Jharkhand High Court: 97 अंकों की परीक्षा रद्द करना गलत, 23 कर्मचारियों की प्रोन्नति बहाल; हाईकोर्ट ने विधानसभा सचिवालय का आदेश पलटा
Jharkhand High Court ने 97 अंकों की परीक्षा के आधार पर 23 कर्मचारियों की प्रोन्नति रद्द करने का आदेश पलट दिया। जानें क्या है पूरा मामला और कोर्ट ने क्या कहा।

Jharkhand High Court: कर्मचारियों के प्रमोशन जुड़े मामलों में झारखंड हाईकोर्ट ने बड़ा अहम फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट ने सभी कर्मचारियों के प्रमोशन को बहाल करने का आदेश दिया है। झारखंड हाईकोर्ट के इस फैसले से विधानसभा सचिवालय में कार्यरत 23 चतुर्थवर्गीय कर्मचारियों को बड़ी राहत मिली है।
जस्टिस दीपक रोशन की अदालत ने कनीय सचिवालय सहायक (Junior Secretariat Assistant) पद पर प्रोन्नति के लिए आयोजित परीक्षा और उसके आधार पर दी गई प्रोन्नति को रद्द करने के विधानसभा सचिवालय के फैसले को निरस्त कर दिया है।अदालत ने स्पष्ट किया कि परीक्षा 100 के बजाय 97 अंकों की हुई थी, लेकिन यह गलती सभी अभ्यर्थियों के लिए समान थी। ऐसे में केवल तीन अंक कम होने को पूरी परीक्षा रद्द करने का पर्याप्त आधार नहीं माना जा सकता।
97 अंकों की परीक्षा पर क्यों उठा था विवाद?
विधानसभा सचिवालय में कार्यरत चतुर्थवर्गीय कर्मचारियों को कनीय सचिवालय सहायक के पद पर प्रोन्नति देने के लिए 29 अगस्त 2025 को सूचना जारी की गई थी। इसके बाद 14 सितंबर 2025 को प्रतियोगिता परीक्षा आयोजित हुई।परीक्षा के बाद जब प्रश्नपत्र की जांच हुई तो पता चला कि प्रश्नपत्र 100 अंकों के बजाय 97 अंकों का था।
इसी तकनीकी कमी को आधार बनाते हुए विधानसभा सचिवालय ने बाद में परीक्षा को रद्द करने का फैसला लिया।हालांकि, हाईकोर्ट ने माना कि यह तकनीकी कमी अभ्यर्थियों की वजह से नहीं हुई थी और सभी उम्मीदवारों ने एक ही प्रश्नपत्र से परीक्षा दी थी।
सभी अभ्यर्थियों को मिला समान प्रश्नपत्र
अदालत के सामने यह महत्वपूर्ण तथ्य भी रहा कि परीक्षा में शामिल सभी अभ्यर्थियों के लिए प्रश्नपत्र समान था। इसलिए किसी एक उम्मीदवार को अतिरिक्त फायदा या किसी दूसरे को नुकसान पहुंचने की स्थिति सामने नहीं आई।कोर्ट ने कहा कि संबंधित नियमों में लिखित परीक्षा के कुल अंकों की कोई निश्चित संख्या निर्धारित नहीं थी। ऐसे में केवल इस आधार पर कि परीक्षा 100 की जगह 97 अंकों की हुई, पूरी परीक्षा प्रक्रिया को ही गलत नहीं माना जा सकता।
पहले रिजल्ट जारी हुआ, फिर दी गई प्रोन्नति
14 सितंबर को परीक्षा आयोजित होने के बाद 16 सितंबर 2025 को परिणाम जारी किया गया। इसमें याचिकाकर्ताओं समेत सफल कर्मचारियों को उत्तीर्ण घोषित किया गया।इसके बाद 3 अक्टूबर 2025 को सफल कर्मचारियों को कनीय सचिवालय सहायक पद पर प्रोन्नति दी गई। इनमें से अधिकांश कर्मचारियों ने उसी दिन नए पद पर योगदान भी दे दिया था।लेकिन कुछ ही दिनों बाद विधानसभा सचिवालय ने परीक्षा में हुई तकनीकी त्रुटि का हवाला देते हुए पूरी प्रक्रिया पर रोक लगा दी।
13 अक्टूबर के आदेश से वापस ले ली गई थी प्रोन्नति
विधानसभा सचिवालय के उप सचिव ने 13 अक्टूबर 2025 को आदेश जारी कर परीक्षा और उसके आधार पर दी गई प्रोन्नति को रद्द कर दिया था। इसके बाद कर्मचारियों को उनके पुराने पद पर वापस भेजने की कार्रवाई की गई।इसी आदेश के खिलाफ अभय उरांव समेत 23 कर्मचारियों ने झारखंड हाईकोर्ट का रुख किया।
कर्मचारियों ने कोर्ट में क्या कहा?
याचिकाकर्ताओं की ओर से दलील दी गई कि 97 अंकों की परीक्षा सभी अभ्यर्थियों के लिए समान थी। परीक्षा में किसी तरह की धांधली या अनुचित साधन के इस्तेमाल का आरोप भी नहीं था।उनका कहना था कि प्रश्नपत्र में अंक कम होने की तकनीकी गलती विभाग की थी और इसके लिए अभ्यर्थियों को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। परीक्षा के बाद परिणाम घोषित कर प्रोन्नति भी दी जा चुकी थी और कर्मचारियों ने अपने नए पद पर काम शुरू कर दिया था।
प्रोन्नति रद्द करने से पहले सुनवाई जरूरी
हाईकोर्ट ने यह भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की कि प्रोन्नति मिलने के बाद कर्मचारियों को वापस पुराने पद पर भेजना उनके रैंक में कमी के समान है। ऐसी कार्रवाई से पहले संबंधित कर्मचारियों को नोटिस देकर उनका पक्ष सुनने का अवसर दिया जाना चाहिए था।अदालत ने माना कि इस प्रक्रिया का पालन किए बिना प्रोन्नति रद्द करना उचित नहीं था।
विधानसभा सचिवालय की दलील नहीं मानी
विधानसभा सचिवालय की ओर से अदालत में कहा गया कि परीक्षा 100 अंकों की होनी थी, लेकिन प्रश्नपत्र केवल 97 अंकों का तैयार हुआ। सचिवालय के अनुसार यह तकनीकी त्रुटि परीक्षा की वैधता को प्रभावित करती थी और इसी कारण परीक्षा रद्द की गई।हालांकि, अदालत ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने माना कि गलती अभ्यर्थियों की नहीं थी और सभी उम्मीदवारों के लिए परीक्षा की परिस्थितियां समान थीं।
23 कर्मचारियों को मिलेगा प्रोन्नति का लाभ
झारखंड हाईकोर्ट ने विधानसभा सचिवालय के 13 अक्टूबर 2025 के आदेश को निरस्त कर दिया है। साथ ही सचिवालय को निर्देश दिया है कि कर्मचारियों की प्रोन्नति से जुड़े सभी परिणामी लाभ देने के लिए आठ सप्ताह के भीतर औपचारिक आदेश जारी किया जाए।मामले से जुड़ी अवमानना याचिका को भी अदालत ने बंद कर दिया है।












