झारखंड में मध्याह्न भोजन पर संकट! स्कूल प्रभारी ने बयां किया दर्द, कहा – आखिर कबतक उधार के पैसे से चलाएं मिड डे मिल, कब जागेगा शिक्षा विभाग, शिक्षक ने कहा – बच्चों की भूख देखी नहीं जाती इसलिए…..
झारखंड में मध्याह्न भोजन की राशि नहीं मिली, पूर्वी सिंहभूम के स्कूल प्रभारी ने बताई परेशानी

मुख्यमंत्री जी सरकारी स्कूलों में बच्चों को भोजन खिलाने की जिम्मेदारी शिक्षकों पर, लेकिन राशि नहीं मिलने से बढ़ रही परेशानी | सरकार से बकाया भुगतान कराने की मांग
जमशेदपुर/रांची MId Day Meal News :झारखंड के सरकारी स्कूलों में मध्याह्न भोजन योजना क्या बंद हो जाएगी। मिड डे मिल के संचालन को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। पूर्वी सिंहभूम जिले के एक विद्यालय के प्रभारी ने मध्याह्न भोजन की राशि नहीं मिलने से हो रही परेशानी को सामने रखा है। उनकी शिकायत ने स्कूलों में बच्चों को नियमित भोजन उपलब्ध कराने की व्यवस्था और सरकारी राशि के समय पर भुगतान पर सवाल खड़े कर दिए हैं। ये समस्या सिर्फ पूर्वी सिंहभूम की नहीं कमोवेश पूरे राज्य में आ रही है।
मध्याह्न भोजन योजना का उद्देश्य सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों को पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराना है। लेकिन जब इस योजना के संचालन के लिए जरूरी राशि समय पर नहीं मिलती, तो विद्यालय प्रबंधन के सामने खाद्य सामग्री खरीदने, दुकानदारों का बकाया चुकाने और भोजन की व्यवस्था लगातार बनाए रखने जैसी चुनौतियां पैदा होती हैं।
राशि नहीं मिलने से स्कूल प्रभारी परेशान, कैसे चलेगी व्यवस्था?
स्कूल में मिड डे मिल प्रभारी की शिकायत का मूल सवाल यही है कि जब मध्याह्न भोजन के संचालन की जिम्मेदारी विद्यालयों को निभानी है, तो इसके लिए जरूरी राशि समय पर क्यों नहीं उपलब्ध कराई जा रही है?
विद्यालयों में बच्चों के लिए दाल, सब्जी, तेल, मसाले और ईंधन जैसी आवश्यक सामग्री की व्यवस्था करनी पड़ती है। कुकिंग कॉस्ट की राशि में देरी होने पर स्कूलों को वैकल्पिक व्यवस्था तलाशनी पड़ती है। कई मामलों में शिक्षकों को स्थानीय दुकानदारों से उधार सामग्री लेकर भोजन बनवाने की मजबूरी का सामना करना पड़ा है।
ऐसी स्थिति में सवाल उठना स्वाभाविक है कि विद्यालयों के पास पर्याप्त राशि नहीं हो, तो वे कब तक अपने स्तर पर उधार से व्यवस्था संभाल पाएंगे? शिक्षकों को पढ़ाई के साथ-साथ आर्थिक और प्रशासनिक परेशानियों का सामना करना पड़े, तो इसका असर विद्यालय के दूसरे कामों पर भी पड़ सकता है। सवाल जल्द से जल्द संज्ञान लेने की है।
झारखंड के दूसरे जिलों में भी सामने आई भुगतान की समस्या
मध्याह्न भोजन की राशि में देरी की समस्या केवल एक शिकायत तक सीमित नहीं रही है। अगस्त 2026 में प्रकाशित एक रिपोर्ट में झारखंड के स्कूलों में कुकिंग कॉस्ट का भुगतान अटकने और शिक्षकों द्वारा उधार लेकर भोजन संचालित करने की परेशानी सामने आई थी।
वहीं, सितंबर 2026 में राशि जारी होने की खबरों के बाद भी भुगतान प्रक्रिया को लेकर सवाल उठे। अक्टूबर में प्रकाशित रिपोर्टों के अनुसार, नई डिजिटल भुगतान व्यवस्था के तहत बिल और वाउचर जमा करने की प्रक्रिया ने भी कुछ विद्यालयों के सामने कठिनाइयां पैदा कीं।
इससे स्पष्ट होता है कि राशि आवंटित होना और उसका वास्तविक भुगतान होना दो अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं। सरकार और विभाग के लिए जरूरी है कि आवंटन के साथ-साथ यह भी सुनिश्चित किया जाए कि संबंधित विद्यालयों और विक्रेताओं तक भुगतान समय पर पहुंचे।
नई भुगतान व्यवस्था से राहत या बढ़ी परेशानी?
मध्याह्न भोजन योजना के भुगतान में पारदर्शिता लाने के लिए नई व्यवस्था के तहत विक्रेताओं के खातों में सीधे भुगतान की प्रक्रिया अपनाई जा रही है। इसके लिए खरीदारी से संबंधित बिल, वाउचर और अन्य दस्तावेज जमा करने की जरूरत पड़ती है।
लेकिन यदि विद्यालयों को नई व्यवस्था की स्पष्ट जानकारी, आवश्यक प्रशिक्षण और समय पर भुगतान नहीं मिलता, तो जमीनी स्तर पर परेशानी बढ़ सकती है। पुराने बकाये का भुगतान कैसे होगा और पहले से उधार ली गई सामग्री की राशि किस प्रक्रिया से चुकाई जाएगी, इन सवालों का स्पष्ट समाधान जरूरी है।
डिजिटल व्यवस्था का उद्देश्य भुगतान को सरल और पारदर्शी बनाना है। इसलिए यह सुनिश्चित करना भी विभाग की जिम्मेदारी है कि तकनीकी या प्रक्रियागत बदलाव के कारण बच्चों के भोजन की व्यवस्था प्रभावित न हो।
सरकार और शिक्षा विभाग से उठ रहे ये अहम सवाल
पूर्वी सिंहभूम के स्कूल प्रभारी की शिकायत के बाद अब संबंधित अधिकारियों से कुछ सवालों का जवाब का इंतजार है
संबंधित विद्यालय को मध्याह्न भोजन की राशि किस अवधि से नहीं मिली है?
मुख्यमंत्री और शिक्षा मंत्री से हस्तक्षेप की मांग
मालूम हो कि राज्य में शिक्षा विभाग भी मुख्यमंत्री के जिम्मे हैं ऐसे में समस्या का त्वरित निष्पादन की आस लगाए बैठे है। जरूरी है कि झारखंड सरकार, स्कूली शिक्षा एवं साक्षरता विभाग और जिला शिक्षा अधीक्षक मामले का संज्ञान लेकर इन मामले का निष्पादन कराए। जिले के सरकारी स्कूलों में मध्याह्न भोजन मद की राशि, लंबित बिलों और विक्रेताओं के बकाये की वास्तविक स्थिति सार्वजनिक की जानी चाहिए।
जहां भुगतान लंबित रहने की स्थिति में जल्द भुगतान सुनिश्चित किया जाए। यदि नई व्यवस्था में तकनीकी या प्रक्रियागत समस्या है, तो उसे दूर करने के लिए विद्यालय प्रभारियों को स्पष्ट दिशा-निर्देश और आवश्यक सहायता उपलब्ध कराई जाए।
सरकारी प्रक्रिया का बोझ बच्चों पर क्यों
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि राशि के भुगतान में देरी का बोझ बच्चों के पोषण और विद्यालय प्रबंधन पर नहीं पड़ना चाहिए। शिक्षकों को ऐसी स्थिति में नहीं छोड़ा जाना चाहिए कि वे सरकारी योजना चलाने के लिए लगातार उधार लेने को मजबूर हों।
सवाल बड़ा है: जब बच्चों को नियमित मध्याह्न भोजन उपलब्ध कराना सरकार की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है, तो इसके संचालन के लिए जरूरी राशि समय पर क्यों नहीं पहुंच रही है?
अब देखना होगा कि पूर्वी सिंहभूम सहित राज्य के अन्य स्कूल प्रभारी की शिकायत पर शिक्षा विभाग क्या कार्रवाई करता है और लंबित भुगतान की समस्या का समाधान कब तक होता है।












