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झारखंड हाईकोर्ट का कड़ा निर्देश, यौन शोषण मामले में Zero FIR जरूरी, पुलिस को मिले ये सख्त निर्देश, इनकार पर गिरेगी गाज

रांची। झारखंड हाईकोर्ट ने महिलाओं के यौन शोषण, पीड़िताओं की सुरक्षा, न्याय और पुनर्वास को लेकर कड़े निर्देश जारी किए हैं। मुख्य न्यायाधीश और न्यायमूर्ति राजेश शंकर की युगल पीठ ने कहा है कि किसी भी संज्ञेय अपराध, विशेषकर यौन हिंसा और पॉक्सो (POCSO) मामलों में क्षेत्राधिकार का हवाला देकर एफआईआर दर्ज करने से इनकार नहीं किया जा सकता।

अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि Zero FIR दर्ज करना पुलिस की कानूनी जिम्मेदारी है और ऐसा नहीं करना कानून का उल्लंघन माना जाएगा।8 जून 2026 को सुनाए गए फैसले में अदालत ने राज्य सरकार, पुलिस विभाग और संबंधित एजेंसियों को कई महत्वपूर्ण निर्देश दिए हैं, ताकि यौन अपराध पीड़ितों को समय पर न्याय और सहायता मिल सके।

पुलिस को Zero FIR को लेकर सख्त निर्देश

हाईकोर्ट ने DGP को भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) 2023 की धारा 173 के तहत Zero FIR की व्यवस्था को सख्ती से लागू करने का निर्देश दिया है। अदालत ने कहा कि किसी भी स्तर पर लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी और दोषी अधिकारियों की जवाबदेही तय की जानी चाहिए।साथ ही पुलिसकर्मियों के लिए नियमित प्रशिक्षण और संवेदनशीलता कार्यक्रम आयोजित करने का भी आदेश दिया गया है।

वन-स्टॉप सेंटर होंगे और मजबूत

अदालत ने महिला एवं बाल विकास विभाग को राज्यभर में संचालित वन-स्टॉप सेंटरों की कार्यप्रणाली को मजबूत करने के निर्देश दिए हैं। इसके लिए निगरानी समिति गठित करने को कहा गया है, ताकि पीड़िताओं को समय पर सहायता और मामलों का त्वरित निपटारा सुनिश्चित हो सके।

दुष्कर्म पीड़ित बच्चों को मुफ्त शिक्षा

हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को प्रत्येक जिले में एक नोडल अधिकारी नियुक्त करने का निर्देश दिया है, जो दुष्कर्म से जन्मे बच्चों की शिक्षा और विकास की निगरानी करेगा। अदालत ने कहा कि ऐसे बच्चों को 12वीं कक्षा तक निःशुल्क शिक्षा उपलब्ध कराई जाए। इसके अलावा यदि कोई बच्चा IIT, NIT, AIIMS या IIM जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में प्रवेश प्राप्त करता है, तो उसे उच्च शिक्षा के लिए छात्रवृत्ति भी प्रदान की जाएगी।

पीड़ितों के पुनर्वास और मुआवजे पर विशेष जोर

हाईकोर्ट ने कहा कि मुकदमे की शुरुआत में ही ट्रायल कोर्ट यह तय करे कि पीड़िता को अंतरिम राहत देने की आवश्यकता है या नहीं। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि मामले के अंतिम निर्णय के बाद पीड़िता को अंतिम मुआवजा देना अनिवार्य होगा और मुआवजे का भुगतान 30 दिनों के भीतर किया जाना चाहिए।

जांच और सुनवाई के लिए तय की समयसीमा

अदालत ने यौन अपराध मामलों की जांच और सुनवाई में देरी पर चिंता जताते हुए स्पष्ट समयसीमा तय की है।

  • प्रारंभिक जांच 15 दिनों के भीतर पूरी हो।
  • अंतिम जांच दो महीने के अंदर समाप्त की जाए।
  • मामलों का त्वरित निपटारा सुनिश्चित करने के लिए BNSS की धारा 346 का पालन किया जाए।
  • अदालतें अनावश्यक स्थगन और बार-बार तारीख देने से बचें।

पीड़िता की पहचान गोपनीय रखना अनिवार्य

हाईकोर्ट ने मीडिया, पुलिस और न्यायिक अधिकारियों को सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों का पालन करने का आदेश दिया है। पीड़िता की पहचान सार्वजनिक करने या उसकी गोपनीयता भंग करने वालों के खिलाफ सख्त कानूनी और विभागीय कार्रवाई की जाएगी।

अन्य महत्वपूर्ण निर्देश

  • सभी जिलों के पुलिस अधीक्षकों को पीड़ितों को तत्काल कानूनी सहायता उपलब्ध कराने का निर्देश।
  • पॉक्सो मामलों में 24 घंटे के भीतर आश्रय, सुरक्षा और चिकित्सा सुविधा सुनिश्चित करने का आदेश।
  • पीड़िता का बयान केवल महिला पुलिस अधिकारी द्वारा दर्ज किया जाएगा।
  • सभी अस्पतालों में प्रतिबंधित चिकित्सीय जांच पद्धति पर पूर्ण रोक।
  • दूरदराज क्षेत्रों में महिलाओं और किशोरियों के लिए कानूनी जागरूकता अभियान चलाने का निर्देश।
  • स्कूलों, कॉलेजों और गांवों में आत्मरक्षा प्रशिक्षण शिविर आयोजित करने पर जोर।
  • आवश्यकता पड़ने पर पीड़िता और उसके परिवार के पुनर्वास की व्यवस्था राज्य सरकार करेगी।
  • महिला हेल्पलाइन 181 को और प्रभावी बनाने तथा उसे आपातकालीन सेवा 112 से जोड़ने पर विचार करने का निर्देश।

अमिताभ सिन्हा

अमिताभ सिन्हा hpbltop.com के वरिष्ठ राजनीतिक संपादक हैं। पत्रकारिता में 12 वर्षों से अधिक के अनुभव के साथ, उन्हें भारतीय राजनीति, चुनावी रणनीतियों और संसद की कार्यवाही की गहरी समझ है। अमिताभ की रिपोर्टिंग तथ्यों पर आधारित और निष्पक्ष होती है। वे जटिल सरकारी नीतियों को सरल भाषा में पाठकों तक पहुँचाने में माहिर हैं। खाली समय में वे राजनीतिक इतिहास पढ़ना पसंद करते हैं।
  • ईमेल: amitabh@hpbltop.com

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