दिल्ली में नौकरी करती है बेटी, भाई है पारा शिक्षक… 55 जवानों के हत्यारे मिसिर बेसरा की अनसुनी कहानी
2.20 करोड़ के इनामी माओवादी मिसिर बेसरा की गिरफ्तारी के बाद उसकी अनसुनी कहानी सामने आई है। बेटी दिल्ली में नौकरी करती है, भाई पारा शिक्षक है, लेकिन मिसिर ने चार दशक तक माओवादी संगठन का साथ नहीं छोड़ा।

रांची। मिसिर बेसरा की खौफ की सल्तनत अब खत्म हो गयी है। करीब चार दशक तक जंगलों में माओवादी नेटवर्क खड़ा करने वाला, करोड़ों रुपये का इनामी और सुरक्षा एजेंसियों की मोस्ट वांटेड सूची में शामिल मिसिर बेसरा गिरफ्तारी के साथ माओवाद संगठन में आखिरी कील भी ठुक गयी है। मिसिर बेसरा, बंदूक और बारूदी सुरंगों के पीछे छिपे इस चेहरे की एक ऐसी कहानी भी है, जो कम ही लोगों को पता है।
एक तरफ उसका नाम 55 सुरक्षाकर्मियों की शहादत, आईईडी ब्लास्ट और बड़े नक्सली हमलों से जुड़ा रहा, वहीं दूसरी ओर उसकी बेटी दिल्ली में नौकरी कर सामान्य जीवन जी रही है और उसका भाई सरकारी स्कूल में पारा शिक्षक है।
बेटी दिल्ली में नौकरी करती है, भाई पढ़ाता है बच्चों को
मिसिर बेसरा झारखंड के गिरिडीह जिले के पीरटांड थाना क्षेत्र के मदनडीह गांव का रहने वाला है। उसने स्नातक तक पढ़ाई की थी और हिंदी, संथाली तथा हो भाषा का अच्छा जानकार था।उसके परिवार में पत्नी, एक बेटा और एक बेटी हैं। 27 वर्षीय बेटी दिल्ली में नौकरी करती है, जबकि उसका भाई देवी लाल बेसरा झारखंड में पारा शिक्षक है।
परिवार के पास लगभग तीन एकड़ कृषि भूमि और एक साधारण खपरैल मकान बताया जाता है। जानकारी के मुताबिक परिवार ने वर्षों पहले ही मिसिर बेसरा के रास्ते से खुद को अलग कर लिया था और सामान्य जीवन जीने का विकल्प चुना।
छात्र जीवन से उठाया लाल झंडा, फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा
जांच एजेंसियों के अनुसार, छात्र जीवन में ही वह वामपंथी विचारधारा से प्रभावित हो गया था। वर्ष 1986 में उसने माओवादी संगठन की प्राथमिक सदस्यता ली और धीरे-धीरे संगठन के सबसे भरोसेमंद नेताओं में शामिल हो गया।
• 1997 में दक्षिणी छोटानागपुर कमेटी के गठन में अहम भूमिका निभाई।
• 2000 में झारखंड रीजनल कमेटी के गठन में सक्रिय रहा।
• बुंडू क्षेत्र में पहला सशस्त्र नक्सली दस्ता तैयार कराया।
• 2003 में केंद्रीय कमेटी का सदस्य बना।
• 2004 में माओवादी संगठनों के विलय के बाद उसे सैन्य कमान की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी मिली।
सारंडा, कोल्हान, पारसनाथ, ओडिशा और पश्चिम बंगाल उसके प्रमुख ऑपरेशन क्षेत्र रहे।
55 जवानों की शहादत से जुड़ा नाम
सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार, 2003-04 में पश्चिम सिंहभूम के बिटकिलसोय और बलिबा क्षेत्र में हुए आईईडी विस्फोट की साजिश में मिसिर बेसरा की अहम भूमिका थी। इन हमलों में 55 सुरक्षाकर्मी शहीद हुए थे।इसके अलावा उस पर हत्या, आईईडी ब्लास्ट, पुलिस बलों पर हमले, हथियार अधिनियम और नक्सली हिंसा से जुड़े 141 से अधिक मामले दर्ज बताए जाते हैं।
लखीसराय कोर्ट हमला और जेलब्रेक का मास्टरमाइंड
मिसिर बेसरा को वर्ष 2007 में गिरफ्तार किया गया था, लेकिन 2009 में बिहार के लखीसराय कोर्ट परिसर पर हुए नक्सली हमले के दौरान उसे छुड़ा लिया गया। इसके बाद वह फिर जंगलों में लौट गया और संगठन का शीर्ष रणनीतिकार बन गया।
जांच एजेंसियों के मुताबिक गिरिडीह और आसपास के क्षेत्रों में हुई कई बड़ी नक्सली घटनाओं के पीछे भी उसकी भूमिका रही।
परिवार ने चुनी मुख्यधारा, लेकिन मिसिर ने नहीं छोड़ा जंगल
बताया जाता है कि वर्षों के दौरान परिवार के लोगों ने सामान्य जीवन अपनाया। उसकी बेटी नौकरी करने लगी, भाई शिक्षक बन गया और पत्नी भी उससे अलग रहने लगी। इसके बावजूद मिसिर बेसरा ने हथियार नहीं छोड़े और लगातार संगठन की गतिविधियों में सक्रिय बना रहा।
गिरफ्तारी के बाद कमजोर पड़ा माओवादी नेटवर्क
सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि मिसिर बेसरा की गिरफ्तारी माओवादी संगठन के लिए बड़ा झटका है। उसके पकड़े जाने के बाद बीजापुर में आठ नक्सलियों ने आत्मसमर्पण भी किया, जिनमें पांच महिला माओवादी शामिल हैं। इन सभी पर कुल 49 लाख रुपये का इनाम घोषित था।
अब अगला निशाना कौन?
सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार, माओवादी संगठन के बचे हुए शीर्ष नेताओं पर भी लगातार नजर रखी जा रही है। मीडिया रिपोर्टों में दावा किया जा रहा है कि अब एजेंसियों का फोकस संगठन के अन्य वरिष्ठ नेताओं पर है। हालांकि, इस संबंध में सुरक्षा एजेंसियों ने आधिकारिक रूप से कोई विस्तृत जानकारी सार्वजनिक नहीं की है।








