Jharkhand High Court: पत्नी को जबरन पति के साथ रहने का आदेश नहीं दे सकती अदालत, हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट का फैसला किया रद्द
झारखंड हाईकोर्ट ने मुस्लिम दंपती के मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए कहा कि पत्नी को जबरन पति के साथ रहने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। जानिए कोर्ट ने फैमिली कोर्ट का आदेश क्यों रद्द किया।

Jharkhand High Court Judgment on Restitution of Conjugal Rights | Family Court Order Cancelled रांची। झारखंड हाईकोर्ट ने मुस्लिम दंपती के वैवाहिक विवाद से जुड़े एक अहम मामले में बड़ा फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि किसी पत्नी को केवल पति की इच्छा के आधार पर दोबारा वैवाहिक जीवन शुरू करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि ‘वैवाहिक अधिकारों की बहाली’ (Restitution of Conjugal Rights) के मामलों में सिर्फ पति के अधिकार नहीं, बल्कि पत्नी की सुरक्षा, सम्मान और परिस्थितियों का भी समान रूप से मूल्यांकन किया जाना चाहिए।
हाईकोर्ट ने गिरिडीह फैमिली कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें पत्नी को पति के साथ वापस रहने का निर्देश दिया गया था। अदालत ने माना कि फैमिली कोर्ट ने पत्नी द्वारा लगाए गए मारपीट, क्रूरता और जानलेवा हमले जैसे गंभीर आरोपों को पर्याप्त महत्व नहीं दिया।
जानिये क्या था पूरा मामला?
दरअसल ये पूरा मामला गिरिडीह जिले का है। पति-पत्नी की शादी 27 मई 2013 को मुस्लिम रीति-रिवाज के अनुसार हुई थी। शुरुआत में दोनों साथ रहे, लेकिन कुछ वर्षों बाद दोनों के बीच विवाद बढ़ने लगा।
पति का आरोप था कि पत्नी उस पर माता-पिता से अलग रहने का दबाव बनाती थी। बाद में दोनों कुछ समय के लिए बेंगलुरु में भी साथ रहे। पति ने यह भी दावा किया कि संतान न होने पर उसने पत्नी का इलाज कराया, जिस पर करीब दो लाख रुपये खर्च हुए। पत्नी गर्भवती भी हुई, लेकिन कुछ महीनों बाद गर्भपात हो गया।
पति के अनुसार, 10 अप्रैल 2022 को पत्नी अपने मायके वालों के साथ घर आई और नकदी, जेवर तथा अन्य सामान लेकर चली गई। इसके बाद उसने पंचायत और समाज के माध्यम से पत्नी को वापस लाने की कोशिश की, लेकिन सफलता नहीं मिली। अंततः पति ने फैमिली कोर्ट में वैवाहिक अधिकारों की बहाली के लिए मुकदमा दायर किया।
पत्नी ने लगाए गंभीर आरोप
पत्नी ने पति के सभी आरोपों को खारिज करते हुए अदालत में कहा कि उसके साथ लगातार मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना की जाती थी। उसने आरोप लगाया कि दहेज के लिए उसे प्रताड़ित किया गया, मारपीट की गई और कई बार जान से मारने की धमकी भी दी गई।पत्नी ने अदालत को बताया कि 8 जुलाई 2022 को उसके साथ गंभीर मारपीट हुई, जिसके बाद वह किसी तरह अपनी जान बचाकर बहन के घर पहुंची और देवरी थाना में शिकायत दर्ज कराई।
इस मामले में पुलिस ने एफआईआर भी दर्ज की।पत्नी ने यह भी दावा किया कि पति ने सार्वजनिक रूप से तलाक देने की बात कही थी। बाद में उसने पश्चिम बंगाल स्थित काजी-ए-शरियत के समक्ष आवेदन देकर ‘खुला’ (Khula) की प्रक्रिया पूरी कराई।
फैमिली कोर्ट ने पति के पक्ष में दिया था फैसला
गिरिडीह फैमिली कोर्ट ने पति की दलीलों को स्वीकार करते हुए पत्नी को पति के साथ दोबारा वैवाहिक जीवन शुरू करने का आदेश दिया था। इसी फैसले को पत्नी ने झारखंड हाईकोर्ट में चुनौती दी।
हाईकोर्ट ने क्या कहा?
जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और जस्टिस संजय प्रसाद की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि मुस्लिम कानून में पति को वैवाहिक अधिकारों की बहाली के लिए मुकदमा दायर करने का अधिकार जरूर है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हर मामले में अदालत स्वतः पति के पक्ष में आदेश पारित कर दे।
अदालत ने कहा कि यदि रिकॉर्ड पर उपलब्ध साक्ष्य बताते हैं कि पत्नी को पति या ससुराल पक्ष से क्रूरता, हिंसा या उत्पीड़न का सामना करना पड़ा है, तो उसे दोबारा उसी वातावरण में रहने के लिए मजबूर करना न्यायसंगत नहीं होगा।
पत्नी की सुरक्षा भी अदालत की जिम्मेदारी
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि वैवाहिक अधिकारों की बहाली का उद्देश्य केवल पति की इच्छा पूरी करना नहीं है। अदालत को यह भी देखना होगा कि पत्नी के लिए पति के साथ रहना सुरक्षित, सम्मानजनक और न्यायसंगत है या नहीं।
कोर्ट ने कहा कि आधुनिक सामाजिक परिस्थितियों में कानून की व्याख्या भी उसी दृष्टिकोण से होनी चाहिए। यदि पत्नी के साथ हिंसा या प्रताड़ना के आरोप प्रथम दृष्टया गंभीर प्रतीत होते हैं, तो अदालत को उन्हें नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
फैमिली कोर्ट की भूमिका पर भी टिप्पणी
हाईकोर्ट ने कहा कि पारिवारिक मामलों की सुनवाई सामान्य सिविल मुकदमों की तरह नहीं हो सकती। फैमिली कोर्ट का दायित्व केवल तकनीकी साक्ष्यों तक सीमित नहीं है, बल्कि उसे विवाद की वास्तविक वजह समझनी चाहिए।
अदालत ने कहा कि Family Courts Act के तहत फैमिली कोर्ट को उपलब्ध दस्तावेजों, रिपोर्टों और परिस्थितियों का समग्र मूल्यांकन करना चाहिए ताकि न्यायपूर्ण निर्णय दिया जा सके।
हाईकोर्ट ने क्यों रद्द किया फैमिली कोर्ट का फैसला?
हाईकोर्ट ने पाया कि फैमिली कोर्ट ने पत्नी द्वारा लगाए गए गंभीर आरोपों, पुलिस केस और गवाहों के बयानों का उचित मूल्यांकन नहीं किया। इसी कारण अदालत ने फैमिली कोर्ट के आदेश को “Perverse” (साक्ष्यों के विपरीत और त्रुटिपूर्ण) करार देते हुए उसे रद्द कर दिया।
अदालत ने स्पष्ट किया कि रिकॉर्ड से यह नहीं कहा जा सकता कि पत्नी बिना किसी कारण अपनी इच्छा से घर छोड़कर चली गई थी। उपलब्ध तथ्यों से यह संकेत मिलता है कि वह कथित प्रताड़ना के कारण वैवाहिक घर छोड़ने को मजबूर हुई।
इस फैसले का क्या असर होगा?
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि झारखंड हाईकोर्ट का यह फैसला भविष्य में वैवाहिक अधिकारों की बहाली (Restitution of Conjugal Rights) से जुड़े मामलों के लिए महत्वपूर्ण नज़ीर साबित हो सकता है। यह निर्णय स्पष्ट करता है कि अदालतें अब केवल पति के अधिकारों के आधार पर फैसला नहीं देंगी, बल्कि पत्नी की सुरक्षा, सम्मान, स्वतंत्रता और वास्तविक परिस्थितियों को भी बराबर महत्व देंगी।








