“लड़की वालों को ‘भिखारी’ कहने वालों पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, कहा- जब शादी कर ली, तो लड़की व उसके परिवार का अपमान क्यों? देवर की याचिका खारिज
The Supreme Court took a strong stance against those who called the girl's family "beggars," saying, "If the marriage is over, why insult the girl and her family?" The brother-in-law's petition was dismissed.

नई दिल्ली। लड़की वालों को ‘भिखारी’ कहने वालों पर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त टिप्पणी की है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि बहू का अपमान समाज की गंभीर बीमारी है। दहेज उत्पीड़न और विवाहिता की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत से जुड़े एक गंभीर मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि शादी के बाद लड़कियों और उनके माता-पिता का अपमान करना भारतीय समाज की एक गंभीर बीमारी बन चुकी है और ऐसे मामलों में समाज को सख्त संदेश देने की जरूरत है।
सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुइयां की खंडपीठ ने छत्तीसगढ़ के एक पुराने मामले की सुनवाई के दौरान की। मामला वर्ष 2010 का है, जिसमें विवाह के महज तीन वर्ष के भीतर एक महिला की ससुराल में संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई थी। महिला फांसी के फंदे से लटकी मिली थी, जिसके बाद उसके परिवार ने दहेज प्रताड़ना और मानसिक उत्पीड़न के आरोप लगाए थे।
सुनवाई के दौरान जस्टिस बीवी नागरत्ना ने ससुराल पक्ष की मानसिकता पर कड़ी नाराजगी जाहिर की। उन्होंने कहा, “लड़के आखिर शादी क्यों करते हैं? जब शादी कर ली है तो फिर लड़की और उसके परिवार को क्यों अपमानित करते हैं?” अदालत ने स्पष्ट कहा कि समाज में यह मजबूत संदेश जाना चाहिए कि बहू और उसके मायके वालों का अपमान किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं किया जाएगा।
कोर्ट ने मामले को केवल आत्महत्या का सामान्य मामला मानने से इनकार करते हुए कहा कि इसके पीछे लगातार दी जा रही मानसिक, आर्थिक और शारीरिक प्रताड़ना की पृष्ठभूमि दिखाई देती है। रिकॉर्ड और गवाहों के बयानों का हवाला देते हुए अदालत ने कहा कि मृतका के परिवार को “भिखारी” तक कहा गया और उनसे लगातार पैसों की मांग की जाती रही।
जस्टिस नागरत्ना ने टिप्पणी की कि लड़की के पिता अपनी बेटी का घर बचाने और उसकी जिंदगी सुरक्षित रखने के लिए हरसंभव आर्थिक मदद देने को तैयार थे, लेकिन इसके बावजूद उनके साथ लगातार अपमानजनक व्यवहार किया गया। अदालत ने इस पूरे घटनाक्रम पर गहरी संवेदना और चिंता व्यक्त की।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता यानी मृतका के देवर की ओर से यह दलील दी गई कि एफआईआर दर्ज कराने में देरी हुई थी, इसलिए राहत दी जानी चाहिए। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इस तकनीकी आधार को पूरी तरह खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में केवल तकनीकी आधार पर आरोपों की गंभीरता को कम नहीं किया जा सकता।
खंडपीठ के दूसरे सदस्य जस्टिस उज्जल भुइयां ने भी मामले पर चिंता जताते हुए कहा कि सबसे अधिक दुखद बात यह है कि इस तरह के अमानवीय मामलों में समाज के पढ़े-लिखे लोग भी शामिल पाए जाते हैं। उन्होंने कहा कि यह स्थिति समाज के लिए गंभीर चिंता का विषय है। मृतका के देवर ने भारतीय दंड संहिता की धारा 498ए के तहत निचली अदालत द्वारा सुनाई गई सजा को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। आरोपी पक्ष के वकील ने अदालत से राहत की मांग की, लेकिन जस्टिस नागरत्ना ने स्पष्ट शब्दों में कहा, “आपको तो खुश होना चाहिए कि आप पर सिर्फ धारा 498ए लगी है और केवल तीन साल की सजा हुई है।”









