झारखंड हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: बिना अधिकार दुकान तोड़ी, सरकार को 5.25 लाख मुआवजा देने का आदेश, DC को सौंपी व्यक्तिगत जिम्मेदारी
झारखंड हाईकोर्ट ने चतरा में बिना कानूनी अधिकार दुकान तोड़ने के मामले में राज्य सरकार की अपील खारिज कर दी। कोर्ट ने 5.25 लाख रुपये मुआवजा देने और एक सप्ताह में राशि जमा कराने का आदेश देते हुए चतरा DC को व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार ठहराया।

रांची। झारखंड हाईकोर्ट ने सरकारी अधिकारियों की मनमानी कार्रवाई पर सख्त रुख अपनाते हुए राज्य सरकार की अपील खारिज कर दी है। चतरा जिले में एक व्यक्ति की दुकान तोड़े जाने के मामले में हाईकोर्ट की खंडपीठ ने स्पष्ट कहा कि बिना कानूनी अधिकार किसी की संपत्ति को ध्वस्त करना सत्ता का दुरुपयोग है। अदालत ने राज्य सरकार को एक सप्ताह के भीतर 5.25 लाख रुपये हाईकोर्ट में जमा करने का निर्देश दिया है और इस आदेश के पालन की व्यक्तिगत जिम्मेदारी चतरा के उपायुक्त (DC) को सौंपी है।
क्या है पूरा मामला?
दरअसल यह मामला चतरा जिले के राजेंद्र प्रसाद साहू उर्फ राजेंद्र प्रसाद शौंडिक की दुकान से जुड़ा है। उन्होंने आरोप लगाया था कि सरकारी अधिकारियों ने बिना वैधानिक प्रक्रिया अपनाए उनकी दुकान को तोड़ दिया। इस मामले में पहले हाईकोर्ट की एकलपीठ ने वर्ष 2024 में सरकार की कार्रवाई को मनमाना बताते हुए पीड़ित को मुआवजा देने का आदेश दिया था।
हालांकि, राज्य सरकार ने इस फैसले को चुनौती देते हुए लेटर पेटेंट अपील (LPA) दायर की, लेकिन अब मुख्य न्यायाधीश एमएस सोनक और जस्टिस राजेश शंकर की खंडपीठ ने सरकार की दलीलों को खारिज कर दिया।
हाईकोर्ट ने सरकार को क्यों लगाई फटकार?
इस मामले में सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि किसी भी सरकारी एजेंसी को कानून से ऊपर नहीं माना जा सकता। यदि किसी भवन को हटाना है तो उसके लिए निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन अनिवार्य है।
कोर्ट ने कहा कि इस मामले में अधिकारियों ने बिना वैध अधिकार के दुकान तोड़ दी, जो नागरिक के संपत्ति अधिकारों का उल्लंघन है। ऐसे मामलों में सरकारी शक्ति का मनमाना इस्तेमाल स्वीकार नहीं किया जा सकता।
13 साल बाद सरकार लाई पुराने दस्तावेज
अपील के दौरान राज्य सरकार ने दावा किया कि जिस जमीन पर दुकान बनी थी, उसका अधिग्रहण वर्ष 1914 में ही हो चुका था। इसके समर्थन में पुराने दस्तावेज भी पेश किए गए। लेकिन हाईकोर्ट ने इस दलील को भी स्वीकार नहीं किया।
अदालत ने पूछा कि यदि ये दस्तावेज इतने महत्वपूर्ण थे तो वर्ष 2011 से मामला लंबित रहने के बावजूद उन्हें पहले क्यों नहीं पेश किया गया?कोर्ट ने यह भी कहा कि पेश किए गए दस्तावेज यह साबित नहीं करते कि वे उसी विवादित भूमि से संबंधित हैं, जिस पर दुकान स्थित थी।
याचिकाकर्ता के पक्ष में क्या मिले सबूत?
सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया कि राजेंद्र प्रसाद साहू ने 5 जनवरी 1973 को पंजीकृत बिक्री विलेख के माध्यम से यह संपत्ति खरीदी थी। इतना ही नहीं, सरकारी अभिलेखों में उनके नाम से भूमि का म्यूटेशन भी दर्ज था। यानी सरकारी रिकॉर्ड भी उनके स्वामित्व की पुष्टि कर रहे थे।
पहले भी मिल चुका था मुआवजे का आदेश
हाईकोर्ट की एकलपीठ ने 27 जून 2024 को सुनाए गए फैसले में सरकार को निर्देश दिया था कि पीड़ित को:
• दुकान निर्माण की लागत के रूप में 5 लाख रुपये
• मानसिक पीड़ा के लिए 25 हजार रुपये
कुल 5.25 लाख रुपये छह सप्ताह के भीतर दिए जाएं।लेकिन दो साल से अधिक समय बीत जाने के बाद भी आदेश का पालन नहीं हुआ, जिसके बाद पीड़ित ने अवमानना याचिका दायर की।
दोषी अधिकारियों से वसूली का भी रास्ता खुला
इस मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह रहा कि हाईकोर्ट ने एकलपीठ की उस टिप्पणी का भी उल्लेख किया, जिसमें सरकार को दोषी अधिकारियों की जिम्मेदारी तय कर मुआवजे की राशि उनसे वसूलने की छूट दी गई थी।खंडपीठ ने टिप्पणी की कि ऐसा प्रतीत होता है कि अपील उन अधिकारियों के हितों की रक्षा के लिए दायर की गई, जिन पर भविष्य में जिम्मेदारी तय हो सकती थी।अदालत ने इस अपील को न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग तक करार दिया।
हाईकोर्ट का अंतिम आदेश
हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि वह एक सप्ताह के भीतर 5.25 लाख रुपये हाईकोर्ट में जमा करे। इस आदेश के पालन की व्यक्तिगत जिम्मेदारी चतरा के उपायुक्त को सौंपी गई है। राशि जमा होने के बाद याचिकाकर्ता अपनी पहचान और बैंक विवरण प्रस्तुत कर मुआवजा प्राप्त कर सकेंगे।








