JTET 2026 में भाषा विवाद गहराया: झारखंडी भाषाओं को प्राथमिकता देने की मांग तेज, भोजपुरी-मगही-अंगिका पर नहीं बनी सहमति
JTET 2026 language controversy deepens: Demands for Jharkhandi languages gain priority, no consensus reached on Bhojpuri, Magahi, and Angika

रांची। झारखंड शिक्षक पात्रता परीक्षा (JTET) 2026 और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में स्थानीय भाषाओं को प्राथमिकता देने तथा गैर-झारखंडी भाषाओं को विषय सूची से हटाने की मांग एक बार फिर तेज हो गई है। शुक्रवार को इसी मुद्दे पर रांची स्मार्ट सिटी स्थित मंत्री योगेंद्र प्रसाद के आवास पर महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई। सूत्रों के मुताबिक बैठक में खोरठा साहित्य संस्कृति परिषद् सहित कई भाषाई संगठनों और भाषाविदों ने हिस्सा लिया।
इस दौरान भोजपुरी, मगही और अंगिका जैसी भाषाओं को लेकर तीखी चर्चा हुई, लेकिन सूत्रों के अनुसार इन भाषाओं को शामिल करने के मुद्दे पर सहमति नहीं बन सकी। मिली जानकारी के मुताबिक जेटेट 2026 में भाषा विवाद को सुलझाने के लिए राज्य सरकार ने पांच मंत्रियों की उच्च स्तरीय समिति बनाई है। शुक्रवार को समिति की दूसरी बैठक वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर की अध्यक्षता में हुई। बैठक में मंत्री दीपिका पांडेय सिंह, संजय प्रसाद यादव, सुदिव्य कुमार सोनू और योगेंद्र प्रसाद भी मौजूद रहे।
बैठक के दौरान झारखंड की स्थानीय और जनजातीय भाषाओं के संरक्षण, संवर्धन और प्रतियोगी परीक्षाओं में उनके महत्व पर विस्तार से चर्चा की गई। प्रतिनिधियों ने कहा कि झारखंड की सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करने के लिए स्थानीय भाषाओं को प्राथमिकता देना जरूरी है। उनका मानना है कि इससे राज्य के मूल निवासियों और ग्रामीण क्षेत्रों के विद्यार्थियों को प्रतियोगी परीक्षाओं में बेहतर अवसर मिलेंगे।
खोरठा साहित्य संस्कृति परिषद् के कार्यकारी अध्यक्ष डॉ. बीएन ओहदार के नेतृत्व में पहुंचे प्रतिनिधिमंडल ने सरकार के समक्ष कई तर्क रखे। बैठक में राधा गोबिंद विश्वविद्यालय के खोरठा विभागाध्यक्ष अनाम ओहदार, दुबराज महतो, अधिवक्ता विक्की कुमार साव सहित कई भाषाविद और सामाजिक कार्यकर्ता शामिल हुए। प्रतिनिधियों ने कहा कि झारखंड की प्रतियोगी परीक्षाओं में खोरठा, नागपुरी, कुरमाली, पंचपरगनिया और जनजातीय भाषाओं को मजबूत स्थान दिया जाना चाहिए।
बैठक का सबसे बड़ा मुद्दा भोजपुरी, मगही, अंगिका, मैथिली, उड़िया, बांग्ला और उर्दू जैसी भाषाओं को जेटेट और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं की विषय सूची से हटाने की मांग रही। भाषाविदों ने दावा किया कि ये भाषाएं झारखंड की मूल भाषाएं नहीं हैं और राज्य की अलग सांस्कृतिक पहचान से इनका सीधा संबंध नहीं है।
प्रतिनिधियों ने तर्क दिया कि झारखंड राज्य का गठन बिहार से सांस्कृतिक और भाषाई भिन्नता के आधार पर हुआ था। ऐसे में राज्य की पहचान को मजबूत करने के लिए यहां की मूल भाषाओं को प्राथमिकता देना आवश्यक है। उनका कहना था कि झारखंड की असली सांस्कृतिक अभिव्यक्ति स्थानीय भाषाओं और जनजातीय परंपराओं के माध्यम से ही संभव है।
बैठक में पलामू प्रमंडल की भाषाई पहचान को लेकर भी चर्चा हुई। प्रतिनिधियों ने कहा कि पलामू क्षेत्र की मूल भाषा “पलमुआ” है, जो खोरठा और नागपुरी का क्षेत्रीय स्वरूप मानी जाती है। उनका कहना था कि इस भाषा पर भोजपुरी और मगही का प्रभाव जरूर है, लेकिन इसे पूरी तरह भोजपुरी या मगही कहना उचित नहीं होगा। उन्होंने यह भी बताया कि पलामू क्षेत्र में खोरठा के क्षेत्रीय स्वरूप को “देसवाली” नाम से जाना जाता है।
भाषाविदों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने झारखंड आंदोलन का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि भोजपुरी, मगही और अंगिका जैसी भाषाओं की झारखंड आंदोलन में कोई विशेष भूमिका नहीं रही। प्रतिनिधियों का दावा था कि इन भाषाओं में आंदोलन से जुड़ी कोई प्रमुख साहित्यिक रचना उपलब्ध नहीं है। साथ ही उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ समूह केवल जेटेट जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं के समय ही इन भाषाओं का मुद्दा उठाते हैं, जिससे नियुक्ति प्रक्रियाओं को प्रभावित करने की कोशिश होती है।
बैठक के अंत में मंत्री योगेंद्र प्रसाद ने प्रतिनिधिमंडल को आश्वासन दिया कि सभी सुझावों और मांगों को उच्च स्तरीय समिति के समक्ष रखा जाएगा। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार स्थानीय भाषा और संस्कृति के संरक्षण को लेकर गंभीर है और मूल निवासियों के हितों की रक्षा के लिए उचित निर्णय लेने पर विचार किया जाएगा।









