Navratri Special: गरबा गोल घेरे में ही क्यों किया जाता है? मां दुर्गा की आराधना से जुड़ा है खास रहस्य, गरबा-डांडिया की वजह जानकर आप रह जायेंगे हैरान
नवरात्रि में गरबा और डांडिया खेलने की परंपरा क्यों है? जानें गरबा का अर्थ, देवी दुर्गा से इसका संबंध, धार्मिक मान्यता, इतिहास और पारंपरिक पहनावे की खासियत।

नई दिल्ली। नवरात्रि में मां दुर्गा की अराधना के साथ-साथ गरबा-डांडिया का भी खूब रोमांच रहता है। रंग-बिरंगे परिधान और गरबा-डांडिया में झूमते युवाओं का अलग ही आकर्षण होता है। गुजरात से शुरू हुई गरबा आज देशभर में लोकप्रिय है। नवरात्रि के दौरान लोग एक जगह इकट्ठा होकर संगीत की धुन पर गोल घेरे में गरबा करते हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि गरबा हमेशा गोल घेरे में ही क्यों किया जाता है? इसके पीछे केवल नृत्य की शैली नहीं, बल्कि जीवन, प्रकृति और देवी शक्ति से जुड़ी धार्मिक मान्यताएं भी हैं।
जानते हैं गरबा के गोल घेरे के बीच क्यों रखा जाता है दीपक?
गरबा की पारंपरिक शैली में घेरे के केंद्र में मिट्टी का एक विशेष घड़ा रखा जाता है, जिसे ‘गरबो’ कहा जाता है। इस घड़े में छोटे-छोटे छेद होते हैं और उसके भीतर दीपक जलाया जाता है। दीपक की रोशनी इन छेदों से बाहर निकलती है, जो देखने में बेहद आकर्षक लगती है।
धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस दीपक को जीवन और आत्मा का प्रतीक माना जाता है। इसके चारों ओर घूमकर गरबा करना आदि शक्ति मां दुर्गा की आराधना से जुड़ा है। घड़े के भीतर जलती लौ को उस दिव्य ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है, जिससे जीवन और सृष्टि का संचालन होता है।इसी कारण पारंपरिक गरबा में दीपक या देवी के प्रतीक को केंद्र में रखकर उसके चारों ओर नृत्य करने की परंपरा देखने को मिलती है।
गोल घेरा जीवन के चक्र और प्रकृति का प्रतीक
गरबा में गोलाकार नृत्य का अपना सांस्कृतिक और आध्यात्मिक महत्व है। गोल घेरे की कोई निश्चित शुरुआत या अंत दिखाई नहीं देता। इसी विशेषता को जीवन की निरंतरता और सृष्टि के चक्र से जोड़कर देखा जाता है।
धार्मिक और सांस्कृतिक व्याख्याओं में गरबा का गोल घेरा इस विचार को दर्शाता है कि जीवन निरंतर गतिशील है और शक्ति को सृष्टि के आधार के रूप में देखा जाता है। नृत्य करने वाले लोग केंद्र में रखे दीपक या देवी के प्रतीक के चारों ओर घूमते हैं, जबकि केंद्र स्थिर रहता है।
यह दृश्य प्रतीकात्मक रूप से बताता है कि जीवन में बदलाव होते रहते हैं, लेकिन आस्था और दिव्य शक्ति को स्थिर आधार के रूप में देखा जाता है। हालांकि, गोलाकार नृत्य के अर्थ की व्याख्या अलग-अलग परंपराओं में भिन्न हो सकती है।
गरबा शब्द का अर्थ भी है खास
गरबा शब्द को संस्कृत के ‘गर्भदीप’ से जोड़कर देखा जाता है। पारंपरिक गरबा में इस्तेमाल होने वाला मिट्टी का घड़ा गर्भ या जीवन के स्रोत का प्रतीक माना जाता है, जबकि उसके भीतर जलता दीपक जीवन की ऊर्जा और आत्मा का प्रतीक है।
नवरात्रि में मां दुर्गा को आदि शक्ति के रूप में पूजा जाता है। ऐसे में दीपक के चारों ओर नृत्य करना देवी के प्रति श्रद्धा और शक्ति की उपासना का माध्यम माना जाता है।यही वजह है कि गरबा को केवल मनोरंजन या लोकनृत्य के रूप में नहीं, बल्कि धार्मिक आस्था से जुड़ी सांस्कृतिक परंपरा के रूप में भी देखा जाता है।
गोल घेरे में कदम और ताल मिलाने का भी है महत्व
गरबा की एक और खासियत यह है कि इसमें लोग एक-दूसरे के साथ कदम मिलाकर नृत्य करते हैं। हाथों की तालियां, पैरों की थाप और संगीत की लय इस नृत्य को विशेष बनाती हैं।गोल घेरे में सभी प्रतिभागियों का एक साथ घूमना सामूहिकता और आपसी तालमेल को दर्शाता है। इसमें कोई एक व्यक्ति पूरे नृत्य का केंद्र नहीं होता, बल्कि सभी लोग मिलकर एक लय बनाते हैं।
यही सामूहिक भागीदारी गरबा को सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से भी खास बनाती है।शुरुआत में गरबा की गति धीमी रहती है, लेकिन संगीत तेज होने के साथ कदमों की रफ्तार भी बढ़ती जाती है। इसी लय के कारण गरबा का गोलाकार स्वरूप देखने में आकर्षक लगता है।
डांडिया में भी दिखती है गोल घेरे की परंपरा
गरबा के साथ नवरात्रि में डांडिया रास भी बड़े उत्साह से खेला जाता है। इसमें लोग रंग-बिरंगी लकड़ियों को आपस में टकराते हुए संगीत की धुन पर नृत्य करते हैं। डांडिया में भी प्रतिभागी अक्सर गोल घेरे या समूहों में नृत्य करते हैं।
लोकप्रिय धार्मिक मान्यताओं में डांडिया को मां दुर्गा की शक्ति और बुराई पर अच्छाई की विजय से प्रतीकात्मक रूप से जोड़ा जाता है। हालांकि, गरबा और डांडिया की नृत्य शैलियां अलग हैं और दोनों की अपनी सांस्कृतिक परंपराएं हैं।
नवरात्रि में गरबा का गोल घेरा क्यों बन जाता है आकर्षण?
नवरात्रि के दौरान गरबा का गोल घेरा भक्ति, संगीत और सामूहिक उत्सव का अनोखा दृश्य प्रस्तुत करता है। इसके केंद्र में दीपक या देवी का प्रतीक और उसके चारों ओर घूमते भक्त इस परंपरा को आध्यात्मिक अर्थ देते हैं।
गरबा के गोल घेरे को जीवन की निरंतरता, प्रकृति की गति और मां दुर्गा की शक्ति की आराधना से जोड़कर देखा जाता है। यही इसकी सबसे खास पहचान है। सदियों से चली आ रही यह सांस्कृतिक परंपरा आज भी नवरात्रि के उत्सव में श्रद्धा, एकता और उल्लास का संदेश देती है।












