जानिये झारखंड का सबसे खतरनाक नक्सलियों कैसे बन गया अनल दा, जेल से निकलने के बाद मिला प्रमोशन, 1 करोड़ के ईनामी अनल उर्फ गोपाल दा की पूरी कहानी
Learn how Anal Da became Jharkhand's most dangerous Naxalite, received a promotion after his release from jail, and the full story of Anal alias Gopal Da, who carries a bounty of Rs 1 crore.

Naxali Anal Da Biography In Hindi : 22 जनवरी की तारीख झारखंड के नक्सल इतिहास के लिए सबसे कामयाबी भरी तारीख रही। घनघोर जंगल में पुलिस और नक्सलियों के बीच हुई गोलीबारी में ना सिर्फ एक करोड़ का ईनामी नक्सली अनल दा मारा गया, बल्कि उसके साथ उसकी पूरी बटालियन भी खत्म हो गयी। अब तक जो जानकारी है, उसके मुताबिक 14 से 15 नक्सली मारे गये हैं। हालांकि वास्तविक आंकड़े जवानों के लौटने के बाद ही सामने आ पायेगा।
पूरी घटना चाईबासा स्थित सारंडा जंगल की है, जहां सुरक्षाबलों और नक्सलियों के बीच हुई मुठभेड़ में भाकपा (माओवादी) का कुख्यात केंद्रीय कमेटी सदस्य नक्सली अनल दा मारा गया। अनल दा पर एक करोड़ रुपये का इनाम घोषित था और वह झारखंड–बिहार में नक्सली रणनीति का प्रमुख चेहरा माना जाता था। अनल दा बिहार-झारखंड के टॉप कमांडरों में से एक था, जो जवानों के हिट लिस्ट में सबसे ऊपर था।
चाईबासा के घने सारंडा जंगल में सुरक्षाबलों के साथ हुई मुठभेड़ में कुख्यात नक्सली अनल दा उर्फ तूफान उर्फ पतिराम मांझी उर्फ पतिराम मरांडी उर्फ रमेश मारा गया। ये नक्सलियों के दो दशक की खौफनाक कहानी का अंत है। जानते हैं कि आखिर नक्सलियों के लिए अनल दा का मारा जाना क्यों इतना बड़ा झटका है। वहीं पुलिस के लिए क्यों इतनी बड़ी सफलता है।
दरअसल नक्सली अनल दा भाकपा (माओवादी) संगठन की केंद्रीय कमेटी का प्रमुख सदस्य था और उस पर एक करोड़ रुपये का इनाम घोषित था। उसकी मौत को झारखंड में नक्सल नेटवर्क के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है। सुरक्षा सूत्रों के अनुसार, लंबे समय से खुफिया एजेंसियों को सारंडा जंगल में अनल दा की मौजूदगी की जानकारी मिल रही थी। इसी आधार पर सुरक्षाबलों ने संयुक्त अभियान चलाया।
तलाशी अभियान के दौरान नक्सलियों ने फायरिंग शुरू कर दी, जिसके बाद दोनों ओर से मुठभेड़ हुई। इसी मुठभेड़ में अनल दा मारा गया। मुठभेड़ के बाद इलाके में सघन सर्च ऑपरेशन चलाया गया, ताकि उसके अन्य सहयोगियों का पता लगाया जा सके।गिरिडीह जिले के पीरटांड़ थाना क्षेत्र का रहने वाला अनल दा नक्सली गतिविधियों में 1987 से सक्रिय था। उसने झारखंड और बिहार के कई जिलों में नक्सलवाद को संगठित करने में अहम भूमिका निभाई। सुरक्षा एजेंसियों के मुताबिक, अनल दा को माओवादी संगठन का रणनीतिकार माना जाता था, जो बड़े हमलों की योजना बनाने और उन्हें अंजाम तक पहुंचाने में माहिर था। इसी वजह से वह लंबे समय से सुरक्षाबलों के रडार पर था।
पीरटांड़–टुंडी–तोपचांद इलाके में “गोपाल दा” के नाम से खौफ
1987 से 2000 के बीच अनल दा ने पीरटांड़, टुंडी और तोपचांद इलाकों में “गोपाल दा” के नाम से अपनी पहचान बनाई। इस दौर में उसने नक्सली संगठन को मजबूत आधार दिया और कई हिंसक घटनाओं का नेतृत्व किया। पुलिस और प्रशासन के साथ-साथ आम ग्रामीणों में भी उसका खौफ था। इसी समय झारखंड के इस क्षेत्र में नक्सलवाद अपने चरम पर पहुंचा।
जमुई में गिरफ्तारी, जेल और फिर वापसी
साल 2000 के आसपास संगठन ने अनल दा को बिहार के जमुई क्षेत्र में सक्रिय किया। वहां वह एक बार गिरफ्तार भी हुआ। गिरफ्तारी के बाद उसे गिरिडीह जेल भेजा गया। हालांकि, जमानत पर रिहा होने के बाद उसने एक बार फिर नक्सली गतिविधियां शुरू कर दीं और संगठन में उसका कद और भी बढ़ता चला गया।
रांची–गुमला की कमान और केंद्रीय कमेटी में जगह
जेल से बाहर आने के बाद अनल दा को रांची और गुमला जिलों की कमान सौंपी गई। यहां उसने संगठन को नए सिरे से मजबूत किया और कई रणनीतिक फैसलों में अहम भूमिका निभाई। उसके प्रभाव और अनुभव को देखते हुए भाकपा (माओवादी) की केंद्रीय कमेटी में उसे शामिल किया गया। विशेषज्ञों का मानना है कि वह झारखंड में नक्सली गतिविधियों का मुख्य सूत्रधार था।
नक्सली अनल दा की मौत को सुरक्षाबलों की बड़ी सफलता माना जा रहा है। माना जा रहा है कि इससे झारखंड में माओवादी नेटवर्क को गहरा झटका लगेगा, हालांकि सुरक्षा एजेंसियां सतर्क हैं और आशंका जता रही हैं कि संगठन बदले की कार्रवाई की कोशिश कर सकता है। इसी को देखते हुए सारंडा और आसपास के इलाकों में सुरक्षा बढ़ा दी गई है।








