झारखंड: हे भगवान! ऐसा तो मत करो, मौत से जूझ रहा था मरीज, परिजनों ने एयर एंबुलेंस के लिए इंटरनेट से निकाला नंबर, 8 लाख रुपये भी ठगे, एंबुलेंस भी नहीं आया, मौत
Jharkhand: Oh God! Please don't do this. The patient was battling for life. The family searched the internet for an air ambulance, but was duped of 8 lakh rupees. The ambulance did not arrive, resulting in his death.

साइबर ठगी का एक बेहद दर्दनाक मामला सामने आया है, जहां एयर एंबुलेंस के नाम पर 8 लाख रुपये ठग लिए गए। समय पर इलाज के लिए मरीज को हैदराबाद नहीं ले जाया जा सका, जिससे उसकी मौत हो गई।
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मौत से जंग हार गया मोहन… एयर एंबुलेंस के नाम पर ठगी ने छीन ली जिंदगी
Jharkhand Crime News/30.4.26 : जो घटना हुई, वो अमानवीयता की पराकाष्ठा है। साइबर ठगी, डिजिटल अरेस्ट, ठगी और ब्लैकमेलिंग तक तो चल ही रहा था, लेकिन जमशेदपुर की घटना दिल दहलाने वाली है, जहां साइबर ठगों की वजह से एक मरीज की मौत हो गयी। यह घटना सिर्फ एक साइबर ठगी नहीं, बल्कि एक परिवार की उम्मीदों, भरोसे और जिंदगी के टूटने की कहानी है। यहां एयर एंबुलेंस उपलब्ध कराने के नाम पर ठगों ने 8 लाख रुपये ऐंठ लिए और समय पर इलाज न मिल पाने के कारण एक गंभीर मरीज की जान चली गई।
दरअसल मानगो निवासी आर.एन. चौहान के रिश्तेदार मोहन सिंह की तबीयत अचानक बिगड़ गई थी। हालत इतनी गंभीर हो गई कि उन्हें तुरंत टाटा मुख्य अस्पताल में भर्ती कराया गया। डॉक्टरों ने पूरी कोशिश की, लेकिन स्थिति काबू से बाहर होती जा रही थी। विशेषज्ञ इलाज के लिए उन्हें तत्काल हैदराबाद रेफर करने की सलाह दी गई।
अब परिवार के सामने एक ही लक्ष्य था—किसी भी तरह मोहन को जल्द से जल्द हैदराबाद पहुंचाया जाए। समय कम था, उम्मीदें बड़ी थीं और हर सेकंड कीमती। इसी जल्दबाजी और बेबसी में परिजनों ने इंटरनेट का सहारा लिया।सर्च के दौरान उन्हें एयर एंबुलेंस सेवा का एक नंबर मिला। फोन मिलाया गया—उधर से एक भरोसेमंद आवाज आई। खुद को एक नामी कंपनी का प्रतिनिधि बताते हुए उसने हर जरूरी व्यवस्था का भरोसा दिया।
कुछ ही मिनटों में 8 लाख रुपये का सौदा तय हुआ। मोहन की जान बचाने की उम्मीद में परिजनों ने बिना देर किए पूरी रकम ऑनलाइन ट्रांसफर कर दी।लेकिन इसके बाद जो हुआ, उसने सबकुछ बदल दिया। पैसे मिलते ही बहानों का सिलसिला शुरू हो गया। कभी “तकनीकी खराबी” का हवाला, कभी “एयर ट्रैफिक क्लियरेंस” का बहाना। हर कॉल पर सिर्फ आश्वासन मिलता, लेकिन एंबुलेंस नहीं। परिवार लगातार फोन करता रहा—हर बार उम्मीद करता कि अब शायद मदद पहुंच जाए।
उधर अस्पताल के बेड पर मोहन जिंदगी और मौत के बीच जूझ रहे थे। हर गुजरता पल उनकी सांसों को और कमजोर कर रहा था। परिवार की बेचैनी बढ़ती जा रही थी, लेकिन ठगों के झूठे वादे खत्म नहीं हो रहे थे।जब तक परिजनों को एहसास हुआ कि उनके साथ ठगी हो चुकी है और उन्होंने दूसरी व्यवस्था करने की कोशिश की, तब तक बहुत देर हो चुकी थी।
इलाज में हुई देरी ने मोहन सिंह की जिंदगी छीन ली।यह घटना सिर्फ एक व्यक्ति की मौत नहीं, बल्कि उस भरोसे की हत्या है, जो लोग मुश्किल वक्त में तकनीक और सेवाओं पर करते हैं। यह कहानी बताती है कि कैसे साइबर अपराधी इंसानी मजबूरी और भावनाओं का फायदा उठाकर अपराध को अंजाम दे रहे हैं।
अब परिवार गहरे सदमे में है—एक तरफ अपने प्रियजन को खोने का दर्द, दूसरी तरफ ठगी का घाव। यह घटना सभी के लिए एक कड़ा सबक है कि आपात स्थिति में भी किसी भी ऑनलाइन सेवा पर आंख बंद कर भरोसा करना कितना खतरनाक हो सकता है।









