Jharkhand High Court: कर्मचारियों को लेकर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, 10 साल से अधिक सेवा देने वाले कर्मचारियों को आउटसोर्सिंग में ना भेजें, कहा- कर्मचारियों के हितों की रक्षा करना सरकार की जिम्मेदारी
झारखंड हाईकोर्ट ने मनरेगा के तहत 10 साल से अधिक सेवा देने वाले कंप्यूटर ऑपरेटरों को आउटसोर्सिंग में न भेजने का निर्देश दिया। सरकार को पद सृजित कर समायोजन पर कार्रवाई करने को कहा।

रांची। झारखंड हाईकोर्ट ने मनरेगा (महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना) के तहत लंबे समय से कार्यरत कंप्यूटर ऑपरेटरों के मामले में अहम फैसला दिया है। हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को अहम निर्देश दिए हैं। अदालत ने कहा कि वर्षों से काम कर रहे कर्मचारियों को आउटसोर्सिंग व्यवस्था में भेजना उचित नहीं है और सरकार को उनके हितों की रक्षा के लिए आवश्यक कदम उठाने चाहिए।
मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस दीपक रोशन की एकलपीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि एक कल्याणकारी राज्य होने के नाते सरकार की जिम्मेदारी केवल योजनाओं का संचालन करना नहीं, बल्कि अपने कर्मचारियों के अधिकारों और हितों की भी रक्षा करना है। अदालत ने टिप्पणी की कि लंबे समय से सेवाएं दे रहे कर्मचारियों को ठेका व्यवस्था के भरोसे छोड़ना उचित नहीं माना जा सकता।
स्वीकृत पद सृजित कर समायोजन करने का निर्देश
इस मामले में हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि याचिकाकर्ताओं को वर्ष 2007 के नियमों के तहत उपलब्ध सुरक्षा का लाभ देते हुए उनके लिए स्वीकृत पद सृजित करने और समायोजन की प्रक्रिया पर कार्रवाई की जाए। अदालत ने यह भी कहा कि जिन कर्मचारियों ने 10 वर्ष से अधिक समय तक लगातार सेवा दी है, उन्हें योजना के नियमित कर्मचारियों के रूप में रखने पर विचार किया जाना चाहिए।
याचिकाकर्ताओं ने क्या कहा?
याचिकाकर्ताओं की ओर से अदालत में दलील दी गई कि वे कई वर्षों से मनरेगा योजना के तहत कंप्यूटर ऑपरेटर के रूप में काम कर रहे हैं। उनका कहना था कि उन्हें दैनिक मजदूरी के आधार पर नियुक्त किया गया था, लेकिन लंबे समय तक लगातार सेवाएं देने के बावजूद अब उनकी सेवाएं आउटसोर्सिंग एजेंसियों को सौंपने की तैयारी की जा रही है। उनका तर्क था कि इससे उनकी नौकरी की सुरक्षा और वैधानिक अधिकार प्रभावित होंगे।
सरकार का पक्ष
राज्य सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि संबंधित कर्मचारियों की नियुक्ति नियमित प्रक्रिया के तहत नहीं हुई थी, बल्कि उन्हें दैनिक मजदूरी के आधार पर रखा गया था और उसी अनुसार मानदेय दिया जाता रहा। सरकार का कहना था कि ऐसी स्थिति में उनकी सेवाओं को आउटसोर्सिंग एजेंसी के माध्यम से संचालित करना प्रशासनिक निर्णय का हिस्सा है।
नियमितीकरण की मांग को लेकर दाखिल हुई थी याचिका
यह मामला सोनू प्रसाद एवं अन्य तथा महिमा प्रकाश केरकेट्टा एवं अन्य द्वारा दायर याचिकाओं से जुड़ा है। याचिकाकर्ताओं ने अदालत से मांग की थी कि वर्षों से लगातार सेवा देने वाले कर्मचारियों का नियमितीकरण किया जाए और उन्हें आउटसोर्सिंग व्यवस्था में स्थानांतरित न किया जाए। मामले की सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने कर्मचारियों के हितों को ध्यान में रखते हुए राज्य सरकार को आवश्यक कार्रवाई के निर्देश दिए।








