शादी में वरमाला क्यों पहनाई जाती है? जानिए विवाह की इस खास रस्म का धार्मिक, पौराणिक और सांस्कृतिक महत्व
हिंदू विवाह में जयमाला या वरमाला की रस्म क्यों निभाई जाती है? जानिए इसका धार्मिक महत्व, पौराणिक कथा, स्वयंवर परंपरा और जयमाला-वरमाला के बीच का अंतर।

धर्म डेस्क : हिंदू धर्म में विवाह केवल सामाजिक बंधन नहीं, बल्कि 16 संस्कारों में से एक महत्वपूर्ण संस्कार माना गया है। मान्यता ये भी है कि शादी सिर्फ एक जन्म का बंधन नहीं, बल्कि सात जन्मों का बंधन होता है। हिंदू में शादी के वक्त रीति-रिवाज, मान्यता और कर्मों का अलग-अलग महत्व है।
विवाह के दौरान निभाई जाने वाली हर रस्म का अपना धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व होता है। इन्हीं में से एक है जयमाला या वरमाला की रस्म, जिसमें दूल्हा-दुल्हन एक-दूसरे को फूलों की माला पहनाकर जीवनसाथी के रूप में स्वीकार करते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि जयमाला की परंपरा कब शुरू हुई और इसका वास्तविक अर्थ क्या है? आइए जानते हैं।
हिंदू धर्म में क्या है जयमाला का महत्व?
जयमाला को विवाह की सबसे शुभ रस्मों में से एक माना जाता है। यह केवल फूलों की माला पहनाने की परंपरा नहीं, बल्कि वर और वधू द्वारा एक-दूसरे को पूरे मन से स्वीकार करने का प्रतीक है। इस रस्म के साथ दोनों एक नए जीवन की शुरुआत करने का संकल्प लेते हैं।
पौराणिक कथाओं से जुड़ी है परंपरा
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, समुद्र मंथन के समय जब माता लक्ष्मी प्रकट हुईं, तब उन्होंने भगवान विष्णु के गले में माला डालकर उन्हें अपने पति के रूप में स्वीकार किया था। इसी घटना को जयमाला की परंपरा का आधार माना जाता है।इसके अलावा भगवान शिव और माता पार्वती तथा भगवान श्रीराम और माता सीता के विवाह प्रसंगों में भी वरमाला का उल्लेख मिलता है।
स्वयंवर परंपरा से जुड़ा है इतिहास
प्राचीन काल में राजकुमारियों के स्वयंवर में वे अपने हाथों से पसंदीदा राजकुमार के गले में माला डालकर उन्हें पति के रूप में चुनती थीं। इसी कारण इस माला को ‘वरमाला’ कहा गया, क्योंकि इसे वधू अपने योग्य वर को पहनाती थी।बाद के समय में विवाह समारोहों में दूल्हा भी दुल्हन को माला पहनाने लगा और यह परंपरा आज दोनों ओर से निभाई जाती है। इस संदर्भ में एक और मान्यता है।
बताया जाता है कि पहले के वक्त में वरमाला पहनाने जैसी परंपरा नहीं थी। वरमाला को पहनाया जाना पुराणों में वर्णित एक प्रथा है । प्राचीन काल में राजाओं द्वारा स्वमवर विवाह कफी प्रचलित था ।जिसमें कन्या अपनी पसंद के अनुसार इच्छित वर को माला पहनाकर उसका पति रूप में वरण करती थी । और तभी से यह प्रथा चली आ रही है । परन्तु पहले यह सिर्फ राजा महाराजाओ में प्रचलित थी । अब आम और खास सभी में इसे एक जरूर शादी का हिस्सा बनाया जाता है। ।
जयमाला और वरमाला में क्या है अंतर?
अक्सर लोग जयमाला और वरमाला को एक ही मानते हैं, लेकिन दोनों शब्दों के अर्थ में थोड़ा अंतर है।
• वरमाला का अर्थ है वह माला जिसे वधू अपने वर को पहनाती है।
• जयमाला का शाब्दिक अर्थ है विजेता को पहनाई जाने वाली माला (विजयहार)।
आज के समय में विवाह समारोहों में दोनों शब्द एक-दूसरे के पर्याय के रूप में प्रचलित हैं, लेकिन संस्कृत की दृष्टि से इनके अर्थ अलग माने जाते हैं।
क्यों पहनाई जाती है फूलों की माला?
धार्मिक मान्यता है कि फूल प्रेम, पवित्रता, सौभाग्य और सकारात्मक ऊर्जा के प्रतीक होते हैं। इसलिए वर-वधू एक-दूसरे को फूलों की माला पहनाकर सुखी दांपत्य जीवन, प्रेम और विश्वास का संकल्प लेते हैं। यह रस्म दोनों परिवारों के बीच नए रिश्ते की शुरुआत का भी प्रतीक मानी जाती है।
जयमाला क्यों पहनाई जाती है? जानिए वरमाला की परंपरा, धार्मिक महत्व और पौराणिक कथा








