Young Cancer Risk: युवाओं व बच्चों में भी बढ़ रहा है कैंसर का खतरा? जानिए Gen Z और Millennials के लिए कैंसर क्यों होता जा रहा है खतरनाक
युवाओं में कुछ प्रकार के कैंसर के बढ़ते मामलों को लेकर चिंता बढ़ी है। जानिए कम उम्र में कैंसर के संभावित जोखिम कारक, लक्षण और बचाव के तरीके।
नई दिल्ली। कैंसर की बीमारी आज के दौर की सबसे घातक बीमारी में से एक है। इलाज की उपलब्धता के बावजूद इस बीमारी से मृत्यु दर काफी अधिक है। हैरानी की बात ये है कि इस बीमारी का शिकार इन दिनों ज्यादातर युवा हो रहे हैं। मेडिकल साइंस के मुताबिक उम्र बढ़ना कैंसर का एक महत्वपूर्ण जोखिम कारक जरूर है, लेकिन हाल के वर्षों में कुछ प्रकार के कैंसर कम उम्र के लोगों में भी अधिक दिखाई दे रहे हैं।
खासतौर पर कोलोरेक्टल यानी आंत और मलाशय के कैंसर को लेकर विशेषज्ञों की चिंता बढ़ी है।हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि हर युवा व्यक्ति को कैंसर का खतरा तेजी से बढ़ गया है या कैंसर अब मुख्य रूप से युवाओं की बीमारी बन गया है। उपलब्ध शोध कुछ खास कैंसर के कम उम्र में बढ़ने की प्रवृत्ति दिखाते हैं, जबकि इसके कारण अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं हैं।
युवाओं में कैंसर को लेकर क्या कहते हैं आंकड़े?
कुछ अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों में 50 वर्ष से कम उम्र के लोगों में कई प्रकार के कैंसर की दर बढ़ने की प्रवृत्ति सामने आई है। विशेष रूप से कोलोरेक्टल कैंसर को लेकर यह ट्रेंड काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
भारत में भी कैंसर का निदान कई पश्चिमी देशों की तुलना में कम उम्र में होने की बात सामने आई है। कैंसर विशेषज्ञ डाक्टर प्राची ठक्कर के अनुसार, भारत में ब्रेस्ट कैंसर का औसत निदान आयु लगभग 52 वर्ष है, जबकि अमेरिका और यूरोप में यह करीब 63 वर्ष बताई गई है। इसी तरह Apollo के आंकड़ों में फेफड़ों के कैंसर की औसत निदान आयु 59 वर्ष रही, जबकि पश्चिमी देशों में यह करीब 70 वर्ष बताई गई।
Apollo के अस्पतालों में कोलन कैंसर के करीब 30 प्रतिशत मरीज 50 वर्ष से कम उम्र के पाए गए। हालांकि, ये आंकड़े अस्पताल में इलाज कराने वाले मरीजों के हैं और इन्हें पूरी भारतीय आबादी का प्रतिनिधि आंकड़ा नहीं माना जा सकता।
युवाओं में कैंसर बढ़ने की वजह क्या है?
कैंसर का कोई एक कारण नहीं होता। उम्र, आनुवंशिकता, जीवनशैली, पर्यावरणीय संपर्क और कई अन्य कारक मिलकर जोखिम को प्रभावित कर सकते हैं। इसलिए यह कहना कि केवल मोबाइल, तनाव या किसी एक खाद्य पदार्थ की वजह से युवाओं में कैंसर बढ़ रहा है, वैज्ञानिक रूप से सही नहीं होगा।
1. मोटापा और असंतुलित खान-पान
बढ़ता हुआ मोटापा कई प्रकार के कैंसर के जोखिम से जुड़ा हुआ है। अत्यधिक वजन शरीर में लंबे समय तक सूजन और हार्मोनल बदलाव पैदा कर सकता है, जो कुछ कैंसर के जोखिम को प्रभावित करते हैं।
आज की जीवनशैली में अत्यधिक अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड, मीठे पेय, अधिक कैलोरी और कम शारीरिक गतिविधि चिंता का विषय हैं। Apollo की हालिया स्वास्थ्य रिपोर्ट में भी युवा भारतीयों में वजन, मेटाबॉलिक स्वास्थ्य और शारीरिक गतिविधि से जुड़ी समस्याएं सामने आई हैं। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि प्रोसेस्ड फूड खाने वाला हर व्यक्ति कैंसर से पीड़ित होगा। जोखिम कई कारकों के संयुक्त प्रभाव से बनता है।
2. धूम्रपान और शराब
धूम्रपान कैंसर के सबसे स्थापित और महत्वपूर्ण रोकथाम योग्य जोखिम कारकों में शामिल है। यह फेफड़ों के अलावा मुंह, गले, अन्ननली और कई अन्य अंगों के कैंसर का खतरा बढ़ाता है।
इसी तरह शराब का सेवन भी कई प्रकार के कैंसर से जुड़ा है। शरीर शराब को तोड़ते समय एसिटैल्डिहाइड बनाता है, जो कोशिकाओं और DNA को नुकसान पहुंचा सकता है।इसलिए कम उम्र से ही धूम्रपान और शराब से दूरी बनाना कैंसर के जोखिम को कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
3. नींद और तनाव ?
आज के युवाओं में देर रात तक जागना, अनियमित नींद और लंबे समय तक स्क्रीन इस्तेमाल करना आम हो गया है। पर्याप्त नींद शरीर की सामान्य कार्यप्रणाली और मानसिक स्वास्थ्य के लिए जरूरी है।लेकिन यहां एक जरूरी बात समझना चाहिए—यह दावा कि मोबाइल की नीली रोशनी सीधे ट्यूमर कोशिकाओं को सक्रिय कर देती है या नींद की कमी अकेले कैंसर पैदा करती है, अभी स्थापित वैज्ञानिक तथ्य नहीं है।नींद की कमी और लंबे समय का तनाव स्वास्थ्य पर नकारात्मक असर डाल सकते हैं, लेकिन उन्हें कैंसर का सीधा और एकमात्र कारण बताना सही नहीं होगा।
4. आनुवंशिक कारण भी हो सकते हैं
कैंसर के कुछ मामलों में परिवार का इतिहास महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। अगर परिवार में कम उम्र में किसी खास प्रकार का कैंसर हुआ है तो व्यक्ति का जोखिम सामान्य आबादी से अधिक हो सकता है।कुछ आनुवंशिक बदलाव, जैसे BRCA1/BRCA2 या Lynch syndrome से जुड़े बदलाव, कुछ कैंसर का जोखिम बढ़ा सकते हैं।ऐसे मामलों में डॉक्टर से जेनेटिक काउंसलिंग और उचित स्क्रीनिंग के बारे में सलाह लेना महत्वपूर्ण हो सकता है।
5. पर्यावरण और प्रदूषण भी चिंता का विषय
वायु प्रदूषण, कुछ औद्योगिक रसायनों और लंबे समय तक कुछ हानिकारक पदार्थों के संपर्क को भी कैंसर के जोखिम से जोड़ा गया है।प्लास्टिक और माइक्रोप्लास्टिक्स को लेकर भी काफी चर्चा है, लेकिन माइक्रोप्लास्टिक्स को सीधे मनुष्यों में कैंसर का स्थापित कारण बताना अभी जल्दबाजी होगी। इस क्षेत्र में शोध जारी है।
गर्भावस्था में ली गई दवाओं वाला दावा कितना सही?
गर्भावस्था के दौरान कुछ दवाओं के इस्तेमाल और बाद में बच्चों में कैंसर के जोखिम को लेकर कुछ शोध जरूर हुए हैं। लेकिन किसी एक दवा को सामान्य रूप से “बच्चों में भविष्य में कैंसर का कारण” बताना उचित नहीं है।गर्भावस्था में कोई भी दवा डॉक्टर की सलाह के बिना बंद या शुरू नहीं करनी चाहिए। मां और बच्चे के स्वास्थ्य के लिए दवा का जोखिम और लाभ चिकित्सक ही बेहतर तरीके से तय कर सकते हैं।
क्या युवाओं को कैंसर की स्क्रीनिंग करानी चाहिए?
हर 20-30 साल के स्वस्थ व्यक्ति को बिना किसी जोखिम या लक्षण के सभी प्रकार के कैंसर की जांच कराने की जरूरत नहीं होती। स्क्रीनिंग की उम्र और तरीका कैंसर के प्रकार, परिवार के इतिहास और व्यक्तिगत जोखिम पर निर्भर करता है।लेकिन शरीर में कोई असामान्य और लगातार बना रहने वाला बदलाव हो तो उसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
जैसे—
• बिना वजह लगातार वजन कम होना
• शरीर में नई गांठ या सूजन
• लंबे समय तक रहने वाली खांसी या आवाज में बदलाव
• मल में खून आना
• लगातार पेट की परेशानी या मल त्याग की आदत में बदलाव
• असामान्य रक्तस्राव
• ऐसा घाव जो लंबे समय तक ठीक न हो
• लगातार और अस्पष्ट थकान
इनमें से कोई लक्षण कैंसर होने का प्रमाण नहीं है, लेकिन लगातार बने रहने पर डॉक्टर से जांच कराना जरूरी है।
कैंसर से बचाव के लिए क्या करें?
कैंसर के हर मामले को रोका नहीं जा सकता, लेकिन कई ज्ञात जोखिमों को कम किया जा सकता है।
अपनाएं ये आदतें:
• धूम्रपान और तंबाकू से पूरी तरह दूर रहें।
• शराब का सेवन न करना सबसे सुरक्षित विकल्प है।
• वजन को स्वस्थ सीमा में रखने की कोशिश करें।
• फल, सब्जियां, साबुत अनाज और फाइबर युक्त भोजन को प्राथमिकता दें।
• अत्यधिक प्रोसेस्ड और बहुत ज्यादा कैलोरी वाले खाद्य पदार्थ सीमित करें।
• नियमित शारीरिक गतिविधि करें।
• पर्याप्त और नियमित नींद लें।
• HPV और हेपेटाइटिस-B टीकाकरण के बारे में डॉक्टर से सलाह लें।
• परिवार में कैंसर का इतिहास हो तो चिकित्सक से व्यक्तिगत जोखिम और स्क्रीनिंग पर चर्चा करें।
• शरीर में लगातार बने रहने वाले असामान्य बदलाव को नजरअंदाज न करें।
सबसे जरूरी बात: डर नहीं, जागरूकता जरूरी
युवाओं में कुछ कैंसर की बढ़ती दर निश्चित रूप से चिंता का विषय है, लेकिन इसे लेकर डर फैलाने की जरूरत नहीं है। कैंसर का मतलब हमेशा मौत नहीं होता और कम उम्र में होने वाले हर लक्षण का मतलब कैंसर भी नहीं है।
सबसे महत्वपूर्ण है स्वस्थ जीवनशैली, जोखिम वाले व्यवहारों से दूरी, परिवार में कैंसर के इतिहास की जानकारी और जरूरत पड़ने पर समय पर चिकित्सकीय जांच।भारत में कम उम्र में कैंसर निदान को लेकर उपलब्ध आंकड़े यह जरूर बताते हैं कि जागरूकता और समय पर जांच की भूमिका और महत्वपूर्ण हो गई है।
Disclaimer: यह लेख सामान्य स्वास्थ्य जानकारी के लिए है। कैंसर का जोखिम हर व्यक्ति में अलग होता है। किसी लक्षण, पारिवारिक इतिहास या दवा से जुड़े सवाल के लिए योग्य डॉक्टर या कैंसर विशेषज्ञ से सलाह लें।












