राज्यकर्मी स्वास्थ्य बीमा योजना: कार्ड के बावजूद अस्पताल कर रहे इलाज से इनकार, 1 महीने में सामने आए चार मामले;
झारखंड की राज्यकर्मी स्वास्थ्य बीमा योजना के तहत इलाज से इनकार के 22 दिनों में चार मामले सामने आए हैं। पुलिस एसोसिएशन मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और स्वास्थ्य मंत्री से शिकायत कर कार्रवाई की मांग करेगा।

रांची: झारखंड सरकार ने अपने कर्मचारियों के स्वास्थ्य का ख्याल करते हुए स्वास्थ्य बीमा योजना की पहल की थी। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन व स्वास्थ्य मंत्री इरफान अंसारी की महत्वाकांक्षी राज्यकर्मी स्वास्थ्य बीमा योजना को लेकर विभाग की तरफ से कई दावे किये गये थे। बीमा कंपनी के चयन से लेकर अस्पतालों को सूचीबद्ध करने में कई तरह की प्रक्रिया का पालन किया गया था।
कर्मचारियों ने भी बड़े उत्साह के साथ इस बीमा योजना में अपनी हिस्सेदारी की, लेकिन आज जब बीमा योजना प्रदेश में लागू है, तो उसमें कई तरह की गंभीर खामियां सामने आ रही है। आरोप ये सामने आ रहे हैं कि बीमा योजना का लाभ कई सरकारी कर्मचारियों तक नहीं पहुंच पा रहा है। आरोप है कि राज्य के कुछ निजी अस्पताल बीमा कार्ड होने के बावजूद मरीजों का इलाज करने से इनकार कर रहे हैं। इसके चलते कर्मचारियों को मजबूरी में अपनी जेब से लाखों रुपये खर्च कर इलाज कराना पड़ रहा है।
झारखंड पुलिस में पिछले 1 महीने के भीतर ऐसे चार मामले सामने आए हैं, जिनमें अस्पताल प्रबंधन ने साफ तौर पर राज्यकर्मी स्वास्थ्य बीमा योजना के तहत इलाज करने से मना कर दिया। इन घटनाओं के बाद झारखंड पुलिस एसोसिएशन ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और स्वास्थ्य मंत्री डॉ. इरफान अंसारी से मिलकर बीमा कंपनी टाटा एआईजी और संबंधित अस्पतालों के खिलाफ शिकायत करने तथा कार्रवाई की मांग करने का फैसला किया है।
क्या है राज्यकर्मी स्वास्थ्य बीमा योजना?
झारखंड सरकार ने सरकारी कर्मचारियों और उनके आश्रितों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधा देने के उद्देश्य से राज्यकर्मी स्वास्थ्य बीमा योजना शुरू की है। इस योजना के तहत इलाज के लिए 10 लाख रुपये तक का स्वास्थ्य बीमा कवर मिलता है। यदि इलाज का खर्च इससे अधिक होता है तो अतिरिक्त राशि का भुगतान कॉर्पस फंड से किया जाता है।
योजना के तहत भर्ती होने से पहले और अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद 15-15 दिनों तक की चिकित्सा संबंधी सुविधाओं का भी लाभ दिया जाता है। सरकारी कर्मचारियों के वेतन से हर महीने 500 रुपये का अंशदान लिया जाता है, जबकि योजना का लाभ लेने वाले गैर-सरकारी पात्र लाभार्थियों को निर्धारित वार्षिक शुल्क जमा करना होता है।
अस्पतालों के रवैये से बढ़ी परेशानी
सरकारी कर्मचारियों का कहना है कि योजना लागू होने के बावजूद कुछ अस्पताल बीमा कंपनी से मिलने वाली राशि कम होने का हवाला देकर मरीजों को भर्ती करने से इनकार कर रहे हैं। ऐसे में मरीजों के सामने या तो इलाज टालने या फिर पूरी राशि नकद देकर इलाज कराने की मजबूरी खड़ी हो रही है।
एक पीड़ित कर्मचारी ने इस मामले में बीमा कंपनी टाटा एआईजी को लिखित शिकायत भी भेजी है। पुलिस एसोसिएशन का कहना है कि यदि समय रहते इस समस्या का समाधान नहीं हुआ तो हजारों सरकारी कर्मचारियों को योजना का वास्तविक लाभ नहीं मिल पाएगा।
एक महीने में चार मामले
मामला-1: धनबाद के एएसआई से मांगे गए डेढ़ लाख रुपये
रेल जिला धनबाद के एएसआई लाल बाबू पांडेय इलाज के लिए रांची के एक निजी अस्पताल पहुंचे। पहले अस्पताल ने बीमा सीमा कम होने की बात कही, बाद में राज्यकर्मी स्वास्थ्य कार्ड पर इलाज से ही इनकार कर दिया और करीब 1.52 लाख रुपये नकद जमा कराने को कहा।
मामला-2: इलाज से पहले कार्ड अस्वीकार
दूसरे मामले में एक पुलिसकर्मी को अस्पताल ने भर्ती करने से पहले ही यह कह दिया कि राज्यकर्मी स्वास्थ्य बीमा कार्ड स्वीकार नहीं किया जाएगा। परिवार को इलाज जारी रखने के लिए निजी भुगतान करना पड़ा।
मामला-3: बीमा मंजूरी के बावजूद नहीं मिला लाभ
तीसरे मामले में बीमा प्रक्रिया पूरी होने के बावजूद अस्पताल प्रबंधन ने पैकेज राशि कम होने का हवाला देकर योजना के तहत इलाज करने से मना कर दिया। मरीज को दूसरी व्यवस्था करनी पड़ी।
मामला-4: परिजनों पर पड़ा आर्थिक बोझ
चौथे मामले में भी बीमा कार्ड होने के बावजूद अस्पताल ने कैशलेस इलाज नहीं किया। इलाज में देरी न हो, इसलिए परिजनों ने अपनी जेब से भुगतान कर मरीज का इलाज कराया।
पुलिस एसोसिएशन करेगी कार्रवाई की मांग
झारखंड पुलिस एसोसिएशन का कहना है कि यदि राज्य सरकार की योजना का पालन अस्पताल नहीं करेंगे तो इसका सीधा नुकसान सरकारी कर्मचारियों और उनके परिवारों को होगा। इसलिए मुख्यमंत्री और स्वास्थ्य मंत्री से मुलाकात कर बीमा कंपनी और संबंधित अस्पतालों के खिलाफ जांच तथा आवश्यक कार्रवाई की मांग की जाएगी।









