पति की EMI 2.56 लाख, आय 1.80 लाख: हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, 1.18 करोड़ के कर्ज का हवाला देकर भरण-पोषण से नहीं बच सकता पति, पत्नी को मिलेंगे 30 लाख
झारखंड हाईकोर्ट ने भरण-पोषण मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए पत्नी के लिए 30 लाख रुपये स्थायी भरण-पोषण तय किया। कोर्ट ने कहा कि 1.18 करोड़ का कर्ज और 2.56 लाख की EMI पत्नी के भरण-पोषण की जिम्मेदारी से बचने का आधार नहीं है।

रांची। शादीशुदा रिश्तों पर हाईकोर्ट ने बड़ा अहम आदेश दिया है। झारखंड हाईकोर्ट ने वैवाहिक विवाद से जुड़े एक मामले में पत्नी के भरण-पोषण को लेकर अहम टिप्पणी की है। याचिका पर सुनवाई करते हुए जस्टिस एसएन प्रसाद और जस्टिस संजय प्रसाद की खंडपीठ ने पति की आय, कर्ज और मासिक ईएमआई पर सवाल उठाते हुए पत्नी के लिए 30 लाख रुपये स्थायी भरण-पोषण तय किया है।
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने स्पष्ट किया कि संपत्ति बनाने या भविष्य में आर्थिक लाभ हासिल करने के लिए लिया गया कर्ज पत्नी के भरण-पोषण की वैधानिक जिम्मेदारी को कम नहीं कर सकता।मामले में पत्नी को पहले ही 10 लाख रुपये मिल चुके थे। ऐसे में हाईकोर्ट ने शेष 20 लाख रुपये चार बराबर किस्तों में देने का निर्देश दिया है। इसके अलावा नाबालिग बेटी के नाम 30 लाख रुपये की सावधि जमा (FD) कराने का भी आदेश दिया गया है।
2016 में हुई थी शादी, एक बेटी भी है
मामले के अनुसार, दोनों की शादी 28 दिसंबर 2016 को भिलाई में हुई थी। विवाह के बाद दोनों की एक बेटी हुई। बाद में पति-पत्नी के बीच वैवाहिक विवाद बढ़ गया और मामला अदालत तक पहुंचा।पति ने पत्नी पर क्रूरता और परित्याग का आरोप लगाते हुए तलाक की याचिका दायर की थी। पारिवारिक न्यायालय ने 25 मार्च 2025 को पति के पक्ष में तलाक की डिक्री पारित कर दी। इसके बाद पत्नी ने हाईकोर्ट का रुख किया और अपने भरण-पोषण समेत अन्य मुद्दों को लेकर अपील दाखिल की।
पत्नी ने कहा- मेरी कोई स्वतंत्र आय नहीं
हाईकोर्ट में पत्नी की ओर से बताया गया कि उसकी अपनी कोई स्वतंत्र आय नहीं है। ऐसे में वैवाहिक संबंध टूटने के बाद आर्थिक रूप से उसका भरण-पोषण पति की जिम्मेदारी बनती है।
वहीं पति ने अपने हलफनामे में अपनी मासिक आय करीब 1.80 लाख रुपये बताई थी। साथ ही उसने करीब 1.18 करोड़ रुपये के कर्ज का उल्लेख करते हुए लगभग 2.56 लाख रुपये की मासिक ईएमआई चुकाने की जानकारी दी।
आय 1.80 लाख, EMI 2.56 लाख… कोर्ट ने उठाया सवाल
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पति की बताई आय और ईएमआई के बीच अंतर पर गंभीर सवाल उठाया। अदालत ने पूछा कि यदि पति की घोषित मासिक आय 1.80 लाख रुपये है तो वह हर महीने करीब 2.56 लाख रुपये की ईएमआई किस तरह चुका रहा है।अदालत ने इन परिस्थितियों को देखते हुए माना कि पति की ओर से बताई गई आय उसकी वास्तविक आर्थिक स्थिति को पूरी तरह नहीं दर्शाती है।
संपत्ति बनाने का कर्ज भरण-पोषण से ऊपर नहीं
कोर्ट ने अपने आदेश में महत्वपूर्ण सिद्धांत स्पष्ट किया। अदालत ने कहा कि यदि किसी व्यक्ति ने संपत्ति बनाने या भविष्य में अपनी आर्थिक स्थिति मजबूत करने के उद्देश्य से कर्ज लिया है, तो उस कर्ज की किस्त चुकाना पत्नी के भरण-पोषण की वैधानिक जिम्मेदारी से ऊपर नहीं रखा जा सकता।यानी केवल इस आधार पर भरण-पोषण की राशि कम नहीं की जा सकती कि पति पर बड़ा कर्ज है या वह भारी ईएमआई चुका रहा है।
पत्नी को 20 लाख और बेटी के लिए 30 लाख की FD
मामले में पत्नी को पहले ही 10 लाख रुपये दिए जा चुके थे। हाईकोर्ट ने कुल स्थायी भरण-पोषण की राशि 30 लाख रुपये निर्धारित करते हुए बाकी 20 लाख रुपये चार बराबर किस्तों में देने का निर्देश दिया।
इसके अलावा नाबालिग बेटी के आर्थिक भविष्य को ध्यान में रखते हुए उसके नाम 30 लाख रुपये की सावधि जमा कराने का भी आदेश दिया गया है।हाईकोर्ट की यह टिप्पणी वैवाहिक विवादों में भरण-पोषण तय करते समय पति की घोषित आय, वास्तविक आर्थिक क्षमता और कर्ज की प्रकृति को लेकर महत्वपूर्ण मानी जा रही है।











