बर्खास्तगी पर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला : Bank of India अधिकारी की बर्खास्तगी रद्द, झारखंड हाईकोर्ट ने आठ हफ्ते का दिया वक्त, जानें पूरा मामला
झारखंड हाईकोर्ट ने Bank of India अधिकारी राज कुमार की सेवा से हटाने की सजा रद्द कर दी। कोर्ट ने प्राकृतिक न्याय के उल्लंघन पर सजा बदलकर दो वेतनवृद्धि रोकने का आदेश दिया।

रांची। झारखंड हाईकोर्ट ने बर्खास्तगी मामले में बड़ा फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट ने बर्खास्त कर्मचारी को दो महीने के भीतर बहाल करने का आदेश दिया है। पूरा मामला बैंक कर्मचारी से जुड़ा है। हाईकोर्ट ने दायर याचिका पर Bank of India के अधिकारी राज कुमार को बड़ी राहत दी है। जस्टिस दीपक रोशन की अदालत ने उन्हें सेवा से हटाने के बैंक के फैसले और अपीलीय आदेश को रद्द कर दिया।
अदालत ने माना कि विभागीय जांच की प्रक्रिया में प्राकृतिक न्याय के जरूरी सिद्धांतों का पालन नहीं हुआ था।हाईकोर्ट ने अधिकारी को नौकरी से हटाने की सजा के स्थान पर दो वार्षिक वेतनवृद्धि संचयी प्रभाव के साथ रोकने का दंड निर्धारित किया है। साथ ही बैंक को आदेश दिया गया है कि वह आठ सप्ताह के भीतर अधिकारी को सेवा में वापस लेकर उन्हें नियमानुसार सभी परिणामी लाभ प्रदान करे।
विभागीय कार्रवाई की वजह क्या थी?
राज कुमार Bank of India में अधिकारी के पद पर कार्यरत थे। वर्ष 2024 में बैंक ने उनके खिलाफ विभागीय कार्रवाई शुरू की थी। उन पर बोकारो की विभिन्न शाखाओं में कार्यरत रहने के दौरान ऋण स्वीकृति और उसकी निगरानी से संबंधित प्रक्रियाओं में अनियमितता के आरोप लगाए गए थे।
आरोपों में एक ऐसा हाउसिंग लोन भी शामिल था, जो उनकी पत्नी से जुड़े प्रोजेक्ट से संबंधित था। इसके अलावा कुछ उधारकर्ताओं को अनुचित लाभ पहुंचाने और एक ही संपत्ति के आधार पर दो अलग-अलग ऋण से जुड़े मामलों को लेकर भी बैंक ने आपत्तियां उठाई थीं।
आरोपपत्र के बाद उसी दिन खत्म कर दी गई जांच
बैंक की ओर से 23 अप्रैल 2024 को आरोपपत्र जारी किया गया था। इसके बाद 26 जुलाई 2024 को प्रारंभिक सुनवाई हुई। इस दौरान राज कुमार से आरोपों के संबंध में उनका पक्ष पूछा गया।इसी दौरान उनके द्वारा दिए गए पत्र को जांच अधिकारी ने आरोपों की स्वीकारोक्ति के तौर पर लिया। इसके बाद उसी दिन विभागीय जांच को समाप्त करते हुए आरोपों को सिद्ध मान लिया गया।बैंक ने इसी आधार पर 4 अक्टूबर 2024 को सेवा से हटाने की सजा दी। बाद में अपीलीय प्राधिकारी ने भी इस फैसले को बरकरार रखा।
हाईकोर्ट ने पत्र की अलग व्याख्या की
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने 26 जुलाई के उस पत्र को महत्वपूर्ण माना, जिसके आधार पर विभागीय जांच पूरी की गई थी।अदालत के अनुसार, अधिकारी ने पत्र में कुछ तथ्यों को स्वीकार किया था, लेकिन साथ ही यह भी स्पष्ट किया था कि उन्होंने किसी निजी लाभ के उद्देश्य से काम नहीं किया। उन्होंने यह भी कहा था कि संबंधित ऋण वास्तविक थे और उनके कार्य बैंक के हित में थे।ऐसे में अदालत ने माना कि इस पत्र को बिना शर्त और स्पष्ट दोष स्वीकार करने वाला बयान नहीं माना जा सकता।
सबूत और गवाहों की प्रक्रिया नहीं अपनाई गई
हाईकोर्ट ने विभागीय जांच की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाया। अदालत ने कहा कि केवल अधिकारी के पत्र के आधार पर जांच खत्म कर देना पर्याप्त नहीं था।अदालत के मुताबिक, मामले में साक्ष्य प्रस्तुत करने, गवाहों से जिरह कराने और संबंधित दस्तावेजों की औपचारिक जांच जैसी प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए थी। इन प्रक्रियाओं के बिना उसी दिन जांच समाप्त करना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप नहीं था।
दूसरे अधिकारी को मिली कम सजा का भी जिक्र
सुनवाई के दौरान राज कुमार की ओर से यह दलील भी दी गई कि उन्हीं लेनदेन से जुड़े एक अन्य अधिकारी दिव्या किरण टोप्पो को केवल एक वेतनवृद्धि रोकने की सजा दी गई थी।इसके विपरीत राज कुमार को नौकरी से ही हटा दिया गया था। हाईकोर्ट ने इस अंतर को भी अपने आदेश में महत्वपूर्ण माना और कहा कि समान परिस्थितियों में दंड की समानता का सिद्धांत ध्यान में रखा जाना चाहिए।अदालत ने सेवा से हटाने की सजा को मामले की परिस्थितियों में अनुपातहीन माना।
बर्खास्तगी के बजाय अब दो वेतनवृद्धि रोकने की सजा
हाईकोर्ट ने अपने अंतिम आदेश में राज कुमार को सेवा से हटाने के निर्णय और अपीलीय आदेश को निरस्त कर दिया। हालांकि अदालत ने विभागीय कार्रवाई को पूरी तरह समाप्त नहीं किया और सेवा से हटाने की सजा को बदलते हुए दो वार्षिक वेतनवृद्धि संचयी प्रभाव के साथ रोकने का दंड तय किया।बैंक को निर्देश दिया गया है कि वह आठ सप्ताह के भीतर राज कुमार को सेवा में बहाल करे और आदेश के अनुसार उन्हें सभी परिणामी सेवा लाभ प्रदान करे।











