कर्मचारियों को लेकर झारखंड हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, अब इन्हें भी मिलेगा GPF-पेंशन का लाभ, कोर्ट ने कहा, संस्थान की गलती का खामियाजा नहीं भुगतेंगे कर्मचारी
झारखंड हाईकोर्ट ने 1 जनवरी 1986 के बाद नियुक्त कर्मचारियों को GPF-सह-पेंशन योजना का लाभ देने का आदेश दिया। सेवानिवृत्त कर्मचारियों को भी मिलेगा लाभ।

रांची। झारखंड हाईकोर्ट ने कर्मचारियों के हित में बड़ा फैसला सुनाया है। जीपीएफ-पेंशन की मांग को लेकर दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने स्पष्ट कहा है कि संस्थान की गलती की खामियाजा कर्मचारी को नहीं भुगतने दिया जा सकता है। आईआईटी-आईएसएम धनबाद के कर्मचारियों की पेंशन व्यवस्था से जुड़े एक अहम मामले में बड़ा फैसला सुनाया है।
चीफ जस्टिस एमएस सोनक और जस्टिस राजेश शंकर की खंडपीठ ने 1 जनवरी 1986 के बाद नियुक्त कर्मचारियों को GPF-सह-पेंशन योजना का लाभ देने का आदेश दिया है। कोर्ट ने कहा कि संस्थान की गलती का खामियाजा कर्मचारियों को नहीं भुगतना चाहिए।अदालत ने इस मामले से जुड़ी 20 से अधिक याचिकाओं में केंद्र सरकार की अपीलों का निष्पादन करते हुए संबंधित कर्मचारियों को राहत दी।
कर्मचारियों से विकल्प मांगना ही था गलत
कोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा कि 1 जनवरी 1986 के बाद नियुक्त कर्मचारियों से सीपीएफ में बने रहने का विकल्प मांगने का कोई औचित्य नहीं था। संस्थान ने बाद में खुद स्वीकार किया था कि कर्मचारियों से इस तरह विकल्प मांगना उसकी गलती थी।खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि केवल इस आधार पर कि कुछ कर्मचारियों ने सीपीएफ को चुना और लंबे समय तक उसी योजना में बने रहे, उन्हें GPF-सह-पेंशन योजना के लाभ से वंचित नहीं किया जा सकता।
1987 में मांगा गया था CPF या GPF का विकल्प
मामला तत्कालीन इंडियन स्कूल ऑफ माइंस (ISM) धनबाद, जो अब IIT-ISM धनबाद है, की पेंशन व्यवस्था से जुड़ा है। केंद्र सरकार की ओर से चौथे वेतन आयोग की सिफारिशें 1 जनवरी 1986 से लागू की गई थीं।
इसके बाद संस्थान ने 19 दिसंबर 1987 को कर्मचारियों से CPF में बने रहने या GPF-सह-पेंशन योजना में जाने का विकल्प मांगा। हालांकि, 3 जनवरी 1994 को संस्थान ने स्पष्ट किया कि 1 जनवरी 1986 के बाद नियुक्त नए कर्मचारियों को केवल GPF योजना का लाभ मिलना चाहिए।इसके बावजूद कई कर्मचारियों को CPF योजना में ही रखा गया।
2017 में संस्थान ने गलती सुधारने की कोशिश की
यह मामला बाद में संस्थान के कार्यकारी बोर्ड के सामने पहुंचा। वर्ष 2005 में बोर्ड ने माना कि 1 जनवरी 1986 के बाद नियुक्त कर्मचारियों को GPF के तहत रखा जाना चाहिए। हालांकि, तत्कालीन मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने इस फैसले पर सहमति नहीं दी।इसके बाद गठित समिति की सिफारिश पर वर्ष 2017 में IIT-ISM के बोर्ड ऑफ गवर्नर्स ने कर्मचारियों को GPF मंक शामिल करने का फैसला किया।
1 सितंबर 2017 के कार्यालय आदेश के तहत कर्मचारियों को उनकी नियुक्ति की तारीख से GPF में शामिल किया गया और उनके योगदान को GPF खातों में स्थानांतरित कर दिया गया। बाद में मानव संसाधन विभाग की आपत्ति के बाद इस आदेश को स्थगित कर दिया गया।वर्ष 2019 में बोर्ड ऑफ गवर्नर्स ने कर्मचारियों को दोबारा CPF योजना में कर दिया। इसके बाद कर्मचारियों ने हाईकोर्ट का रुख किया।
वित्तीय बोझ की दलील भी नहीं मानी
सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से दलील दी गई कि GPF लागू करने से केंद्र सरकार पर वित्तीय बोझ पड़ेगा और इसके लिए केंद्र की पूर्व अनुमति आवश्यक थी।हाईकोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने कहा कि केवल वित्तीय बोझ का हवाला देकर कर्मचारियों के वैध दावे को खारिज नहीं किया जा सकता।
खंडपीठ ने माना कि संस्थान ने कर्मचारियों को कोई नया लाभ देने के बजाय अपनी पूर्व की गलती को सुधारने का प्रयास किया था। कोर्ट के मुताबिक, पूर्व अनुमति नहीं लेने को प्रक्रियात्मक त्रुटि माना भी जाए तो केवल इस आधार पर वैध निर्णय को रद्द नहीं किया जा सकता, जब तक इससे मौलिक न्याय प्रभावित न हुआ हो या किसी पक्ष को वास्तविक नुकसान न हुआ हो।
सेवानिवृत्त कर्मचारियों को भी मिलेगा पेंशन लाभ
हाईकोर्ट ने संबंधित कर्मचारियों को GPF के दायरे में रखने का निर्देश दिया है। जो कर्मचारी सेवानिवृत्त हो चुके हैं और जिन्हें अब तक CPF का लाभ नहीं मिला है, उन्हें GPF के तहत पेंशन और अन्य सेवानिवृत्ति लाभ दिए जाएंगे।
वहीं, जिन सेवानिवृत्त कर्मचारियों को पहले ही CPF का लाभ मिल चुका है, उन्हें GPF के तहत पेंशन का लाभ तभी मिलेगा, जब वे IIT-ISM धनबाद की ओर से CPF योजना में किए गए सरकारी अंशदान को वापस करेंगे।












