झारखंड सचिवालय सेवा नियमावली पर क्या है विवाद: प्रमोशन के नए नियमों से क्यों नाराज हैं अधिकारी-कर्मचारी? जानिए किन बातों की है आशंका
झारखंड सचिवालय सेवा नियमावली के प्रस्तावित प्रमोशन नियमों पर विवाद तेज। ASO से प्रशाखा पदाधिकारी समेत विभिन्न पदों पर पदोन्नति की नई समय-सीमा और संघ की प्रमुख आपत्तियां जानें।

रांची: झारखंड में प्रस्तावित सचिवालय सेवा नियमावली को लेकर प्रशासनिक महकमे में असंतोष बढ़ता नजर आ रहा है। झारखंड सचिवालय सेवा संघ ने पदोन्नति से जुड़े नए प्रावधानों पर कड़ी आपत्ति जताई है। संघ का कहना है कि प्रस्तावित नियमों के कारण अधिकारियों और कर्मचारियों को उच्च पदों तक पहुंचने के लिए पहले की तुलना में अधिक समय तक इंतजार करना पड़ सकता है। इससे उनके करियर की संभावनाओं और मनोबल पर प्रतिकूल असर पड़ने की आशंका है।
विवाद का मुख्य केंद्र सहायक प्रशाखा पदाधिकारी (ASO) से लेकर संयुक्त सचिव तक के विभिन्न पदों पर पदोन्नति के लिए निर्धारित न्यूनतम सेवा अवधि में प्रस्तावित बदलाव हैं। संघ ने सरकार से नियमावली की समीक्षा करने और कर्मचारियों के हितों को ध्यान में रखते हुए आवश्यक संशोधन करने की मांग की है।
प्रमोशन के नियमों में क्या-क्या बदलाव प्रस्तावित हैं?
प्रस्तावित नियमावली में अलग-अलग पदों पर पदोन्नति के लिए न्यूनतम सेवा अवधि निर्धारित किए जाने को लेकर चर्चा तेज है। उपलब्ध विवरण के अनुसार, प्रमुख बदलाव इस प्रकार हैं:
1. ASO से प्रशाखा पदाधिकारी बनने के लिए 8 साल की सेवा
सहायक प्रशाखा पदाधिकारी (ASO) से प्रशाखा पदाधिकारी बनने के लिए पहले न्यूनतम दो साल की सेवा अवधि का प्रावधान बताया गया है। प्रस्तावित नियमावली में इसे बढ़ाकर आठ साल किए जाने की बात कही गई है। यदि यह प्रावधान लागू होता है, तो संबंधित कर्मचारियों को अगली पदोन्नति के लिए छह साल अतिरिक्त इंतजार करना पड़ सकता है।
2. प्रशाखा पदाधिकारी से अवर सचिव बनने में भी बढ़ेगा इंतजार
प्रशाखा पदाधिकारी से अवर सचिव के पद पर पदोन्नति के लिए पहले छह साल की न्यूनतम सेवा अवधि का उल्लेख है। प्रस्तावित व्यवस्था में इसे बढ़ाकर आठ साल किए जाने की बात सामने आई है। इससे इस स्तर पर पदोन्नति की प्रक्रिया पहले के मुकाबले लंबी हो सकती है।
3. अवर सचिव से उप सचिव बनने के लिए पांच साल की सेवा
प्रस्तावित प्रावधानों के अनुसार, अवर सचिव से उप सचिव के पद पर पदोन्नति के लिए कम से कम पांच साल की सेवा अनिवार्य किए जाने की बात कही गई है। इस बदलाव को भी पदोन्नति की समय-सीमा से जोड़कर देखा जा रहा है।
4. उप सचिव से संयुक्त सचिव बनने का रास्ता भी होगा लंबा
उप सचिव से संयुक्त सचिव के पद पर पदोन्नति के लिए भी पांच साल की अतिरिक्त सेवा अवधि निर्धारित किए जाने का उल्लेख है। संघ की चिंता है कि विभिन्न स्तरों पर सेवा अवधि बढ़ने से कर्मचारियों के लिए अपने सेवाकाल में उच्च प्रशासनिक पदों तक पहुंचना कठिन हो सकता है।
क्यों विरोध कर रहा है सचिवालय सेवा संघ?
झारखंड सचिवालय सेवा संघ की प्रमुख आपत्ति यह है कि सचिवालय सेवा के पदोन्नति नियमों की तुलना राज्य की अन्य समकक्ष सेवाओं से की जानी चाहिए। संघ का तर्क है कि यदि अन्य सेवाओं में अपेक्षाकृत कम अवधि में पदोन्नति के अवसर उपलब्ध हैं, तो सचिवालय सेवा के कर्मचारियों के लिए लंबी सेवा अवधि निर्धारित करना असमानता की स्थिति पैदा कर सकता है।
संघ को आशंका है कि प्रस्तावित बदलाव लागू होने पर कर्मचारियों की पदोन्नति में देरी होगी और कई अधिकारी संयुक्त सचिव जैसे वरिष्ठ पदों तक पहुंचने से पहले ही सेवानिवृत्त हो सकते हैं। हालांकि, इस आशंका का वास्तविक आकलन संबंधित सेवा नियमों, पदों की उपलब्धता और कर्मचारियों की सेवा अवधि के आधार पर ही किया जा सकता है।
कर्मचारियों के मनोबल पर पड़ सकता है असर
पदोन्नति किसी भी सरकारी सेवा में कर्मचारियों के करियर विकास का महत्वपूर्ण हिस्सा होती है। सेवा अवधि बढ़ने से पदोन्नति के अवसरों और समय पर असर पड़ सकता है। सचिवालय सेवा संघ का मानना है कि इससे कर्मचारियों के मनोबल, कार्यप्रेरणा और प्रशासनिक कार्यक्षमता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ने की आशंका है।
वहीं, प्रस्तावित नियमावली के पीछे सरकार का आधिकारिक पक्ष और बदलावों के कारण स्पष्ट होने के बाद ही यह समझा जा सकेगा कि इन प्रावधानों का उद्देश्य क्या है और उनका कर्मचारियों पर कितना प्रभाव पड़ेगा।
सरकार से समीक्षा और संशोधन की मांग
झारखंड सचिवालय सेवा संघ ने सरकार से प्रस्तावित नियमावली पर पुनर्विचार करने और पदोन्नति संबंधी प्रावधानों की समीक्षा करने की मांग की है। संघ चाहता है कि नियम बनाते समय सचिवालय सेवा के अधिकारियों और कर्मचारियों के करियर हितों तथा अन्य समकक्ष सेवाओं में लागू व्यवस्था को भी ध्यान में रखा जाए।
फिलहाल इस विवाद में सरकार की ओर से अंतिम निर्णय या संशोधित नियमावली की स्थिति की आधिकारिक पुष्टि आवश्यक है। ऐसे में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार संघ की आपत्तियों पर क्या रुख अपनाती है और क्या प्रस्तावित नियमों में कोई बदलाव किया जाता है।












