JPSC की 9 परीक्षाओं में पक्के तौर पर हुई थी गड़बड़ी: OMR से छेड़छाड़ से लेकर प्रमाणपत्रों की वैधता तक, CID की चार्जशीट में क्या-क्या खुलासे?

रांची। झारखंड में सरकारी नौकरी की तैयारी कर रहे हजारों युवाओं के लिए झारखंड लोक सेवा आयोग (JPSC) की परीक्षाएं भविष्य की उम्मीद हैं। लेकिन आयोग की नौ अलग-अलग परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं को लेकर सामने आए आरोपों ने भर्ती प्रक्रिया की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
CID की चार्जशीट से जुड़े विवरण के अनुसार, इन मामलों में OMR शीट में कथित बदलाव, परीक्षा समाप्त होने के बाद उत्तर पुस्तिकाएं लिखवाने, चयन से संबंधित सूचनाओं के संभावित दुरुपयोग और अभ्यर्थियों के प्रमाणपत्रों की वैधता जैसे मुद्दे उठाए गए हैं। परीक्षा संचालन करने वाली एजेंसियों और तत्कालीन आयोग पदाधिकारियों की भूमिका भी जांच के दायरे में बताई गई है।
मामले की गंभीरता इसलिए भी अधिक है, क्योंकि प्रतियोगी परीक्षाओं में एक-एक अंक अभ्यर्थियों की सफलता और असफलता तय कर सकता है। ऐसे में यदि किसी उम्मीदवार को नियमों के विरुद्ध लाभ मिला हो, तो उसका असर केवल दूसरे अभ्यर्थियों के परिणाम पर नहीं, बल्कि पूरी चयन प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर पड़ता है।
हालांकि, चार्जशीट में आरोपों का उल्लेख होना अपने आप में दोष सिद्ध होने का प्रमाण नहीं है। संबंधित व्यक्तियों की जिम्मेदारी अदालत में साक्ष्यों और कानूनी प्रक्रिया के आधार पर ही तय होगी।
1. JPSC संयुक्त सिविल सेवा परीक्षा 2025: OMR शीट में बदलाव का आरोप
JPSC की 14वीं संयुक्त असैनिक सेवा प्रारंभिक परीक्षा-2025 के तहत 103 पदों के लिए 2,17,104 एडमिट कार्ड जारी किए गए थे। प्रारंभिक परीक्षा के बाद मुख्य परीक्षा के लिए 2,204 अभ्यर्थियों को सफल घोषित किया गया।
CID की चार्जशीट से जुड़े विवरण में OMR शीट की सुरक्षा और मूल्यांकन प्रक्रिया पर सवाल उठाए गए हैं। आरोप है कि कुछ उत्तरों में बाद में बदलाव किए गए। एक अभ्यर्थी के केवल 48 प्रश्नों के उत्तर देने के बावजूद सफल होने का दावा भी सामने आया है।
इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण जांच बिंदु यह है कि OMR शीट जमा होने के बाद उसकी अभिरक्षा किसके पास थी। क्या उत्तर पुस्तिकाओं के डिजिटल रिकॉर्ड और मूल दस्तावेजों का मिलान किया गया? मूल्यांकन के दौरान किसी तरह के बदलाव की संभावना को रोकने के लिए क्या सुरक्षा व्यवस्था लागू थी?
इन सवालों के जवाब से यह स्पष्ट करने में मदद मिलेगी कि कथित अनियमितता हुई भी या नहीं और यदि हुई, तो उसकी जिम्मेदारी किस स्तर पर बनती है।
2. 11वीं से 13वीं JPSC परीक्षा: चयन सूची को लेकर उठे सवाल
11वीं से 13वीं संयुक्त सिविल सेवा परीक्षा के माध्यम से 342 पदों पर नियुक्तियां हुई थीं। प्रारंभिक परीक्षा में 3,20,661 अभ्यर्थी शामिल हुए, जिनमें से 7,011 सफल घोषित किए गए। मुख्य परीक्षा के बाद 864 अभ्यर्थियों को सफलता मिली और 25 जुलाई 2025 को अंतिम परिणाम जारी किया गया।
CID की चार्जशीट से जुड़े विवरण के अनुसार, तत्कालीन आयोग अध्यक्ष एल. खियांग्ते के आवास से 15 अभ्यर्थियों के नाम और रोल नंबर वाली सूची मिलने का उल्लेख है। दावा है कि सूची में शामिल 10 अभ्यर्थी सफल हुए। इंटरव्यू से पहले संभावित चयन से संबंधित जानकारी और मोबाइल लोकेशन के विश्लेषण का भी जिक्र किया गया है।
इस घटनाक्रम ने चयन प्रक्रिया में गोपनीयता और निष्पक्षता को लेकर सवाल खड़े किए हैं। जांच में यह स्पष्ट होना जरूरी है कि सूची किस उद्देश्य से तैयार की गई थी, उसमें दर्ज जानकारी कब और कैसे उपलब्ध हुई तथा उसका चयन प्रक्रिया से कोई संबंध था या नहीं।
सिर्फ सूची मिलने या उसमें शामिल अभ्यर्थियों के सफल होने से अपने आप किसी साजिश की पुष्टि नहीं होती। इसके लिए अन्य साक्ष्यों और घटनाक्रम की कड़ियों का सत्यापन आवश्यक है।
3. वन क्षेत्र पदाधिकारी परीक्षा: परीक्षा के बाद उत्तर पुस्तिकाएं लिखवाने का आरोप
वन क्षेत्र पदाधिकारी (FRO) परीक्षा के तहत 170 पदों पर भर्ती होनी थी। इसमें करीब 14,000 अभ्यर्थियों ने हिस्सा लिया। प्रारंभिक परीक्षा में 2,405 और मुख्य परीक्षा में 743 अभ्यर्थियों को सफल घोषित किया गया था।
CID की जांच से जुड़े विवरण में परीक्षा एजेंसी TDPL से संबंधित लोगों की भूमिका पर सवाल उठाए गए हैं। आरोप है कि परीक्षा समाप्त होने के लगभग 10 दिन बाद किसी गुप्त स्थान पर उत्तर पुस्तिकाएं लिखवाई गईं।
यदि यह आरोप साक्ष्यों से प्रमाणित होता है, तो मामला केवल मूल्यांकन में लापरवाही का नहीं, बल्कि परीक्षा के बाद उत्तर पुस्तिकाओं की प्रामाणिकता और सुरक्षा से जुड़ा गंभीर विषय बन सकता है।
इसकी निष्पक्ष जांच के लिए मूल उत्तर पुस्तिकाओं, लिखावट के नमूनों, उपलब्ध डिजिटल रिकॉर्ड और संबंधित व्यक्तियों की भूमिका का परीक्षण महत्वपूर्ण होगा। साथ ही, यह भी पता लगाना होगा कि कथित गतिविधि की जानकारी किसी जिम्मेदार अधिकारी को थी या नहीं।
4. सहायक वन संरक्षक परीक्षा: मॉडल उत्तर पुस्तिका से समानता की जांच
सहायक वन संरक्षक (ACF) परीक्षा में 78 पदों पर भर्ती प्रस्तावित थी। प्रारंभिक परीक्षा में करीब 16,000 अभ्यर्थी शामिल हुए। इनमें से 1,110 अभ्यर्थी सफल हुए, जबकि मुख्य परीक्षा में 368 को सफल घोषित किया गया।
CID रिपोर्ट से जुड़े विवरण में मॉडल उत्तर पुस्तिका और एक अभ्यर्थी की उत्तर पुस्तिका के बीच कथित समानता का उल्लेख है। मामले में उत्तर पुस्तिकाओं के मिलान और फॉरेंसिक जांच के आधार पर अनियमितता की आशंका की पड़ताल की गई।
इस मामले में जांच का मुख्य सवाल यह है कि समानता किस स्तर की थी और क्या वह सामान्य पाठ्यक्रम आधारित उत्तरों के कारण थी या किसी असामान्य मेल का संकेत देती थी।
यदि उत्तरों की विशिष्ट समानता के साथ अन्य साक्ष्य भी मिलते हैं, तो यह पता लगाना जरूरी होगा कि संबंधित सामग्री अभ्यर्थी तक किस माध्यम से पहुंची। केवल समानता के आधार पर अंतिम निष्कर्ष निकालने के बजाय पूरी साक्ष्य शृंखला की जांच जरूरी है।
5. CDPO परीक्षा: चयन प्रक्रिया और एजेंसी की भूमिका पर सवाल
बाल विकास परियोजना पदाधिकारी (CDPO) परीक्षा के तहत 64 पदों पर नियुक्ति होनी थी। प्रारंभिक परीक्षा 10 जून 2024 को हुई थी, जिसमें 1,590 अभ्यर्थी सफल घोषित किए गए। मुख्य परीक्षा 2 से 4 अगस्त 2025 के बीच आयोजित हुई और अंतिम परिणाम 10 जनवरी 2026 को जारी किया गया।
CID की चार्जशीट से जुड़े विवरण में परीक्षा एजेंसी और कुछ अभ्यर्थियों को कथित रूप से लाभ पहुंचाने के आरोपों का उल्लेख है। परीक्षा संचालन और चयन प्रक्रिया में शामिल लोगों की भूमिका को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं।
इस मामले में यह जांचना महत्वपूर्ण होगा कि परीक्षा संचालन, उत्तर पुस्तिकाओं के मूल्यांकन और अंतिम परिणाम तैयार करने में निर्धारित नियमों का पालन किया गया या नहीं। यदि किसी अभ्यर्थी को अनुचित लाभ देने का आरोप है, तो उसके समर्थन में मौजूद दस्तावेजी और तकनीकी साक्ष्यों का परीक्षण भी जरूरी होगा।
6. JET-2024: परीक्षा एजेंसी के चयन पर उठे सवाल
झारखंड पात्रता परीक्षा (JET) का उद्देश्य सहायक प्रोफेसर पद के लिए पात्रता निर्धारित करना और झारखंड के विश्वविद्यालयों में PhD प्रवेश के लिए अवसर उपलब्ध कराना है। उपलब्ध विवरण के अनुसार, इस परीक्षा के लिए विज्ञापन संख्या 08/2025 जारी किया गया था। आवेदन प्रक्रिया 16 सितंबर 2025 से शुरू हुई और परीक्षा 26 अप्रैल 2026 को आयोजित हुई।
CID की जांच से जुड़े विवरण में परीक्षा संचालन की जिम्मेदारी बिस्वास एजेंसी को सौंपे जाने पर सवाल उठाए गए हैं। एजेंसी से जुड़े एक व्यक्ति का नाम दूसरे पेपर लीक मामले में आने का भी उल्लेख है।
इस संदर्भ में दो पहलुओं की जांच महत्वपूर्ण है। पहला, एजेंसी के चयन के लिए निर्धारित पात्रता, अनुभव और तकनीकी मानकों का पालन हुआ या नहीं। दूसरा, क्या JET परीक्षा में किसी वास्तविक अनियमितता से एजेंसी या उससे जुड़े किसी व्यक्ति का संबंध सामने आया है?
किसी अन्य मामले में किसी व्यक्ति का नाम आना अपने आप JET में उसकी संलिप्तता साबित नहीं करता। दोनों मामलों के बीच संबंध स्थापित करने के लिए स्वतंत्र और ठोस साक्ष्य आवश्यक होंगे।
7. सहायक लोक अभियोजक नियमित परीक्षा: कंप्यूटर प्रमाणपत्रों की वैधता पर सवाल
सहायक लोक अभियोजक की नियमित भर्ती परीक्षा का विज्ञापन संख्या 06/2025 था। आवेदन प्रक्रिया 29 जून 2025 से शुरू हुई थी।
CID की चार्जशीट से संबंधित विवरण में कुछ अभ्यर्थियों के कंप्यूटर प्रमाणपत्रों और पात्रता की जांच पर सवाल उठाए गए हैं। आरोप है कि प्रमाणपत्रों की वैधता और आवश्यक योग्यता के सत्यापन में अनियमितता हुई।
इस मामले में मुख्य प्रश्न यह है कि क्या सभी चयनित अभ्यर्थियों ने भर्ती विज्ञापन में निर्धारित शर्तें पूरी की थीं। प्रमाणपत्र जारी करने वाली संस्थाओं की मान्यता, दस्तावेजों की प्रामाणिकता और सत्यापन की प्रक्रिया की जांच से स्थिति स्पष्ट हो सकती है।
यदि दस्तावेजों में गड़बड़ी प्रमाणित होती है, तो संबंधित अभ्यर्थियों की पात्रता के साथ-साथ दस्तावेज सत्यापन के लिए जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका भी नियमानुसार जांच के दायरे में आ सकती है।
8. सहायक लोक अभियोजक बैकलॉग परीक्षा: दूसरे राज्यों के प्रमाणपत्रों की जांच
सहायक लोक अभियोजक बैकलॉग भर्ती का विज्ञापन संख्या 05/2025 था। आवेदन प्रक्रिया 24 जून 2025 से शुरू हुई थी। इस भर्ती में भी पात्रता और कंप्यूटर प्रमाणपत्रों को लेकर कथित अनियमितताओं के सवाल सामने आए।
जांच से जुड़े विवरण में दूसरे राज्यों से जारी कंप्यूटर प्रमाणपत्रों और पात्रता संबंधी दस्तावेजों की वैधता पर सवाल उठाए गए हैं। आरोप है कि संदिग्ध प्रमाणपत्रों के आधार पर कुछ अभ्यर्थियों को चयन प्रक्रिया में लाभ मिला।
हालांकि, किसी दूसरे राज्य से जारी प्रमाणपत्र होना अपने आप में उसे अवैध नहीं बनाता। वास्तविक सवाल यह है कि प्रमाणपत्र जारी करने वाली संस्था मान्य थी या नहीं और संबंधित भर्ती के नियमों के अनुसार वह प्रमाणपत्र स्वीकार्य था या नहीं।
यदि कोई प्रमाणपत्र फर्जी या नियमों के विपरीत पाया जाता है, तो उसके आधार पर हुई चयन प्रक्रिया की समीक्षा और सत्यापन करने वाले अधिकारियों की जवाबदेही तय करने के लिए नियमानुसार कार्रवाई की जा सकती है।
9. खाद्य सुरक्षा पदाधिकारी परीक्षा 2023: परिणाम तैयार करने की प्रक्रिया पर सवाल
खाद्य सुरक्षा पदाधिकारी (FSO) भर्ती का विज्ञापन संख्या 18/2023 था। इस भर्ती में 56 पदों पर नियुक्ति होनी थी। लिखित परीक्षा 27 मई 2024 को आयोजित हुई, जिसमें 149 अभ्यर्थी सफल घोषित किए गए। साक्षात्कार 25 से 27 फरवरी 2026 के बीच हुआ।
CID की चार्जशीट से जुड़े विवरण में परीक्षा के परिणाम तैयार करने की प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाए गए हैं। इस मामले में अभय कुमार तिवारी का नाम मुख्य आरोपी के रूप में सामने आने का उल्लेख है।
जांच का महत्वपूर्ण पहलू यह है कि परिणाम तैयार करने और अंतिम चयन में किन प्रक्रियाओं का पालन किया गया। क्या अंकों के संकलन, मूल्यांकन और साक्षात्कार के रिकॉर्ड में कोई विसंगति मिली? क्या किसी व्यक्ति को नियमों के विपरीत परिणाम प्रभावित करने का अवसर मिला?
इन सवालों का उत्तर उपलब्ध दस्तावेजों, डिजिटल रिकॉर्ड और संबंधित व्यक्तियों की भूमिका की जांच से ही मिल सकता है। आरोपों की पुष्टि होने से पहले किसी भी व्यक्ति को दोषी मानना उचित नहीं होगा।
JPSC विवाद में अब आगे क्या होना चाहिए?
नौ परीक्षाओं से जुड़े आरोपों ने भर्ती प्रक्रिया की निगरानी और जवाबदेही को लेकर व्यापक बहस खड़ी कर दी है। लेकिन अभ्यर्थियों को न्याय दिलाने के लिए केवल आरोपों की चर्चा पर्याप्त नहीं है। जांच के निष्कर्षों को साक्ष्यों के आधार पर स्पष्ट करना और नियमों के अनुसार कार्रवाई करना भी उतना ही जरूरी है।
इस दिशा में कुछ कदम महत्वपूर्ण हो सकते हैं:
OMR और उत्तर पुस्तिकाओं का स्वतंत्र सत्यापन: मूल रिकॉर्ड, डिजिटल डेटा और उपलब्ध फॉरेंसिक साक्ष्यों का मिलान किया जाए।
परीक्षा एजेंसियों की जवाबदेही: एजेंसी चयन, अनुबंध की शर्तों, सुरक्षा व्यवस्था और मूल्यांकन प्रक्रिया की जांच की जाए।
चयन प्रक्रिया की निष्पक्ष समीक्षा: जहां ठोस अनियमितता के संकेत हों, वहां प्रभावित चरणों और परिणामों की कानूनी प्रावधानों के अनुसार समीक्षा हो।
दोषियों के खिलाफ कार्रवाई: जिम्मेदारी प्रमाणित होने पर संबंधित व्यक्तियों और संस्थाओं के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की जाए।
ईमानदार अभ्यर्थियों के हितों की रक्षा: किसी भी सुधारात्मक कदम में उन उम्मीदवारों के अधिकारों का ध्यान रखा जाए, जिन्होंने नियमों के अनुसार परीक्षा दी है।
यह भी जरूरी है कि किसी परीक्षा में कथित गड़बड़ी सामने आने पर सभी अभ्यर्थियों को एक साथ दोषी न माना जाए। सुधारात्मक कार्रवाई साक्ष्यों और कानूनी प्रक्रिया के अनुरूप होनी चाहिए, ताकि निर्दोष उम्मीदवारों के साथ अन्याय न हो।
JPSC परीक्षाओं में पारदर्शिता की परीक्षा
JPSC की नौ परीक्षाओं से संबंधित कथित अनियमितताओं का मामला केवल कुछ अभ्यर्थियों के चयन तक सीमित नहीं है। यह सरकारी भर्ती व्यवस्था पर युवाओं के भरोसे, परीक्षा एजेंसियों की जवाबदेही और आयोग की संस्थागत विश्वसनीयता से जुड़ा मुद्दा है।यदि आरोप प्रमाणित होते हैं, तो जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई और प्रभावित अभ्यर्थियों के हितों की रक्षा जरूरी होगी।
वहीं, जहां आरोप प्रमाणित नहीं होते, वहां संबंधित व्यक्तियों और चयन प्रक्रिया के अधिकारों का भी सम्मान किया जाना चाहिए।सबसे अहम सवाल यही है कि प्रतियोगी परीक्षाओं में मेहनत, योग्यता और निष्पक्ष मूल्यांकन को सर्वोच्च प्राथमिकता कैसे सुनिश्चित की जाए। हजारों युवाओं के भविष्य से जुड़े इस मामले में पारदर्शी जांच, समयबद्ध न्याय और जवाबदेही ही भरोसा बहाल करने का रास्ता है।












