…जब हथकड़ी पहने बहन की डोली विदा करने पहुंचा इकलौता भाई मनीष, भाई की याचिका पर हाईकोर्ट का मानवीय रुख, विदाई में शामिल होने की दी इजाजत

Highcourt News : जेल में बंद कैदी को हाईकोर्ट ने बहन की शादी के लिए जमानत तो नहीं दी, लेकिन इतनी जरूर इजाजत दे दी, कि भाई अपने हाथों से बहन को डोली में विदा कर सके। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की तरफ से कैदी भाई को मिली इस इजाजत की अब हर जगह तारीफ हो रही है।
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने डकैती और आपराधिक साजिश के मामले में 10 साल की सजा काट रहे एक कैदी को उसकी सगी बहन की विदाई में शामिल होने की अनुमति देकर अदालत ने यह स्पष्ट किया कि अपराध की सजा अपनी जगह है, लेकिन पारिवारिक रिश्तों की गरिमा और सामाजिक परंपराओं का भी सम्मान किया जाना चाहिए।
हालांकि सुनवाई के दौरान सरकार की तरफ से भी संवेदनशीलता दिखायी गयी। सुनवाई के दौरान राज्य शासन की ओर से पैनल लॉयर ऋषिकेश शर्मा ने अंतरिम जमानत का कड़ा विरोध किया। उन्होंने दलील दी कि आरोपी धारा 397 जैसे बेहद गंभीर और हिंसक अपराध का सजायाफ्ता कैदी है, इसलिए उसे खुला नहीं छोड़ा जा सकता। हालांकि, उन्होंने मानवीय पक्ष को देखते हुए यह सुझाव दिया कि यदि अदालत उचित समझे, तो आरोपी को पुलिस अभिरक्षा में विदाई समारोह में शामिल होने भेजा जा सकता है।
हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति राधाकृष्ण अग्रवाल की एकलपीठ ने दुर्ग जिले के सुपेला निवासी मनीष बंसोर की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया। हालांकि अदालत ने अंतरिम जमानत देने से इनकार कर दिया, लेकिन पुलिस अभिरक्षा में बहन की विदाई की रस्म में शामिल होने की अनुमति देकर कानून और मानवीय संवेदनाओं के बीच संतुलन कायम किया।
रिकॉर्ड के अनुसार, सुपेला के कृष्णानगर निवासी 29 वर्षीय मनीष बंसोर को दुर्ग की विशेष अदालत ने 18 नवंबर 2025 को डकैती और आपराधिक साजिश के मामले में दोषी ठहराया था। अदालत ने उसे भारतीय दंड संहिता की धारा 120-बी के तहत सात वर्ष तथा धारा 397 के तहत 10 वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी। फिलहाल वह जेल में बंद है।
बहन की विदाई में भाई की मौजूदगी को माना महत्वपूर्ण
मनीष बंसोर वर्तमान में डकैती और आपराधिक साजिश के मामले में 10 वर्ष की सजा काट रहा है। मनीष की ओर से अधिवक्ता आदित्य भारद्वाज ने हाईकोर्ट में अंतरिम जमानत याचिका दाखिल करते हुए बताया कि उसकी सगी बहन का विवाह 29 जून 2026 को भिलाई के उमरपोटी स्थित श्री राधे-राधे पैलेस में संपन्न हुआ है और 30 जून को उसकी विदाई होनी है।
याचिका में कहा गया कि परिवार में मनीष के अलावा कोई दूसरा भाई नहीं है, जो बहन की विदाई और भाई की पारंपरिक रस्मों को निभा सके। ऐसे में मानवीय आधार पर कुछ दिनों की अंतरिम जमानत प्रदान की जाए।अदालत ने इस पहलू को गंभीरता से लिया और माना कि भारतीय समाज में बहन की विदाई केवल एक रस्म नहीं, बल्कि भावनात्मक और सांस्कृतिक महत्व का क्षण होता है। ऐसे अवसर पर भाई की भूमिका विशेष मानी जाती है।
अंतरिम जमानत नहीं, लेकिन संवेदनशील आदेश
मामले की गंभीरता को देखते हुए हाईकोर्ट ने आरोपी को अंतरिम जमानत देने से इनकार किया, ताकि कानून की प्रक्रिया प्रभावित न हो। वहीं दूसरी ओर अदालत ने यह भी सुनिश्चित किया कि एक बहन अपने जीवन के सबसे महत्वपूर्ण पल में अपने इकलौते भाई की मौजूदगी से वंचित न रहे।इसी संतुलन के तहत अदालत ने निर्देश दिया कि मनीष को पुलिस सुरक्षा में निर्धारित समय के लिए विवाह स्थल और विदाई समारोह में ले जाया जाए और रस्म पूरी होने के बाद उसे तत्काल वापस जेल भेज दिया जाए।
भाई-बहन के रिश्ते और रीति-रिवाजों के महत्व को समझा
जस्टिस राधाकृष्ण अग्रवाल ने दोनों पक्षों को सुनने और शादी कार्ड का अवलोकन करने के बाद भाई-बहन के रिश्ते और सामाजिक रीति-रिवाजों के महत्व को समझा। कोर्ट ने मनीष की अंतरिम जमानत तो मंजूर नहीं की, लेकिन उसे पुलिस अभिरक्षा में जाने की अनुमति दे दी।
सुबह 9 से शाम 5 बजे तक की मिली मोहलत
अदालत ने संबंधित जिला/केंद्रीय जेल के अधीक्षक और दुर्ग पुलिस अधीक्षक को निर्देश दिया है कि वे आवश्यक सुरक्षा इंतजामों के साथ मनीष बंसोर को 30 जून 2026 को सुबह 09:00 बजे से शाम 05:00 बजे तक (कुल 8 घंटे) पुलिस अभिरक्षा में भिलाई स्थित विवाह स्थल (श्री राधे-राधे पैलेस) लेकर जाएं, ताकि वह अपनी बहन की विदाई की रस्में पूरी कर सके। शाम 5 बजे रस्म खत्म होते ही पुलिस उसे तत्काल वापस जेल दाखिल कराएगी।
न्याय व्यवस्था का संवेदनशील चेहरा
यह फैसला केवल एक कैदी को मिली राहत नहीं, बल्कि न्यायपालिका के उस मानवीय दृष्टिकोण का उदाहरण है, जिसमें कानून की कठोरता के साथ संवेदनाओं को भी महत्व दिया जाता है। अदालत ने यह संदेश दिया कि सजा का उद्देश्य व्यक्ति को दंडित करना है, लेकिन उससे उसके मानवीय रिश्तों को पूरी तरह समाप्त नहीं किया जा सकता।छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का यह निर्णय न्याय व्यवस्था के उस मानवीय चेहरे को सामने लाता है, जहां कानून का सम्मान भी बना रहता है और परिवार की भावनाओं की गरिमा भी सुरक्षित रहती है।छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का मानवीय फैसला: सजायाफ्ता भाई को बहन की विदाई में शामिल होने की मिली अनुमति









