भुगतान नहीं किया। इसके बाद पत्नी ने 15 मई 2023 को बकाया गुजारा भत्ता की वसूली के लिए परिवार न्यायालय में आवेदन दिया।
23 बार बढ़ाई गई 30-30 दिनों की हिरासत
हाईकोर्ट में याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि उसे गिरफ्तार कर अदालत में पेश किया गया था। इसके बाद परिवार न्यायालय ने लगातार 30-30 दिनों की हिरासत के आदेश जारी किए।पति की ओर से बताया गया कि कुल 23 आदेशों के जरिए उसकी हिरासत बढ़ाई गई और इस दौरान उसे एक दिन के लिए भी रिहा नहीं किया गया। यह भी दलील दी गई कि कुछ मामलों में जिस बकाया राशि के लिए पहले जेल भेजा गया था, उसी बकाये के लिए दोबारा हिरासत में रखा गया।
एक ही बकाये पर बार-बार जेल भेजना उचित नहीं
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने CrPC की धारा 125(3) के प्रावधानों पर विचार किया। अदालत ने स्पष्ट किया कि गुजारा भत्ता नहीं देने पर प्रत्येक अलग चूक के लिए कानून के अनुसार कार्रवाई की जा सकती है, लेकिन एक ही चूक या बकाये के आधार पर बार-बार कैद की सजा देना उचित नहीं है।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि जेल की सजा भुगतने से गुजारा भत्ता चुकाने की जिम्मेदारी समाप्त नहीं होती। बकाया राशि की वसूली के लिए कानून के मुताबिक कार्रवाई जारी रखी जा सकती है।
परिवार न्यायालय का आदेश रद्द, तत्काल रिहाई के निर्देश
न्यायमूर्ति संजय कुमार द्विवेदी ने पाया कि परिवार न्यायालय ने लगातार 23 आदेशों के माध्यम से 30-30 दिनों की हिरासत बढ़ाई थी। हाईकोर्ट ने 16 अप्रैल 2026 के आदेश को रद्द करते हुए दशरथ सिंह को तत्काल रिहा करने का निर्देश दिया।
सुनवाई के दौरान पति की ओर से यह भी कहा गया कि जेल से बाहर आने के बाद वह गुजारा भत्ता की कुछ राशि चुकाने का प्रयास करेगा। हाईकोर्ट ने आपराधिक पुनरीक्षण याचिका स्वीकार करते हुए मामले का निपटारा कर दिया।
अदालत के इस फैसले से यह स्पष्ट हुआ है कि गुजारा भत्ता की वसूली के लिए कानूनी प्रक्रिया का पालन जरूरी है। हालांकि, पति की रिहाई से पत्नी और बेटी के भरण-पोषण के लिए निर्धारित बकाया राशि चुकाने की जिम्मेदारी समाप्त नहीं होती।












