Jharkhand High Court: 10 साल से ज्यादा जेल में रहा, फिर भी नहीं मिली जमानत; नाबालिग की हत्या मामले में हाईकोर्ट सख्त
Meta Description: Jharkhand High Court ने नाबालिग बच्ची की हत्या और दुष्कर्म के प्रयास के मामले में 10 साल से ज्यादा जेल में रहे दोषी की सजा स्थगित कर जमानत देने से इनकार किया।

रांची। रेपिस्ट को नाबालिग बच्ची से दुष्कर्म के प्रयास और उसकी हत्या के मामले में 10 साल से ज्यादा समय जेल में बिताने के बावजूद दोषी को राहत नहीं मिली। झारखंड हाई कोर्ट ने आजीवन कारावास की सजा काट रहे धानों टुडू की सजा स्थगित कर जमानत देने की मांग खारिज कर दी।जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और जस्टिस संजय प्रसाद की खंडपीठ ने कहा कि जघन्य अपराधों में केवल यह तथ्य कि दोषी ने 10 साल या उससे अधिक समय जेल में बिताया है, अपने आप में सजा स्थगित करने या जमानत देने का आधार नहीं बन सकता।
करमा पूजा के दौरान बच्ची को ले जाने का मामला
मामला पूर्वी सिंहभूम जिले के मुसाबनी थाना क्षेत्र का है। घटना 19 नवंबर 2015 की बताई गई है। अभियोजन के अनुसार, करमा पूजा के दौरान छोटका गोप और धानों टुडू नाबालिग बच्ची को बहला-फुसलाकर अपने साथ ले गए थे।अगली सुबह गांव के पास झाड़ियों में बच्ची का शव बरामद हुआ था। उसके गले में पतली रस्सी लिपटी मिली थी।
मामले की सुनवाई जमशेदपुर की विशेष पॉक्सो अदालत में हुई। अदालत ने 25 फरवरी 2020 को दोनों आरोपितों को दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास और 20 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी। इसके अलावा धारा 376डी/511 के तहत दुष्कर्म के प्रयास के मामले में धानों टुडू को 10 वर्ष के सश्रम कारावास की सजा भी सुनाई गई थी।
10 साल से ज्यादा जेल में रहने को बनाया जमानत का आधार
हाई कोर्ट में धानों टुडू की ओर से अधिवक्ता मनोज कुमार दास ने दलील दी कि वह करीब साढ़े 10 साल से जेल में है। बचाव पक्ष के अनुसार, आजीवन कारावास की सजा का बड़ा हिस्सा वह जेल में काट चुका है, इसलिए उसकी सजा स्थगित कर जमानत दी जानी चाहिए।बचाव पक्ष ने पोस्टमार्टम और फॉरेंसिक रिपोर्ट का हवाला देते हुए यह भी दलील दी कि इनमें यौन उत्पीड़न के साक्ष्य नहीं मिले हैं।
सरकार ने जमानत का किया विरोध
राज्य सरकार की ओर से अपर लोक अभियोजक विश्वनाथ राय ने याचिका का विरोध किया। सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि इसी मामले में हाई कोर्ट पहले भी आवेदक की सजा स्थगित करने की मांग को खारिज कर चुका है।बताया गया कि 2 नवंबर 2023 को हाई कोर्ट ने गुण-दोष के आधार पर सजा स्थगित करने की याचिका खारिज की थी। उस आदेश को ऊपरी अदालत में चुनौती भी नहीं दी गई थी।
पुराने आधार पर दोबारा राहत क्यों नहीं?
खंडपीठ ने कहा कि पिछली याचिका पहले ही गुण-दोष के आधार पर खारिज की जा चुकी है। ऐसे में उन्हीं आधारों पर दोबारा विचार करना पुराने आदेश की समीक्षा करने जैसा होगा।अदालत ने इस स्तर पर ऐसा करना उचित नहीं माना और धानों टुडू की सजा स्थगित कर जमानत देने की याचिका खारिज कर दी।
10 साल जेल का मतलब अपने आप जमानत नहीं
इस मामले में हाई कोर्ट की टिप्पणी का अहम पहलू यही है कि जघन्य अपराध में लंबी अवधि तक जेल में रहना अकेले सजा स्थगित कराने का अधिकार नहीं देता। अदालत ने मामले के पूर्व आदेश और उपलब्ध परिस्थितियों को देखते हुए राहत देने से इनकार किया।यानी आजीवन कारावास की सजा काट रहे दोषी के लिए सिर्फ यह आधार कि उसने 10 साल या उससे अधिक समय जेल में पूरा कर लिया है, अपने आप सजा स्थगन या जमानत का पर्याप्त आधार नहीं माना गया।












